संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ उत्तरभाग \
* उत्तरभाग *
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वामदेवजीने कहा- महीपाल! तुम पूर्वजन्ममें शूद्रजातिमें उत्पन्न हुए थे। उस समय दरिद्रता तथा दुष्ट भार्याने तुम्हारा बड़ा तिरस्कार किया था। तुम्हारी स्त्री पर-पुरुषका सेवन करती थी। राजन्! तुम ऐसी स्त्रीके साथ बहुत वर्षोंतक निवास करते हुए दुःखसे संतप्त होते रहे। एक समय किसी ब्राह्मणके संसर्गसे तुम तीर्थयात्राके लिये गये; फिर सब तीर्थोंमें घूमकर ब्राह्मणकी सेवामें तत्पर हो, तुम पुण्यमयी मथुरापुरीमें जा पहुँचे। महीपते! वहाँ ब्राह्मणदेवताके सङ्गसे तुमने यमुनाजीके सब तीर्थोंमें उत्तम-विश्रामघाट नामक तीर्थमें स्नान करके भगवान् वाराहके मन्दिरमें होती हुई पुराणकी कथा सुनी, जो 'अशून्यशयनव्रत'के विषयमें थी; चार पारणसे जिसकी सिद्धि होती है, जिसका अनुष्ठान कर लेनेपर मेघके समान श्यामवर्ण देवेश्वर लक्ष्मीभर्ता जगन्नाथ, जो अशेष पापराशिका नाश करनेवाले हैं, प्रसन्न होते हैं। राजन्! तुमने अपने घर लौटकर वह पवित्र 'अशून्यशयनव्रत' किया, जो घरमें परम अभ्युदय प्रदान करनेवाला है। महीपते! श्रावण मासकी द्वितीयाको यह पुण्यमयव्रत ग्रहण करना चाहिये। इससे जन्म, मृत्यु और जरावस्थाका नाश होता है। पृथ्वीपते! इस व्रतमें फल, फूल, धूप, लाल-चन्दन, शय्यादान, वस्त्रदान और ब्राह्मणभोजन आदिके द्वारा लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। राजन्! तुमने यह सब दुस्तर कर्म भी पूरा किया। महीपते! तुमने जो पहले पुण्यके फलस्वरूप सुख विस्तारपूर्वक बताये हैं, वे इसी व्रतसे प्राप्त हुए हैं, सुनो-जिसके ऊपर भगवान् जगन्नाथ प्रसन्न न हों, उसके यहाँ वे सुख निश्चय ही नहीं हो सकते। राजेन्द्र ! इस जन्ममें भी तुम (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीव्रतके द्वारा श्रीहरिकी पूजा करते हो। राजन्! इससे तुम्हें निश्चितरूपसे भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त होगा।
राजा बोले- द्विजश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा हो तो मैं मन्दराचलपर जानेको उत्सुक हूँ। राज्य-शासनका गुरुतर भार अपने पुत्रके ऊपर छोड़कर मैं हलका हो गया हूँ। अब मेरे कर्तव्यका पालन मेरा पुत्र करेगा।
राजाकी बात सुनकर वामदेवजी इस प्रकार बोले- 'नृपश्रेष्ठ ! पुत्रका यह सबसे महान् कर्तव्य है कि वह सदा प्रेमपूर्वक पिताको क्लेशसे मुक्त करता रहे। जो मन, वाणी और शरीरकी शक्तिसे सदा पिताकी आज्ञाका पालन करता है, उसे प्रतिदिन गङ्गास्नानका फल मिलता है। जो पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके गङ्गास्नान करनेके लिये जाता है, उस पुत्रकी शुद्धि नहीं होती- यह वैदिक श्रुतिका कथन है*। भूपाल! तुम इच्छानुसार यात्रा करो। तुमने अपना सब कर्तव्य पूरा कर लिया।'
मुनिके ऐसा कहनेपर श्रीमान् राजा रुक्माङ्गद घोड़ेपर चढ़कर शीघ्र गतिसे चले, मानो साक्षात् वायुदेव जा रहे हों। मार्गमें अनेकानेक पर्वत, वन, नदी, सरोवर तथा उपवन आदि सम्पूर्ण आश्चर्यमय दृश्योंको देखते हुए वे राजाधिराज रुक्माङ्गद थोड़े ही समयमें श्वेतगिरि, गन्धमादन और महामेरुको लाँघकर उत्तर-कुरुवर्षको देखते हुए मन्दराचलपर्वतपर जा पहुँचे, जो सब ओरसे सुवर्णसे आच्छादित था। वहाँ बहुत-से निर्झर झर रहे थे। अनेकानेक कन्दराएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ा रही थीं। सहस्रों नदियोंसे पूर्ण मन्दराचल गङ्गाजीके शुभ जलसे भी प्रक्षालित हो रहा था। यह सब देखते हुए राजा रुक्माङ्गद उस महापर्वतके
* एतद्धि परमं कृत्यं पुत्रस्य नृपपुङ्गव । यत्क्लेशात् पितरं प्रेम्णा विमोचयति सर्वदा ॥
पितुर्वचनकारी च मनोवाक्कायशक्तिः । तस्य भागीरथीस्नानमह्न्यहनि जायते ॥
निरस्य पितृवाक्यं तु व्रजेत्स्नातुं सुरापगाम् । नो शुद्धिस्तस्य पुत्रस्य इतीत्थं वैदिकी श्रुतिः ॥
(ना० उत्तर० ११। २-२३)
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समीप जा पहुँचे। तत्पश्चात् उन्होंने समस्त मृग आदि पशुओं और पक्षियोंके समुदायको एक संगीतकी ध्वनिसे खिंचकर शीघ्रतापूर्वक एक ओर जाते देखा। वह ध्वनि मोहिनीके मुखसे निकले हुए संगीतकी थी। उनको जाते देख राजा रुक्माङ्गद स्वयं भी उन्हींके साथ शीघ्रतापूर्वक चल दिये। मोहिनीके मुखसे निकले हुए संगीतकी ध्वनि राजाके भी कानमें पड़ी, जिससे मोहित होकर उन्होंने घोड़ा वहीं छोड़ दिया और पर्वतीय मार्गको लाँघते हुए वे क्षणभरमें सहसा उसके पास पहुँच गये। उन्होंने देखा, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाली एक दिव्य नारी पर्वतपर बैठी है, मानो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी रूपराशि उसके रूपमें अभिव्यक्त हुई हो। उसे देखकर राजा उसके पास खड़े हो उस मोहिनीका रूप निहारने लगे। देखते-देखते वे मोहित होकर वहीं गिर पड़े। मोहिनीने वीणाको रख दिया और गीत बन्द कर दिया। वह देवी राजाके समीप गयी। मोहिनी सन्तप्त राजा रुक्माङ्गदसे मधुर मनोरम वचनोंमें बोली—'राजन्! उठिये। मैं आपके वशमें हूँ। क्यों मूर्च्छासे आप अपने इस शरीरको क्षीण कर रहे हैं। भूपाल! आप तो पृथ्वीके इस महान् भारको तिनकेके समान समझकर ढोते आये हैं। फिर आज आप मोहित क्यों हो रहे हैं? दृढ़तापूर्वक अपनेको सँभालिये। आप धीर हैं, वीर हैं। आपकी चेष्टाएँ उदारतापूर्ण हैं। राजराजेश्वर! यदि मेरे साथ अत्यन्त मनोरम एवं मनोऽनुकूल क्रीड़ा करनेकी आपके मनमें इच्छा हो तो मुझे धर्मयुक्त दान देकर अपनी दासीकी भाँति मेरा उपभोग कीजिये।'
राजाकी मोहिनीसे प्रणय-याचना, मोहिनीकी शर्त तथा राजाद्वारा उसकी स्वीकृति एवं विवाह तथा दोनोंका राजधानीकी ओर प्रस्थान
वसिष्ठजी कहते हैं— मोहिनीके इस प्रकार सुन्दर वचन बोलनेपर राजा रुक्माङ्गद आँखें खोलकर गद्गद कण्ठसे बोले—'बाले! मैंने पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाली बहुत-सी रमणियोंको देखा, किंतु ऐसा रूप मैंने कहीं नहीं देखा है, जैसा कि विश्वविमोहन रूप तुमने धारण किया है। वरानने! मैं तुम्हारे दर्शनमात्रसे इतना मोहित हो गया कि तुमसे बाततक न कर सका
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और पृथ्वीपर गिर पड़ा। मुझपर कृपा करो! तुम्हारे मनमें जो भी अभिलाषा होगी, वह सब मैं तुम्हें दूँगा। मैं सम्पूर्ण पृथ्वीको तुम्हारी सेवामें दे दूँगा। इसके साथ ही कोष, खजाना, हाथी, घोड़े, मन्त्री और नगर आदि भी तुम्हारे अधीन हो जायेंगे। तुम्हारे लिये मैं अपने-आपको भी तुम्हें अर्पण कर दूँगा; फिर धन, रत्न आदिकी तो बात ही क्या है? अतः मोहिनी! मुझपर प्रसन्न हो जाओ।'
राजाका मधुर वचन सुनकर मोहिनीने मुसकराते हुए उस समय उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा—'वसुधापते! मैं आपसे पर्वतोंसहित पृथ्वी नहीं माँगती। मेरी इतनी ही इच्छा है कि मैं समयपर जो कुछ कहूँ, उसका निःशङ्क होकर आप पालन करते रहें। यदि यह शर्त आप स्वीकार कर लें तो मैं निःसंदेह आपकी सेवा करूँगी।'
राजा बोले—देवि! तुम जिससे संतुष्ट रहो, वही शर्त मैं स्वीकार करता हूँ।
मोहिनीने कहा—आप अपना दाहिना हाथ मुझे दीजिये; क्योंकि वह बहुत धर्म करनेवाला हाथ है। राजन्! उसके मिलनेसे मुझे आपकी बातपर विश्वास हो जायगा। आप धर्मशील राजा हैं। आप समय आनेपर कभी असत्य नहीं बोलेंगे।
राजन्! मोहिनीके ऐसा कहनेपर महाराज रुक्माङ्गदका मन प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले—'सुन्दरि! जन्मसे लेकर अबतक मैंने कभी क्रीड़ाविहारमें भी असत्य भाषण नहीं किया है। लो, मैंने पुण्य-चिह्नसे युक्त यह दाहिना हाथ तुम्हें दे दिया। मैंने जन्मसे लेकर अबतक जो भी पुण्य किया है, वह सब यदि तुम्हारी बात न मानूँ तो तुम्हारा ही हो जाय। मैंने धर्मको ही साक्षीका स्थान दिया है। कल्याणी! अब तुम मेरी पत्नी बन जाओ! मैं इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। मेरा नाम रुक्माङ्गद है। मैं महाराज ऋतध्वजका पुत्र हूँ और मेरे पुत्रका नाम धर्माङ्गद है। तुम मेरी प्रार्थनाका उत्तर देकर मेरे ऊपर कृपादृष्टि करो।'
राजाके ऐसा कहनेपर मोहिनीने उत्तर देते हुए कहा—'राजन्! मैं ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। आपकी कीर्ति सुनकर आपके लिये ही इस स्वर्णमय मन्दराचलपर आयी हूँ। केवल आपमें मन लगाये यहाँ तपस्यामें तत्पर थी और देवेश्वर भगवान् शङ्करका संगीतदानके द्वारा पूजन कर रही थी। मुझे विश्वास है कि संगीतका दान देवताओंको अधिक प्रिय है। संगीतसे संतुष्ट हो भगवान् पशुपति तत्काल फल देते हैं। तभी तो अपने प्रियतम आप महाराजको मैंने शीघ्र पा लिया है। राजन्! आपका मुझपर प्रेम है और मैं भी आपसे प्रेम करती हूँ।' राजासे ऐसा कहकर मोहिनीने उनका हाथ पकड़ लिया।
तदनन्तर राजाको उठाकर मोहिनी बोली—महाराज! मेरे प्रति कोई शङ्का न कीजिये! मुझे कुमारी एवं पापरहित जानिये। महीपाल! गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार मेरे साथ विवाह कीजिये। राजन्! यदि अविवाहिता कन्या गर्भ धारण कर ले तो वह सब वर्णोंमें निन्दित चाण्डाल पुत्रको जन्म देती है। पुराणमें विद्वान् पुरुषोंने तीन प्रकारकी चाण्डाल-योनि मानी है—एक तो वह जो कुमारी कन्यासे उत्पन्न हुआ है, दूसरा वह जो विवाहिता होनेपर भी सगोत्र कन्याके पेटसे पैदा हुआ है। नृपश्रेष्ठ! शूद्रके वीर्यद्वारा ब्राह्मणीके गर्भसे उत्पन्न हुआ पुत्र तीसरे प्रकारका चाण्डाल है*। महाराज! इस कारण
* चाण्डालयोनयस्तिस्रः पुराणे कवयो विदुः॥
कुमारीसम्भवा त्वेका सगोत्रापि द्वितीयका। ब्राह्मण्यां शूद्रजनिता तृतीया नृपपुङ्गव॥
(ना० उत्तर० १३। ३-४)
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मुझ कुमारीके साथ आप विवाह कर लें।
तब राजा रुक्माङ्गदने मन्दराचलपर उस चपलनयना मोहिनीके साथ विधिपूर्वक विवाह किया और उसके साथ हँसते हुए-से रहने लगे।
राजाने कहा—वरानने! स्वर्गकी प्राप्ति भी मुझे वैसा सुख नहीं दे सकती, जैसा सुख इस मन्दराचल पर्वतपर तुम्हारे मिलनेसे प्राप्त हो रहा है। बाले! तुम यहीं मेरे साथ रहोगी या मेरे राजमहलमें?
राजा रुक्माङ्गदकी बात सुनकर मोहिनीने अनुरागपूर्वक मधुर वाणीमें कहा—'राजन्! जहाँ आपको सुख मिले, वहीं मैं भी रहूँगी। स्वामीका निवासस्थान धन-वैभवसे रहित हो तो भी पत्नीको वहीं निवास करना चाहिये। उसके लिये पतिके सामीप्यको ही सुवर्णमय मेरु पर्वत बताया गया है। नारीके लिये पतिके निवासस्थानको छोड़कर अपने पिताके घर भी रहना वर्जित है। पिताके स्थान और आश्रयमें आसक्त होनेवाली स्त्री नरकमें डूबती है। वह सब धर्मसे रहित होकर सूकर-योनिमें जन्म लेती है*। इस प्रकार पतिके निवासस्थानसे अन्यत्र रहनेमें जो दोष है, उसे मैं जानती हूँ। अतः मैं आपके साथ ही चलूँगी। सुखमें और दुःखमें आप ही मेरे स्वामी हैं।'
मोहिनीका यह कथन सुनकर राजाका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे उस सुन्दरीको हृदयसे लगाकर बोले—'प्रिये! मेरी समस्त पत्नियोंमें तुम्हारा स्थान सर्वोपरि होगा। मेरे घरमें तुम प्राणोंसे भी अधिक प्रिय बनकर रहोगी। आओ, अब हम लोग सुखपूर्वक राजधानीकी ओर चलें।' राजा रुक्माङ्गदने जब ऐसी बात कही, तब चन्द्रमाके समान मुखवाली मोहिनी उस पर्वतकी शोभाको अपने साथ खींचती हुई (राजा रुक्माङ्गदके साथ राजधानीकी ओर) चली।
घोड़ेकी टापसे कुचली हुई छिपकलीकी राजाद्वारा सेवा, छिपकलीकी आत्मकथा, पतिपर वशीकरणका दुष्परिणाम, राजाके पुण्यदानसे उसका उद्धार
**वसिष्ठजी कहते हैं—**राजन्! वे दोनों पति-पत्नी मन्दराचलके शिखरसे पृथ्वीकी ओर प्रस्थित हुए। मार्गमें अनेकों मनोहर पर्वतीय दृश्योंको देखते हुए क्रमशः नीचे उतरने लगे। पृथ्वीपर आकर राजाने अपने श्रेष्ठ घोड़ेको देखा, जो वज्रके समान कठोर टापोंसे धरतीको वेगपूर्वक खोद रहा था। उस भूभागके भीतर एक छिपकली रहती थी। जब तीखी टापसे वह घोड़ा धरती खोद रहा था, उसी समय वह छिपकली वहाँसे निकलकर जाने लगी। इतनेमें ही टापके आघातसे उसका शरीर विदीर्ण हो गया। दयालु राजा रुक्माङ्गदने जब उसकी यह दशा देखी तो वे बड़े वेगसे दौड़े और वृक्षके कोमल पत्तेसे उन्होंने स्वयं उसे खुरके नीचेसे उठाया तथा घास एवं तृणसे भरी हुई भूमिपर रख दिया। तत्पश्चात् उसे मूर्च्छित देख मोहिनीसे बोले—'सुन्दरी! शीघ्र पानी ले आओ। कमललोचने! यह छिपकली कुचलकर मूर्च्छित हो गयी है। इसे उस जलसे सींचूँगा।' स्वामीकी आज्ञासे मोहिनी शीघ्र शीतल जल ले आयी। राजाने उस जलसे बेहोश पड़ी हुई छिपकलीको सींचा। राजन्! शीतल जलके अभिषेकसे उसकी खोयी हुई चेतना फिर लौट
*भर्तृस्थानं परित्यज्य स्वपितुर्वापि वर्जितम्॥
पितृस्थानाश्रयरता नारी तमसि मज्जति। सर्वधर्मविहीनापि नारी भवति सूकरी॥
(ना० उत्तर० १३। १८-१९)