संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-तृतीय पाद ५०१
- पूर्वभाग-तृतीय पाद * ५०१
श्रीनारदजीको भगवान् शङ्करसे प्राप्त हुए युगलशरणागति-मन्त्र तथा राधाकृष्ण-युगलसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते हैं—नारद! क्या तुम जानते हो कि पूर्व-जन्ममें तुमने साक्षात् भगवान् शङ्करसे युगल-मन्त्रका उपदेश प्राप्त किया था। श्रीकृष्ण-मन्त्रका रहस्य, जिसे तुम भूल चुके हो, स्मरण तो करो।
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! परम बुद्धिमान् सनत्कुमारजीके द्वारा ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने ध्यानमें स्थित हो अपने पूर्व-जन्मके चिरन्तन चरित्रको शीघ्र जान लिया। तब उन्होंने मुखसे आन्तरिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा—‘भगवन्! पूर्व-कल्पका और वृत्तान्त तो मुझे स्मरण हो आया है; परंतु युगल-मन्त्रका लाभ किस प्रकार हुआ, यह याद नहीं आता।’ महात्मा नारदका यह वचन सुनकर भगवान् सनत्कुमारने सब बातें यथावत्-रूपसे बतलाना आरम्भ किया।
सनत्कुमारजी बोले—ब्रह्मन्! सुनो, इस सारस्वत कल्पसे पच्चीसवें कल्प पूर्वकी बात है, तुम कश्यपजीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे। उस समय भी तुम्हारा नाम नारद ही था। एक दिन तुम भगवान् श्रीकृष्णका परम तत्त्व पूछनेके लिये कैलास पर्वतपर भगवान् शिवके समीप गये। वहाँ तुम्हारे प्रश्न करनेपर, महादेवजीने स्वयं जिसका साक्षात्कार किया था, श्रीहरिकी नित्य-लीलासे सम्बन्ध रखनेवाले उस परम रहस्यका तुमसे यथार्थरूपमें वर्णन किया। तब तुमने श्रीहरिकी नित्य-लीलाका दर्शन करनेके लिये भगवान् शङ्करसे पुनः प्रार्थना की। तब भगवान् सदाशिव इस प्रकार बोले—‘गोपीजनवल्लभचरणाञ्छरणं* प्रपद्ये’ यह मन्त्र है। इस मन्त्रके सुरभि ऋषि, गायत्री छन्द और गोपीवल्लभ भगवान् श्रीकृष्ण देवता कहे गये हैं, ‘प्रपन्नोऽस्मि’ ऐसा कहकर भगवान्की शरणागतिरूप भक्ति प्राप्त करनेके लिये इसका विनियोग बताया गया है। विप्रवर! इसका सिद्धादि-शोधन नहीं होता है। इसके लिये न्यासकी कल्पना भी नहीं की गयी है। केवल इस मन्त्रका चिन्तन ही भगवान्की नित्य लीलाको तत्काल प्रकाशित कर देता है। गुरुसे मन्त्र ग्रहण करके उनमें भक्तिभाव रखते हुए अपने धर्मपालनमें संलग्न हो गुरुदेवकी अपने ऊपर पूर्ण कृपा समझे और सेवाओंसे गुरुको संतुष्ट करे। साधुपुरुषोंके धर्मोंकी, जो शरणागतोंके भयको दूर करनेवाले हैं, शिक्षा ले। इहलोक और परलोककी चिन्ता छोड़कर उन सिद्धिदायक धर्मोंको अपनावे। ‘इहलोकका सुख, भोग और आयु पूर्वकर्मोंके अधीन हैं, कर्मानुसार उनकी व्यवस्था भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही करेंगे।’ ऐसा दृढ़ विचार कर अपने मन और बुद्धिके द्वारा निरन्तर नित्यलीलापरायण श्रीकृष्णका चिन्तन करे। दिव्य अर्चाविग्रहोंके रूपमें भी भगवान्का अवतार होता है। अतः उन विग्रहोंकी सेवा-पूजा-द्वारा सदा श्रीकृष्णकी आराधना करे। भगवान्की शरण चाहनेवाले प्रपन्न भक्तोंको अनन्यभावसे उनका चिन्तन करना चाहिये और विद्वानोंको भगवान्का आश्रय रखकर देह-गेह आदिकी ओरसे उदासीन रहना चाहिये। गुरुकी अवहेलना, साधु-महात्माओंकी निन्दा, भगवान् शिव और विष्णुमें भेद करना, वेदनिन्दा, भगवन्नामके बलपर पापाचार करना, भगवन्नामकी
* गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्णके चरणोंकी शरण लेता हूँ।
५०२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
महिमाको अर्थवाद समझना, नाम लेनेमें पाखण्ड फैलाना, आलसी और नास्तिकको भगवन्नामका उपदेश देना, भगवन्नामको भूलना अथवा नाममें आदरबुद्धि न होना—ये (दस) बड़े भयानक दोष हैं। वत्स! इन दोषोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये*। मैं भगवान्की शरणमें हूँ, इस भावसे सदा हृदयस्थित श्रीहरिका चिन्तन करे और यह विश्वास रखे कि वे भगवान् ही सदा मेरा पालन करते हैं और करेंगे। भगवान्से यह प्रार्थना करे—‘राधानाथ! मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपका हूँ। श्रीकृष्णवल्लभे! मैं तुम्हारा ही हूँ। आप ही दोनों मेरे आश्रय हैं।’ मुनिश्रेष्ठ! श्रीहरिके दास, सखा, पिता-माता और प्रेयसियाँ—सब-के-सब नित्य हैं; ऐसा महात्मा पुरुषोंको चिन्तन करना चाहिये। भगवान् श्यामसुन्दर प्रतिदिन वृन्दावन तथा व्रजमें आते-जाते और सखाओंके साथ गौएँ चराते हैं। केवल असुर-विध्वंसकी लीला सदा नहीं होती। श्रीहरिके श्रीदामा आदि बारह सखा कहे गये हैं तथा श्रीराधा-रानीकी सुशीला आदि बत्तीस सखियाँ बतायी गयी हैं। वत्स! साधकको चाहिये वह अपनेको श्यामसुन्दरकी सेवाके सर्वथा अनुरूप समझे और श्रीकृष्णसेवाजनित सुख एवं आनन्दसे अपनेको अत्यन्त संतुष्ट अनुभव करे। प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तसे लेकर आधी राततक समयानुरूप सेवाके द्वारा दोनों प्रिया-प्रियतमकी परिचर्या करे। प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर उन युगल सरकारके सहस्र नामोंका पाठ भी करे। मुनीश्वर! यह प्रपन्न भक्तोंके लिये साधन बताया गया है। यह मैंने तुम्हारे समक्ष गूढ तत्त्व प्रकाशित किया है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—नारद! तब तुमने पुनः भगवान् सदाशिवसे पूछा—‘प्रभो! युगलसहस्रनाम कौन-से हैं? महामुने! तुम्हारे पूछनेपर भगवान् शिवने युगलसहस्रनाम भी बतलाया। वह सब मुझसे सुनो। रमणीय वृन्दावनमें यमुनाजीके तटसे लगे हुए कल्पवृक्षका सहारा लेकर श्यामसुन्दर श्रीराधारानीके साथ खड़े हैं। महामुने! ऐसा ध्यान करके युगलसहस्रनामका पाठ करे।
१. देवकीनन्दनः = देवकीको आनन्दित करनेवाले, २. शौरिः = शूरसेनके वंशज, ३. वासुदेवः = वसुदेव-पुत्र अथवा सबके भीतर निवास करनेवाले देवता, ४. बलानुजः = बलरामजीके छोटे भाई, ५. गदाग्रजः = गदके बड़े भाई, ६. कंसमोहः = अपनी अलौकिक शौर्यपूर्ण लीलाओंसे कंसको मोहित करनेवाले, ७. कंससेवकमोहनः = कंसकी सेवामें तत्पर असुर वीरोंको मोहित करनेवाले।
८. भिन्नार्गलः = जन्म लेनेके पश्चात् गोकुल-गमनकी इच्छासे कंसके कारागारमें लगे हुए किंवाड़ोंकी अर्गला (सिटकिनी)-का भेदन करनेवाले, ९. भिन्नलोहः = पिताके हाथों और पैरोंमें बँधी हुई लोहेकी हथकड़ी और बेड़ीको संकल्पमात्रसे तोड़ देनेवाले, १०. पितृवाह्यः = पिता वसुदेवके द्वारा सिरपर वहन करने योग्य शिशुरूप श्रीकृष्ण, ११. पितृस्तुतः = अवतारकालमें पिताके द्वारा जिनकी स्तुति की गयी, वे श्रीकृष्ण, १२. मातृस्तुतः = माता देवकीके द्वारा जिनकी स्तुति की गयी वे, १३. शिवध्येयः = भगवान् शङ्करके ध्यानके विषय, १४. यमुनाजलभेदनः =
* गुरोरवज्ञां साधूनां निन्दां भेदं हरे हरौ। वेदनिन्दां हरेर्नामबलात्पापसमीहनम्॥
अर्थवादं हरेर्नाम्नि पाखण्डं नामसंग्रहे। अलसे नास्तिके चैव हरिनामोपदेशनम्॥
नामविस्मरणं चापि नाम्न्यानादरमेव च। संत्यजेद् दूरतो वत्स दोषनेतान्सुदारुणान्॥
(ना० पूर्व० ८२। २२—२४)