संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उत्तरभाग ६७१
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इन चार व्यूहोंवाले सर्वव्यापी भगवान् श्रीधरको नमस्कार है।'
पाँच तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। जो भगवान् गदाधरको पाँच तीर्थोंके जलसे स्नान कराकर उन्हें पुष्प और वस्त्र आदिसे सुशोभित नहीं करता, उसका किया हुआ श्राद्ध व्यर्थ होता है। नागकूट, गृध्रकूट, भगवान् विष्णु तथा उत्तरमानस—इन चारोंके मध्यका भाग 'गयाशिर' कहलाता है। इसीको फल्गुतीर्थ कहते हैं। मुण्डपृष्ठ पर्वतके नीचे परम उत्तम फल्गुतीर्थ हैं। उसमें श्राद्ध आदि करनेसे सब पितर मोक्षको प्राप्त होते हैं। यदि मनुष्य गयाशिरतीर्थमें शमीपत्रके बराबर भी पिण्डदान करता है तो वह जिसके नामसे पिण्ड देता है, उसे सनातन ब्रह्मपदको पहुँचा देता है। जो भगवान् विष्णु अव्यक्त रूप होते हुए भी मुण्डपृष्ठ पर्वत तथा फल्गु आदि तीर्थोंके रूपमें सबके सामने अभिव्यक्त हैं, उन भगवान् गदाधरको मैं नमस्कार करता हूँ। शिला पर्वत तथा फल्गु आदि रूपमें अव्यक्तभावसे स्थित हुए भगवान् श्रीहरि आदिगदाधररूपसे सबके समक्ष प्रकट हुए हैं।
तदनन्तर धर्मारण्यतीर्थको जाय, जहाँ साक्षात् धर्म विराजमान हैं। वहाँ मतङ्गवापीमें स्नान करके तर्पण और श्राद्ध करे। फिर मतङ्गेश्वरके समीप जाकर उन्हें नमस्कार करते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—
प्रमाणं देवताः शम्भुर्लोकपालाश्च साक्षिणः।
मयागत्य मतङ्गेऽस्मिन् पितॄणां निष्कृतिः कृता ॥ १०१-१०२ ॥
'सब देवता और भगवान् शङ्कर प्रमाणभूत हैं तथा समस्त लोकपाल भी साक्षी हैं। मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है—उनका ऋण चुकाया है।'
पहले ब्रह्मतीर्थमें, फिर ब्रह्मकूपमें श्राद्ध आदि करे। कूप और यूपके मध्यभागमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष पितरोंका उद्धार कर देता है। धर्मेश्वर धर्मको नमस्कार करके महाबोधि वृक्षको प्रणाम करे। मोहिनी! यह दूसरे दिनका कृत्य मैंने तुम्हें बताया है। स्नान, तर्पण, पिण्डदान, पूजन और नमस्कार आदिके साथ किया हुआ श्राद्धकर्म पितरोंको सुख देनेवाला होता है।
गयामें तीसरे और चौथे दिनका कृत्य, ब्रह्मतीर्थ तथा विष्णुपद आदिकी महिमा
पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! अब मैं तुम्हें गयाजीमें तीसरे दिनका कृत्य बतलाता हूँ, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। उसका श्रवण गया-सेवनका फल देनेवाला है। 'ब्रह्मसर' में स्नान करके पिण्डसहित श्राद्ध करना चाहिये। (स्नानके समय इस प्रकार कहे—)
स्नानं करोमि तीर्थेऽस्मिन्नृणत्रयविमुक्तये ॥
श्राद्धाय पिण्डदानाय तर्पणायार्थसिद्धये।
(ना० उत्तर० ४६ । २-३)
'मैं तीनों ऋणोंसे मुक्ति पाने, श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान करने तथा अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इस तीर्थमें स्नान करता हूँ।'
ब्रह्मकूप और ब्रह्मयूपके मध्यभागमें स्नान, तर्पण एवं श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। स्नान करके 'ब्रह्मयूप' नामसे प्रसिद्ध जो ऊँचा यूप है, वहाँ श्राद्ध करे। ब्रह्मसरमें श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। गोप्रचारतीर्थके समीप ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न किये हुए आम्रवृक्ष हैं, उनको सींचनेमात्रसे पितृगण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। [आम्रवृक्षको सींचते समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—]
आम्रं ब्रह्मसरोद्भूतं सर्वदेवमयं विभुम्।
विष्णुरूपं प्रसिञ्चामि पितॄणां चैव मुक्तये ॥ ६॥
'ब्रह्मसरमें प्रकट हुआ आम्रवृक्ष सर्वदेवमय
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है, वह सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका स्वरूप है। मैं पितरोंकी तृप्तिके लिये उसका अभिषेक करता हूँ।'
एक मुनि हाथमें जलसे भरा हुआ घड़ा और कुशका अग्रभाग लेकर आमकी जड़में पानी दे रहे थे। उन्होंने आमको भी सींचा और पितरोंको भी तृप्त किया। उनकी एक ही क्रिया दो प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली हुई। ब्रह्मयूपकी परिक्रमा करके मनुष्य वाजपेय-यज्ञका फल पाता है और ब्रह्माजीको नमस्कार करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें ले जाता है। (निम्नाङ्कित मन्त्रसे ब्रह्माजीको नमस्कार करना चाहिये—)
ॐ नमो ब्रह्मणेऽजाय जगज्जन्मादिकारिणे।
भक्तानां च पितॄणां च तारकाय नमो नमः॥ ९॥
'जगत्की सृष्टि, पालन आदि करनेवाले सच्चिदानन्द-स्वरूप अजन्मा ब्रह्माजीको नमस्कार है। भक्तों और पितरोंके उद्धारक पितामहको बारम्बार नमस्कार है।'
तत्पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्रसे इन्द्रिय-संयमपूर्वक यमराजके लिये बलि दे—
यमराजधर्मराजौ निश्चलार्था इति स्थितौ।
ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि पितॄणां मुक्तिहेतवे॥ १०-११॥
'यमराज और धर्मराज—दोनों सुस्थिर प्रयोजनवाले हैं। मैं पितरोंकी मुक्तिके लिये उन दोनोंको बलि अर्पित करता हूँ।'
मोहिनी! इसके बाद 'द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ'— इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रसे कुत्तोंके लिये बलि देकर नीचे लिखे मन्त्रद्वारा संयमपूर्वक काकबलि समर्पित करे—
ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।
वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयार्पितम् ॥ १२-१३॥
'पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, वायव्य कोण तथा नैर्ऋत्यकोणके कौए भूमिपर मेरे दिये हुए इस पिण्डको ग्रहण करें।'
तत्पश्चात् हाथमें कुश लेकर ब्रह्मतीर्थमें स्नान करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष तीसरे दिनका नियम समाप्त करके भगवान् गदाधरको नमस्कार करे और ब्रह्मचर्य पालन करता रहे। चौथे दिन फल्गुतीर्थमें स्नान आदि कार्य करे। फिर गयाशिरमें 'पद' पर पिण्डदानसहित श्राद्ध करे। वहाँ फल्गुतीर्थमें साक्षात् 'गयाशिर' का निवास है। क्रौञ्चपादसे लेकर फल्गुतीर्थतक—साक्षात् गयाशिर है। गयाशिरपर वृक्ष, पर्वत आदि भी हैं, किंतु वह साक्षात् रूपसे फल्गुतीर्थस्वरूप है। फल्गुतीर्थ गयासुरका मुख है। अतः वहाँ स्नान करके श्राद्ध करना चाहिये। आदिदेव भगवान् गदाधर व्यक्त और अव्यक्त रूपका आश्रय ले पितरोंकी मुक्तिके लिये विष्णुपद आदिके रूपमें विद्यमान हैं। वहाँ जो दिव्य विष्णुपद है, वह दर्शनमात्रसे पापका नाश करनेवाला है। स्पर्श और पूजन करनेपर वह पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। विष्णुपदमें पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य अपनी सहस्र पीढ़ियोंका उद्धार करके उन्हें विष्णुलोक पहुँचा देता है। रुद्रपद अथवा शुभ ब्रह्मपदमें श्राद्ध करके पुरुष अपने ही साथ अपनी सौ पीढ़ियोंको शिवधाममें पहुँचा देता है। दक्षिणाग्निपदमें श्राद्ध करनेवाला वाजपेय-यज्ञका और गार्हपत्यपदमें श्राद्ध करनेवाला राजसूय-यज्ञका फल पाता है। चन्द्रपदमें श्राद्ध करके अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। सत्यपदमें श्राद्ध करनेसे ज्योतिष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। आवसथ्यपदमें श्राद्ध करनेवाला चन्द्रलोकको जाता है और इन्द्रपदमें श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको इन्द्रलोक पहुँचा देता है। दूसरे-दूसरे देवताओंके जो पद हैं, उनमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। सबमें काश्यपपद श्रेष्ठ है। विष्णुपद, रुद्रपद तथा ब्रह्मपदको भी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मोहिनी! आरम्भ और समाप्तिके दिनमें इनमेंसे किसी एक पदपर श्राद्ध
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करना श्राद्धकर्ताके लिये भी श्रेयस्कर होता है।
पूर्वकालमें भीष्मजीने विष्णुपदपर श्राद्ध करते समय अपने पितरोंका आवाहन करके विधिपूर्वक श्राद्ध किया और जब वे पिण्डदानके लिये उद्यत हुए, उस समय गयाशिरमें उनके पिता शन्तनुके दोनों हाथ सामने निकल आये। परंतु भीष्मजीने भूमिपर ही पिण्ड दिया, क्योंकि शास्त्रमें हाथपर पिण्ड देनेका अधिकार नहीं दिया गया है। भीष्मके इस व्यवहारसे सन्तुष्ट होकर शन्तनु बोले—'बेटा! तुम शास्त्रीय सिद्धान्तपर दृढ़तापूर्वक डटे हुए हो, अतः त्रिकालदर्शी होओ और अन्तमें तुम्हें भगवान् विष्णुकी प्राप्ति हो; साथ ही जब तुम्हारी इच्छा हो, तभी मृत्यु तुम्हारा स्पर्श करे।' ऐसा कहकर शन्तनु मुक्त हो गये।
भगवान् श्रीराम रमणीय रुद्रपदमें आकर जब पिण्डदान करनेको उद्यत हुए, उस समय पिता दशरथ स्वर्गसे हाथ फैलाये हुए वहाँ आये। किंतु श्रीरामने उनके हाथमें पिण्ड नहीं दिया। शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन न हो जाय, इसलिये उन्होंने रुद्रपदपर ही उस पिण्डको रखा। तब दशरथने श्रीरामसे कहा—'पुत्र! तुमने मुझे तार दिया। रुद्रपदपर पिण्ड देनेसे मुझे रुद्रलोककी प्राप्ति हुई है। तुम चिरकालतक राज्यका शासन, अपनी प्रजाका पालन तथा दक्षिणासहित यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने विष्णुलोकको जाओगे। तुम्हारे साथ अयोध्याके सब लोग, कीड़े-मकोड़ेतक वैकुण्ठधाममें जायँगे।' श्रीरामसे ऐसा कहकर राजा दशरथ परम उत्तम रुद्रलोकको चले गये।
कनकेश, केदार, नारसिंह और वामन—इनकी रथमार्गमें पूजा करके मनुष्य अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर देता है। जो गयाशिरमें जिनके नामसे पिण्ड देते हैं, उनके वे पितर यदि नरकमें हों तो स्वर्गमें जाते हैं और स्वर्गमें हों तो मोक्षलाभ करते हैं। जो गयाशिरमें कन्द, मूल, फल आदिके द्वारा शमीपत्रके बराबर भी पिण्ड देता है, वह अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। जहाँ विष्णु आदिके पद दिखायी देते हैं, वहाँ उनके आगे जिनके पदपर श्राद्ध किया जाता है, उन्हींके लोकोंमें मनुष्य अपने पितरोंको भेजता है। इन पदोंके द्वारा सर्वत्र मुण्डपृष्ठ पर्वत ही लक्षित होता है। वहाँ पूजित होनेवाले पितर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। एक मुनि मुण्डपृष्ठमें कौञ्चरूपसे तपस्या करते थे। उनके चरणोंका चिह्न जहाँ लक्षित होता है, वह क्रौञ्चपद माना गया है। भगवान् विष्णु आदिके पद यहाँ लिङ्गरूपमें स्थित हैं। देवता आदिका तर्पण करके रुद्रपदसे प्रारम्भ करके श्राद्ध करना चाहिये। मोहिनी! यह चौथे दिनका कृत्य बताया गया है। इसे करके मनुष्य पवित्र एवं श्राद्धकर्मका अधिकारी होता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। शिलापर स्थित तीर्थोंमें स्नान और तर्पण करके जिनके लिये पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध किया जाता है, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ कल्पपर्यन्त सानन्द निवास करते हैं।
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गयामें पाँचवें दिनका कृत्य, गयाके विभिन्न तीर्थोंकी पृथक्-पृथक् महिमा
पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! पाँचवें दिन मनुष्य गदालोल-तीर्थमें पूर्ववत् स्नान आदि करके अक्षयवटके समीप पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे। वहाँ श्राद्ध आदि करके वह अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उनकी पूजा करे। अक्षयवटके निकट श्राद्ध करके एकाग्रचित्त हो वटेश्वरका दर्शन, नमस्कार तथा पूजन करे। ऐसा करनेसे श्राद्धकर्ता पुरुष अपने पितरोंको अक्षय तथा सनातन ब्रह्मलोकमें भेज देता है। (गदालोल-तीर्थमें स्नान करते समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—)
गदालोले महातीर्थे गदाप्रक्षालने वरे॥
स्नानं करोमि शुद्ध्यर्थमक्ष्याय स्वराप्तये।
एकान्तरे वटस्याग्रे यः शेते योगनिद्रया॥
बालरूपधरस्तस्मै नमस्ते योगशायिने।
संसारवृक्षशस्त्रायाशेषपापक्षयाय च॥
अक्षय्यब्रह्मदात्रे च नमोऽक्षय्यवटाय वै।
(ना० उत्तर० ४७। ४–७)
'जहाँ भगवान्की गदा धोयी गयी है, उस गदालोल नामक श्रेष्ठ महातीर्थमें मैं आत्मशुद्धि तथा अक्षय स्वर्गकी प्राप्तिके लिये स्नान करता हूँ। जो बालरूप धारण करके वटकी शाखाके अग्रभागपर एकान्त स्थलमें योगनिद्राके द्वारा शयन करते हैं, उन योगशायी श्रीहरिको नमस्कार है। जो संसाररूपी वृक्षका उच्छेद करनेके लिये शस्त्ररूप हैं, जो समस्त पापोंका नाश तथा अक्षय ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले हैं, उन अक्षयवटस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है।'
(इसके बाद लिङ्गस्वरूप प्रपितामहको नमस्कार करे—)
कलौ माहेश्वरा लोका येन तस्माद् गदाधरः।
लिङ्गरूपोऽभवत् तं वन्दे त्वां प्रपितामहम्॥७-८॥
'कलियुगमें लोग प्रायः शिवभक्त होते हैं, इसलिये भगवान् गदाधर वहाँ शिवलिङ्गरूपमें प्रकट हुए हैं। प्रभो! आप पितामह ब्रह्माके भी पिता होनेसे प्रपितामहरूप हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।'
इस मन्त्रसे उन प्रपितामहदेवको नमस्कार करके मनुष्य अपने पितरोंको रुद्रलोकमें पहुँचा देता है। हेति नामसे प्रसिद्ध एक असुर था; भगवान्ने अपनी गदासे उस असुरके मस्तकके दो टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् जहाँ वह गदा धोयी गयी, वह गदालोल नामसे विख्यात श्रेष्ठ तीर्थ हो गया। हेति राक्षस ब्रह्माजीका पुत्र था। उसने बड़ी अद्भुत तपस्या की। तपस्यासे वरदायक ब्रह्मा आदि देवताओंको सन्तुष्ट करके यह वर माँगा—'मैं दैत्य आदिसे, शस्त्र आदिसे, नाना प्रकारके मनुष्योंसे तथा विष्णु और शिव आदिके चक्र एवं त्रिशूल आदि आयुधोंद्वारा अवध्य और महान् बलवान् होऊँ।' 'तथास्तु' कहकर देवता अन्तर्धान हो गये। तब हेतिने देवताओंको जीत लिया और स्वयं इन्द्रपदका उपभोग करने लगा। तब ब्रह्मा और शिव आदि देवता भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और बोले—'भगवन्! हेतिका वध कीजिये।'
भगवान्ने कहा—'देवताओ! हेति तो समस्त सुर और असुरोंके लिये अवध्य है। तुम लोग मुझे कोई ब्रह्माजीका अस्त्र दो, जिससे मैं हेतिको मारूँ।'
उनके ऐसा कहनेपर ब्रह्मादि देवताओंने भगवान् विष्णुको वह गदा दे दी और कहा—'उपेन्द्र! आप हेतिको मार डालिये।' देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान्ने वह गदा धारण की। फिर युद्धमें गदाधरने गदासे हेतिको मारकर देवताओंको स्वर्गलोक लौटा दिया।
तदनन्तर महानदीमें स्थित गायत्री-तीर्थमें उपवासपूर्वक स्नान करके गायत्रीदेवीके समक्ष