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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \ २०१

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २०१


**ब्राह्मण जडभरत कहते हैं—**ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघ सहसा उनके ऊपर चढ़ गये और इस प्रकार बोले—‘सुनिये, आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे हैं, वह अब समझाकर कहता हूँ। इस समय मैं राजाकी भाँति ऊपर हूँ और श्रीमान् गजराजकी भाँति नीचे। ब्राह्मणदेव! आपको भलीभाँति समझानेके लिये ही मैंने यह दृष्टान्त दिखाया है।<br><br>**ऋभुने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! यदि आप राजाके समान हैं और मैं हाथीके समान हूँ तो यह बताइये कि आप कौन हैं और मैं कौन हूँ?<br><br>**ब्राह्मण कहते हैं—**ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघने तुरंत ही उनके दोनों चरणोंमें मस्तक नवाया और कहा—‘भगवन्! आप निश्चय ही मेरे आचार्यपाद महर्षि ऋभु हैं; क्योंकि दूसरेका हृदय इस प्रकार अद्वैत-संस्कारसे सम्पन्न नहीं है, जैसा कि मेरे आचार्यका। अतः मेरा विश्वास है, आप मेरे गुरुजी ही यहाँ पधारे हुए हैं।<br><br>**ऋभुने कहा—**निदाघ! पहले तुमने मेरी बड़ी सेवा-शुश्रूषा की है। इसलिये अत्यन्त स्नेहवश मैं तुम्हें उपदेश देनेके लिये तुम्हाराआचार्य ऋभु ही यहाँ आया हूँ। महामते! समस्त पदार्थोंमें अद्वैत आत्मबुद्धि होना ही परमार्थका सार है। मैंने तुम्हें संक्षेपसे उसका उपदेश कर दिया।<br><br>**ब्राह्मण जडभरत कहते हैं—**विद्वान् गुरु महर्षि ऋभु निदाघसे ऐसा कहकर चले गये। निदाघ भी उनके उपदेशसे अद्वैतपरायण हो गये और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेसे अभिन्न देखने लगे। ब्रह्मर्षि निदाघने इस प्रकार ब्रह्मपरायण होकर परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। धर्मज्ञ नरेश! इसी प्रकार तुम भी आत्माको सबमें व्याप्त जानते हुए अपनेमें तथा शत्रु और मित्रमें समान भाव रखो।<br><br>**सनन्दनजी कहते हैं—**ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ सौवीर-नरेशने परमार्थकी ओर दृष्टि रखकर भेदबुद्धि त्याग दी और वे ब्राह्मण भी पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करके बोधयुक्त हो उसी जन्ममें मुक्त हो गये। मुनीश्वर नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हें परमार्थरूप यह अध्यात्मज्ञान बताया है। इसे सुननेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको भी यह मुक्ति प्रदान करनेवाला है।

शिक्षा-निरूपण

**सूतजी कहते हैं—**सनन्दनजीका ऐसा वचन सुनकर नारदजी अतृप्त-से रह गये। वे और भी सुननेके लिये उत्सुक होकर भाई सनन्दनजीसे बोले।<br><br>**नारदजीने कहा—**भगवन्! मैंने आपसे जो कुछ पूछा है, वह सब आपने बता दिया। तथापि भगवत्सम्बन्धी चर्चाको बारंबार सुनकर भी मेरा मन तृप्त नहीं होता—अधिकाधिक सुननेके लिये उत्कण्ठित हो रहा है। सुना जाता है, परम धर्मज्ञ व्यास-पुत्र शुकदेवजीने आन्तरिक और बाह्य-सभी भोगोंसे पूर्णतः विरक्त होकर बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली। ब्रह्मन्! महात्माओंकी सेवा (सत्सङ्ग) किये बिना प्रायः पुरुषको विज्ञान (तत्त्व-ज्ञान) नहीं प्राप्त होता, किंतु व्यासनन्दन शुकदेवने बाल्यावस्थामें ही ज्ञान पा लिया; यह कैसे सम्भव हुआ? महाभाग! आप मोक्षशास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले हैं। मैं सुनना चाहता हूँ, आप मुझसे शुकदेवजीका रहस्यमय जन्म और कर्म कहिये।<br><br>**सनन्दनजी बोले—**नारद! सुनो, मैं शुकदेवजीकी
२०२* संक्षिप्त नारदपुराण *

उत्पत्तिका वृत्तान्त संक्षेपसे कहूँगा। मुने! इस वृत्तान्तको सुनकर मनुष्य ब्रह्मतत्त्वका ज्ञाता हो सकता है। अधिक आयु हो जानेसे, बाल पक जानेसे, धनसे अथवा बन्धु-बान्धवोंसे कोई बड़ा नहीं होता। ऋषि-मुनियोंने यह धर्मपूर्ण निश्चय किया है कि हमलोगोंमें जो 'अनूचान' हो, वही महान् है।

नारदजीने पूछा—सबको मान देनेवाले विप्रवर! पुरुष 'अनूचान' कैसे होता है? वह उपाय मुझे बताइये; क्योंकि उसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।

सनन्दनजी बोले—नारद! सुनो, मैं अनूचानका लक्षण बताता हूँ, जिसे जानकर मनुष्य अङ्गोंसहित वेदोंका ज्ञाता होता है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्दःशास्त्र—इन छःको विद्वान् पुरुष वेदाङ्ग कहते हैं। धर्मका प्रतिपादन करनेमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चार वेद ही प्रमाण बताये गये हैं। जो श्रेष्ठ द्विज गुरुसे छहों अङ्गोंसहित वेदोंका अध्ययन भलीभाँति करता है, वह 'अनूचान' होता है; अन्यथा करोड़ों ग्रन्थ बाँच लेनेसे भी कोई 'अनूचान' नहीं कहला सकता।

नारदजीने कहा—मानद! आप अङ्गोंसहित इन सम्पूर्ण वेदोंके महापण्डित हैं। अतः मुझे अङ्गों और वेदोंका लक्षण विस्तारपूर्वक बताइये।

सनन्दनजी बोले—ब्रह्मन्! तुमने मुझपर प्रश्नका यह अनुपम भार रख दिया। मैं संक्षेपसे इन सबके सुनिश्चित सार-सिद्धान्तका वर्णन करूँगा। वेदवेत्ता ब्रह्मर्षियोंने वेदोंकी शिक्षामें स्वरको प्रधान कहा है; अतः स्वरका वर्णन करता हूँ, सुनो—स्वर-शास्त्रोंके निश्चयके अनुसार विशेषरूपसे आर्चिक (ऋक्सम्बन्धी), गाथिक (गाथा-सम्बन्धी) और सामिक (साम-सम्बन्धी) स्वर-व्यवधानका प्रयोग करना चाहिये। ऋचाओंमें एकका अन्तर देकर स्वर होता है। गाथाओंमें दोके व्यवधानसे और साम-मन्त्रोंमें तीनके व्यवधानसे स्वर होता है। स्वरोंका इतना ही व्यवधान सर्वत्र जानना चाहिये।

ऋक्, साम और यजुर्वेदके अङ्गभूत जो याज्य-स्तोत्र, करण और मन्त्र आदि याज्ञिकोंद्वारा यज्ञोंमें प्रयुक्त होते हैं, शिक्षा-शास्त्रका ज्ञान न होनेसे उनमें विस्वर (विरुद्ध स्वरका उच्चारण) हो जाता है। मन्त्र यदि यथार्थ स्वर और वर्णसे हीन हो तो मिथ्या-प्रयुक्त होनेके कारण वह उस अभीष्ट अर्थका बोध नहीं कराता; इतना ही नहीं, वह वाक्रूपी वज्र यजमानकी हिंसा कर देता है—जैसे 'इन्द्रशत्रु' यह पद स्वरभेदजनित अपराधके कारण यजमानके लिये ही अनिष्टकारी हो गया*। सम्पूर्ण वाङ्मयके उच्चारणके लिये वक्षःस्थल, कण्ठ और सिर—ये तीन स्थान हैं। इन तीनोंको सवन कहते हैं, अर्थात् वक्षःस्थानमें नीचे स्वरसे जो शब्दोच्चारण होता है, उसे प्रातःसवन कहते हैं; कण्ठस्थानमें मध्यम स्वरसे किये हुए शब्दोच्चारणका नाम माध्यन्दिनसवन है तथा मस्तकरूप स्थानमें उच्च स्वरसे जो शब्दोच्चारण होता है, उसे तृतीयसवन


*तैत्तिरीय शाखाकी कृष्णयजुःसंहिताके द्वितीय काण्डमें पञ्चम प्रपाठकके द्वितीय अनुवाककी प्रथम पञ्चशतीमें मन्त्र आया है—'स्वाहेन्द्रशत्रुर्वर्धस्व।' पौराणिक कथाके अनुसार त्वष्टा प्रजापतिने 'इन्द्रके शत्रु' वृत्रके अभ्युदयके लिये इस मन्त्रका उच्चारण किया था। 'इन्द्रस्य शत्रुः' इस विग्रहके अनुसार षष्ठी-समासमें समासान्तप्रयुक्त अन्तोदात्तका उच्चारण अभीष्ट था; परंतु प्रयोगमें पूर्वपदप्रकृतिस्वर-आद्युदात्त बोला गया; अतः वह बहुव्रीहिके अर्थका प्रकाशक हो गया। इसलिये 'इन्द्र है शत्रु (संहारक) जिसका वह' ऐसा अर्थ निकलनेके कारण वृत्रासुर ही इन्द्रके हाथसे मारा गया।