संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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शृङ्गोन्नति शुभप्रद है। तिथिके अनुसार चन्द्रमामें शुक्ल न होकर यदि शुक्लतामें हानि (कमी) हो तो प्रजाके कार्योंमें हानि और शुक्लतामें वृद्धि (अधिकता) हो तो प्रजाजनकी वृद्धि होती है*। समतामें समता समझनी चाहिये। यदि चन्द्रमाका विम्ब मध्यम मानसे विशाल (बड़ा) देखनेमें आवे तो सुभिक्षकारक (सस्ती लानेवाला) और छोटा दीख पड़े तो दुर्भिक्षकारक (महँगी या अकाल लानेवाला) होता है। चन्द्रमाका शृङ्ग अधोमुख हो तो शस्त्रका भय लाता है। दण्डाकार हो तो कलह (राजा-प्रजामें युद्ध) होता है। चन्द्रमाका शृङ्ग अथवा विम्ब मङ्गलादि ग्रहों (मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि)-से आहत (भेदित) दीख पड़े तो क्रमशः क्षेम, अन्नादि, वर्षा, राजा और प्रजाका नाश होता है॥ २३-२६ १/२ ॥
(भौम-चार-फल—) जिस नक्षत्रमें मङ्गलका उदय हो, उससे सातवें, आठवें या नवें नक्षत्रमें वक्र हो तो वह 'उष्ण' नामक वक्र होता है। उसमें प्रजाको पीड़ा और अग्निका भय प्राप्त होता है। यदि उदयके नक्षत्रसे दसवें, ग्यारहवें तथा बारहवें नक्षत्रमें मङ्गल वक्र हो तो वह 'अश्वमुख' नामक वक्र होता है। उसमें अन्न और वर्षाका नाश होता है। यदि तेरहवें या चौदहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो 'व्यालमुख' वक्र कहलाता है। उसमें भी अन्न और वर्षाका नाश होता है। पंद्रहवें या सोलहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो 'रुधिरमुख' वक्र कहलाता है। उसमें मङ्गल दुर्भिक्ष, क्षुधा तथा रोगको बढ़ाता है। सत्रहवें या अट्ठारहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो वह 'मुसल' नामक वक्र होता है। उससे धन-धान्यका नाश तथा दुर्भिक्षका भय होता है। यदि मङ्गल पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें उदित होकर उत्तराषाढ़में वक्र हो तथा रोहिणीमें अस्त हो तो तीनों लोकोंके लिये नाशकारी होता है। यदि मङ्गल श्रवणमें उदित होकर पुष्यमें वक्रगति हो तो धनकी हानि करनेवाला होता है॥ २७-३३॥
मङ्गल जिस दिशामें उदित होता है, उस दिशाके राजाके लिये भयकारक होता है। यदि मघा-नक्षत्रके मध्य होकर चलता हुआ मङ्गल उसीमें वक्र हो जाय तो अवर्षण (वर्षाका अभाव) और शस्त्रका भय लाता है तथा राजाके लिये विनाशकारी होता है। यदि मङ्गल मघा, विशाखा या रोहिणीके योगताराका भेदन करके चले तो दुर्भिक्ष, मरण तथा रोग लानेवाला होता है। उत्तरा-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, मूल, श्रवण और मृगशिरा—इन नक्षत्रोंके बीचमें तथा रोहिणीके दक्षिण होकर मङ्गल चले तो अनावृष्टिकारक होता है। मङ्गल सब नक्षत्रोंके उत्तर होकर चले तो शुभप्रद है और दक्षिण होकर चले तो अशुभ फल देनेवाला तथा प्रजामें कलह उत्पन्न करनेवाला होता है॥ ३४-३७ १/२ ॥
(बुध-चार-फल—) यदि कदाचित् आँधी, मेघ आदि उत्पात न होनेपर (शुद्ध आकाशमें) भी बुधका उदय देखनेमें न आवे तो अनावृष्टि, अग्निभय, अनर्थ और राजाओंमें युद्धकी सम्भावना समझनी चाहिये। धनिष्ठा, श्रवण, उत्तराषाढ़, मृगशिरा और रोहिणीमें चलता हुआ बुध यदि उन नक्षत्रोंके योगताराओंका भेदन करे तो वह लोकमें बाधा और अनावृष्टि आदिके द्वारा भयकारी होता है। यदि आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा और मघा—इन नक्षत्रोंमें बुध दृश्य हो तो दुर्भिक्ष, कलह, रोग तथा अनावृष्टि आदिका भय उपस्थित करनेवाला
४०० और १२०० मान लिये गये हैं। क्रमशः इन्हें ही 'अनागत' और 'गतयोगी' कहा गया है। शेष नक्षत्रोंके भोगस्थान अन्तिमांशमें ही पड़ते हैं; अतः इनके मान ८०० कला हैं। ये ही मध्ययोगी हैं।
*प्रतिपदाके अन्तमें (शुक्ल-द्वितीयारम्भमें) चन्द्रमा दृश्य हो तो समता, उससे पश्चात् दृश्य हो तो हानि और पूर्व दृश्य हो तो वृद्धि समझी जाती है।
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होता है। हस्तसे छः (हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा तथा ज्येष्ठा) नक्षत्रोंमें बुधके रहनेसे लोकमें कल्याण, सुभिक्ष तथा आरोग्य होता है। उत्तर भाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, कृत्तिका और भरणीमें विचरनेवाला बुध वैद्य, घोड़े और व्यापारियोंका नाश करनेवाला होता है। पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपदमें विचरता हुआ बुध यदि इन नक्षत्रोंके योगताराओंका भेदन करे तो क्षुधा, शस्त्र, अग्नि और चोरोंसे प्राणियोंको भय प्राप्त होता है॥ ३८–४३ १/२॥
भरणी, कृत्तिका, रोहिणी और स्वाती—इन नक्षत्रोंमें बुधकी गति 'प्राकृतिकी' कही गयी है। आर्द्रा, मृगशिरा, आश्लेषा और मघा—इन नक्षत्रोंमें बुधकी गति 'मिश्रा' मानी गयी है। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य और पुनर्वसु—इनमें बुधकी 'संक्षिप्ता' गति कही गयी। पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद, रेवती और अश्विनी—इनमें बुधकी 'तीक्ष्णा' गति होती है। उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़ और मूलमें उनकी 'योगान्तिका' गति मानी गयी है। श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा और शतभिषामें 'घोरा' गति और विशाखा, अनुराधा तथा हस्त—इन नक्षत्रोंमें बुधकी 'पाप' संज्ञक गति होती है। इन प्राकृत आदि सात प्रकारकी गतियोंमें उदित होनेपर जितने दिनतक बुध दृश्य रहता है, उतने ही दिन उनमें अस्त होनेपर अदृश्य रहता है। उन दिनोंकी संख्या क्रमसे ४०, ३०, २२, १८, ९, १५ और ११ है। बुध जब प्राकृत गतिमें रहता है, तब संसारमें कल्याण, आरोग्य और सुभिक्ष (अन्न-वस्त्र आदिकी वृद्धि) करता है। मिश्र और संक्षिप्त गतिमें मध्यम फल देता है तथा अन्य गतियोंमें अनावृष्टि (दुर्भिक्ष)-कारक होता है। वैशाख, श्रावण, पौष और आषाढ़में उदित होनेपर बुध पापरूप फल देता है और अन्य मासोंमें उदित होनेपर वह शुभ फल देता है। आश्विन और कार्तिकमें बुधका उदय हो तो शस्त्र, दुर्भिक्ष और अग्निका भय प्राप्त होता है। यदि उदित हुए बुधकी कान्ति चाँदी अथवा स्फटिकके समान स्वच्छ हो तो वह श्रेष्ठ फल देनेवाला होता है॥ ४४–५२॥
(बृहस्पति-चार-फल—) कृत्तिका आदि दो-दो नक्षत्रोंके आश्रयसे कार्तिक आदि मास होते हैं; परंतु अन्तिम (आश्विन), पञ्चम (फाल्गुन) और एकादश (भाद्रपद)—ये तीन नक्षत्रोंसे पूर्ण होते हैं*। इसी प्रकार बृहस्पतिका जिन नक्षत्रोंमें उदय होता है, उन नक्षत्रोंसे (मासके अनुसार ही) संवत्सरोंके नाम होते हैं। उन संवत्सरोंमें कार्तिक और मार्गशीर्ष नामक संवत्सर प्राणियोंके लिये अशुभ फलदायक होते हैं। पौष और माघ नामक संवत्सर शुभ फल देनेवाले होते हैं। फाल्गुन और चैत्र नामक संवत्सर मध्यम (शुभ-अशुभ दोनों) फल देते हैं। वैशाख शुभप्रद और ज्येष्ठ मध्यम फल देनेवाला होता है। आषाढ़ मध्यम और श्रावण श्रेष्ठ होता है तथा भाद्रपद भी कभी श्रेष्ठ होता है और कभी नहीं होता; परंतु आश्विन संवत्सर तो प्रजाजनोंके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ होता है। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार संवत्सरोंका फल समझना चाहिये॥ ५३–५५ १/२॥
*कृत्तिका आदि नक्षत्रोंमें पूर्णिमा होनेसे मासोंके कार्तिक आदि नाम होते हैं। नीचे चक्रमें देखिये—
| कार्तिक | मार्गशीर्ष | पौष | माघ | फाल्गुन | चैत्र | वैशाख | ज्येष्ठ | आषाढ़ | श्रावण | भाद्रपद | आश्विन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृत्तिका | मृगशिरा | पुनर्वसु | आश्लेषा | पूर्वाफाल्गुनी | चित्रा | विशाखा | ज्येष्ठा | पूर्वाषाढ़ | श्रवण | शतभिषा | रेवती |
| रोहिणी | आर्द्रा | पुष्य | मघा | उत्तराफाल्गुनी<br>हस्त | स्वाती | अनुराधा | मूल | उत्तराषाढ़ | धनिष्ठा | पूर्व भाद्रपद<br>उत्तर भाद्रपद | अश्विनी<br>भरणी |
| २ | २ | २ | २ | ३ | २ | २ | २ | २ | २ | ३ | ३ |