संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५७७
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७७
सुवर्णमयी प्रतिमाका श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान करे। ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणाद्वारा उन्हें संतुष्ट करके विदा करे। इस तरह व्रत करनेवाले पुरुषका दाम्पत्यसुख चिरस्थायी होता है और वह सात जन्मोंतक इहलोक और परलोकके अभीष्ट भोगोंको भोगता रहता है।
वैशाख शुक्ला द्वादशीको उपवास और इन्द्रियसयंमपूर्वक गन्ध आदि उपचारोंद्वारा भक्तिभावसे भगवान् माधवकी पूजा करे। फिर तृप्तिजनक मधुर पकवान और एक घड़ा जल ब्राह्मणको विधिपूर्वक देवे। 'भगवान् माधव मुझपर प्रसन्न हों', यही उसका उद्देश्य होना चाहिये। ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंके द्वारा भगवान् त्रिविक्रमकी पूजा करके व्रती पुरुष ब्राह्मणको मिष्ठान्नसे भरा हुआ करवा निवेदन करे। तत्पश्चात् एक समय भोजनका व्रत करे। इस व्रतसे संतुष्ट होकर देवदेव भगवान् त्रिविक्रम जीवनमें विपुल भोग और अन्तमें मोक्ष भी देते हैं। आषाढ़ शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदिसे पृथक्-पृथक् बारह ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें मिष्ठान्न भोजन करावे। फिर उनके लिये वस्त्र छड़ी, यज्ञोपवीत, अँगूठी और जलपात्र—इन वस्तुओंको भक्तिपूर्वक दान करे। 'भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों'—यही उस दानका उद्देश्य होना चाहिये। श्रावण शुक्ला द्वादशीको व्रती पुरुष भगवत्परायण हो गन्ध आदि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीधरकी पूजा करे। फिर उत्तम ब्राह्मणोंको दही-भात भोजन कराकर चाँदीकी दक्षिणा दे, उन्हें नमस्कार करके विदा करे। मन-ही-मन यह भावना करे कि 'मेरे इस व्रतसे देवेश्वर भगवान् श्रीधर प्रसन्न हों।' भाद्रपद शुक्ला द्वादशीको व्रती पुरुष भगवान् वामनकी पूजा करके उनके आगे बारह ब्राह्मणोंको खीर भोजन करावे। तत्पश्चात् स्वर्णमयी दक्षिणा दे। वह भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताको करनेवाला होता है। आश्विन शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान् पद्मनाभकी पूजा करे और उनके आगे ब्राह्मणोंको मिष्ठान्न भोजन करावे। साथ ही वस्त्र और सुवर्ण-दक्षिणा दे। द्विजोत्तम! इस व्रतसे संतुष्ट होकर भगवान् पद्मनाभ श्वेतद्वीपकी प्राप्ति कराते हैं और इहलोकमें भी मनोवाञ्छित भोग प्रदान करते हैं। कार्तिक मासके कृष्णपक्षमें 'गोवत्सद्वादशी' का व्रत होता है। उसमें बछड़ेसहित गौकी आकृति लिखकर सुगन्धित चन्दन आदिके द्वारा तथा पुष्पमालाओंसे उसकी पूजा करे। फिर ताम्रपात्रमें फूल, अक्षत और तिल रखकर उन सबके द्वारा विधिपूर्वक अर्घ्य दान करे। नारद! निम्नाङ्कित मन्त्रसे उसके चरणोंमें अर्घ्य देना चाहिये—
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते।
सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते॥
मातर्मातर्गवां मातर्गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व० १२१। ३०-३१)
'क्षीरसागरसे प्रकट हुई, सर्वदेवभूषिता, देव-
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दानववन्दिता, सम्पूर्ण देवस्वरूपा देवि! तुम्हें नमस्कार है। मातः! गोमातः! यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।'
तदनन्तर उड़द आदिसे बने हुए बड़े निवेदन करे। इस प्रकार अपने वैभवके अनुसार दस, पाँच या एक बड़ा अर्पण करना चाहिये। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
सुरभे त्वं जगन्माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता।
सर्वदेवमयि ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस॥
सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते।
मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि॥
(ना० पूर्व० १२१। ३२–३४)
'सुरभि! तुम सम्पूर्ण जगत्की माता हो और सदा भगवान् विष्णुके धाममें निवास करती हो। सर्वदेवमयी देवि! मेरे दिये हुए इस ग्रासको ग्रहण करो। देवि! तुम सर्वदेवस्वरूपा हो। सम्पूर्ण देवता तुम्हें विभूषित करते हैं। माता नन्दिनी! मेरी अभिलाषा सफल करो।'
द्विजोत्तम! उस दिन तेलका पका हुआ और बटलोईका पका हुआ अन्न न खाय। गायका दूध, दही, घी और तक्र भी त्याग दे। ब्रह्मन्! कार्तिक शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंसे एकाग्रचित्त हो भगवान् दामोदरकी पूजा करे और उनके आगे बारह ब्राह्मणोंको पकवान भोजन करावे। तदनन्तर जलसे भरे हुए घड़ोंको वस्त्रसे आच्छादित और पूजित करके सुपारी, लड्डू और सुवर्णके साथ उन सबको प्रसन्नतापूर्वक अर्पण करे। ऐसा करनेपर मनुष्य भगवान् विष्णुका प्रिय भक्त और सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता होता है और शरीरका अन्त होनेपर वह भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
मार्गशीर्ष शुक्ला द्वादशीको परम उत्तम 'साध्य-व्रत' का अनुष्ठान करना चाहिये। मनोभाव, प्राण, नर, अपान, वीर्यवान्, चिति, हय, नय, हंस, नारायण, विभु और प्रभु—ये बारह साध्यगण कहे गये हैं¹। चावलोंपर इनका आवाहन करके गन्ध-पुष्प आदिके द्वारा पूजन करना चाहिये। तदनन्तर 'भगवान् नारायण प्रसन्न हों', इस भावनासे बारह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें उत्तम दक्षिणा दे विदा करे। उसी दिन 'द्वादशादित्य' नामक व्रत भी विख्यात है। उस दिन बुद्धिमान् पुरुष बारह आदित्योंकी पूजा करे। धाता, मित्र, अर्यमा, पूषा, शक्र, अंश, वरुण, भग, त्वष्टा, विवस्वान्, सविता और विष्णु—ये बारह आदित्य बताये गये हैं।² प्रत्येक मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको यत्नपूर्वक बारह आदित्योंकी पूजा करते हुए एक वर्ष व्यतीत करे। व्रतके अन्तमें सोनेकी बारह प्रतिमाएँ बनवाये और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके बारह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक मिष्टान्न भोजन करावे। तत्पश्चात् व्रती पुरुष प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक प्रतिमा दे। इस प्रकार द्वादशादित्य नामक व्रत करके मनुष्य सूर्यलोकमें जा वहाँके भोगोंका चिरकालतक उपभोग करनेके पश्चात् पृथ्वीपर धर्मात्मा मनुष्य होता है। मनुष्ययोनिमें उसे रोग नहीं होते। उस व्रतके पुण्यसे वह पुनः उसी व्रतको पाता है और पुनः उसके पुण्यसे सूर्यमण्डलको भेदकर निरञ्जन, निराकार एवं निर्द्वन्द्व ब्रह्मको प्राप्त होता है।
१. मनोभवस्तथा प्राणो नरोऽपानश्च वीर्यवान्। चितिर्हयो नयश्चैव हंसो नारायणस्तथा॥
विभुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः।
(ना० पूर्व० १२१। ५१-५२)
२. धाता मित्रोऽर्यमा पूषा शक्रोऽशो वरुणो भगः। त्वष्टा विवस्वान् सविता विष्णुर्द्वादश ईरिताः॥
(ना० पूर्व० १२१। ५५-५६)