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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

उत्तरभाग ६६५

  • उत्तरभाग * ६६५

अन्यान्य सुगन्धित पुष्प यथाशक्ति गङ्गाजीमें छोड़े और अत्यन्त भक्तिभावसे निम्नाङ्कित पौराणिक मन्त्रोंका उच्चारण करता रहे—'ॐ गङ्गायै नमः, ॐ नारायण्यै नमः, ॐ शिवायै नमः।' मोहिनी! प्रत्येक मासकी पूर्णिमा और अमावास्याको प्रातः-काल एकाग्रचित्त हो इसी विधिसे गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य एक वर्षतक हविष्यभोजी, मिताहारी तथा ब्रह्मचारी रहकर दिनमें अथवा रात्रिके समय नियमपूर्वक भक्ति और प्रसन्नताके साथ यथाशक्ति गङ्गाजीकी पूजा करता है, उसे वर्षके अन्तमें ये गङ्गादेवी दिव्य शरीर धारण करके दिव्य माला, दिव्य वस्त्र तथा दिव्य रत्नोंसे विभूषित हो प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं और वर देनेके लिये उसके सामने खड़ी हो जाती हैं। शुभे! इस प्रकार दिव्य देहधारिणी प्रत्यक्षरूपा गङ्गाजीका अपने नेत्रोंसे दर्शन करके मनुष्य कृतकृत्य होता है। वह मानव जिन-जिन भोगोंकी कामना करता है, उन सबको प्राप्त कर लेता है और जो ब्राह्मण निष्कामभावसे गङ्गाकी आराधना करता है, वह उसी जन्ममें मोक्ष पा जाता है। गङ्गाजीके पूजनका यह सांवत्सरव्रत भगवान् लक्ष्मीपतिको संतुष्ट करनेवाला एवं मोक्ष देनेवाला है।

**वसिष्ठजी कहते हैं—**राजेन्द्र! वसुका यह गङ्गामाहात्म्यसूचक वचन सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहित विप्रवर वसुसे पूछा।

**मोहिनी बोली—**ब्रह्मन्! गङ्गाजीके तटपर गङ्गा आदिके स्थापन और पूजनका क्या फल है? मुझ अबलाको गङ्गाजीके माहात्म्यसे युक्त देवाराधनकी विधि बताइये, जिसे सुनकर पापसे छुटकारा मिल जाता है।

**पुरोहित वसु बोले—**देवि! तुमने सब लोकोंके हितकी कामनासे बहुत उत्तम बात पूछी है। गङ्गाजीका सम्पूर्ण माहात्म्य बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें वृषभध्वज भगवान् शिवने कृपापूर्वक इसका वर्णन किया था। देवी पार्वतीने प्रेमपूर्वक उनसे प्रश्न किया था और उन्होंने गङ्गाजीके तटपर बैठकर गङ्गाजीका माहात्म्य उन्हें सुनाया था। देवताओंने पूर्वाह्नकालमें, ऋषियोंने मध्याह्नकालमें, पितरोंने अपराह्नकालमें तथा गुह्यक आदिने रात्रिके प्रथम भागमें भोजन किया है। इन सब वेलाओंका उल्लंघन करके रातमें भोजन करना उत्तम है। अतः नक्तव्रतका आचरण करना चाहिये। रातको भोजन करनेवाले नक्त-व्रतीको ये छः कर्म अवश्य करने चाहिये—स्नान, हविष्य-भोजन, सत्यभाषण, स्वल्पाहार, अग्निहोत्र तथा भूमिशयन। जो कोई भी साधक हो, वह माघ मासमें गङ्गातटपर शिव-मन्दिरके समीप रातमें घी मिलायी हुई खिचड़ी भोजन करे। भोजन आरम्भ करनेसे पहले भगवान् शिवको खिचड़ीका ही नैवेद्य लगावे। काष्ठ-मौन होकर भोजन करे और जिह्वाकी लोलुपता त्याग दे। भगवान् शिवको स्मरण करके जितेन्द्रियभावसे पलाशके पत्तेमें नियमपूर्वक भोजन करे। धर्मराज तथा देवीके लिये पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीको उपवास करे। पूर्णिमाके दिन गन्ध और गङ्गाजलसे तथा दूध, दही, घी, शहद (और शर्करा)-से भगवान् शिवको नहलाकर शिवलिङ्गके मस्तकपर धतूरका फूल चढ़ावे। तत्पश्चात् यथाशक्ति घीका पकाया हुआ पूआ निवेदन करे। फिर एक आढक तिल लेकर शिवलिङ्गके ऊपर चढ़ावे। नील तथा लाल कमलके फूलोंसे सर्वेश्वर शिवका पूजन करे। कमलका फूल न मिले तो सुवर्णमय कमलसे महादेवजीकी पूजा करे। मधुयुक्त खीरका भोग लगावे। घृतमिश्रित गुग्गुलका धूप दे। घीका दीपक जलावे। चन्दन आदिसे अनुलेपन करे। भक्तिपूर्वक महेश्वरको बिल्वपत्र और फल चढ़ावे। उनकी प्रसन्नताके लिये काले रंगकी गौ और काले रंगका बैल दान करे। उन गाय-बैलोंकी शक्ल-सूरत

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एक-सी होनी चाहिये। माघ मास व्यतीत होनेपर आठ ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे। ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक रहे। इस प्रकार यम-नियम, श्रद्धा और भक्तिसे युक्त होकर जो एक बार भी शास्त्रीय विधिसे इस व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोगोंको भोगता है और मृत्युके पश्चात् परम उत्तम गतिका भागी होता है।

वैशाख शुक्ला चतुर्दशीको एकाग्रचित्त होकर अगहनीके चावलका भात और दूध रातमें भोजन करे। पुष्प आदिसे भगवान् शिवकी पूजा करे। उन्हें भोज्य पदार्थ निवेदन करके काष्ठ-मौन होकर भोजन करे। उस दिन पवित्र हो मौन-भावसे बरगदकी लकड़ीद्वारा दन्तधावन करे। रातमें गङ्गातटपर शिवलिङ्गके समीप सोये। प्रातःकाल पूर्णिमाको विधिपूर्वक गङ्गामें स्नान करके उपवास-व्रतका संकल्प लेकर रातमें जागरण करे। शिवलिङ्गको घीसे नहलाकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिके द्वारा उनका पूजन करके एक सुन्दर वृषभको श्वेत पुष्प, वस्त्र, हल्दी और चन्दनसे अलंकृत करके विधिपूर्वक भगवान् शिवके लिये निवेदन करे। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति खीर भोजन करावे। इस प्रकार जो श्रद्धा और भक्तिके साथ एक बार भी उक्त नियमका पालन करता है, वह अन्तमें मुक्त हो जाता है।

ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको हस्त नक्षत्रका योग होनेपर स्त्री हो या पुरुष, भक्तिभावसे गङ्गाजीके तटपर जाकर रात्रिमें जागरण करना चाहिये और दस प्रकारके फूलोंसे, दस प्रकारकी गन्धसे, दस तरहके नैवेद्योंसे तथा दस-दस ताम्बूल एवं दीप आदिसे श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके पहले भक्तिपूर्वक शास्त्रोक्त विधिके अनुसार गङ्गाजीमें दस बार स्नान करके जलमें दस पसर काले तिल और घी छोड़ना चाहिये। इसी प्रकार सत्तू तथा गुड़के दस-दस पिण्ड भी गङ्गाजीके जलमें डालने चाहिये। तदनन्तर गङ्गाके रमणीय तटपर अपनी शक्तिके अनुसार सोने या चाँदीसे गङ्गाजीकी प्रतिमा निर्माण कराकर उसकी स्थापना करे। पहले भूमिपर कमल या स्वस्तिकका चिह्न बनाकर उसके ऊपर कलश स्थापित करे। कलशपर भी पद्म एवं स्वस्तिकका चिह्न होना चाहिये। उसके कण्ठमें वस्त्र और पुष्पहार लपेट देना चाहिये। कलशको गङ्गाजलसे भरकर उसमें अन्य आवश्यक पदार्थ छोड़े। उसके ऊपर पूर्णपात्र रखकर उसमें गङ्गाजीकी पूर्वोक्त प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। सुवर्ण आदिकी प्रतिमा न मिले तो मिट्टी आदिकी बनवानी चाहिये। इसकी भी शक्ति न हो तो आटासे पृथ्वीपर ही गङ्गाजीका स्वरूप अङ्कित करना चाहिये। उनका स्वरूप इस प्रकार है—गङ्गादेवीके चार भुजाएँ और सुन्दर नेत्र हैं। उनके श्रीअङ्गोंसे दस हजार चन्द्रमाओंके समान उज्ज्वल चाँदनी-सी छिटकती रहती है। दासियाँ उन्हें चवँर डुलाती हैं। मस्तकपर तना हुआ श्वेत छत्र उनकी शोभा बढ़ाता है। वे अत्यन्त प्रसन्न और वरदायिनी हैं। करुणासे उनका अन्तःकरण सदा द्रवीभूत रहता है। वे वसुधातपर सुधाधारा बहाती हैं। देवता आदि सदा उनकी स्तुति करते रहते हैं। वे दिव्य रत्नोंके आभूषण, दिव्य हार और दिव्य अनुलेपनसे विभूषित हैं। जलमें उनके उपर्युक्त स्वरूपका ध्यान करके प्रतिमामें उनकी विशेषरूपसे पूजा करनी चाहिये। प्रतिमाको पञ्चामृतसे स्नान कराना उत्तम है। प्रतिमाके आगे एक वेदी बनाकर उसको गोबरसे लीपे। उसपर भगवान् नारायण, शिव, ब्रह्मा, सूर्य, राजा भगीरथ तथा गिरिराज हिमालयकी स्थापना करके गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे यथाशक्ति उनकी पूजा करे; फिर दस ब्राह्मणोंको दस सेर तिल दे। इसी प्रकार दस सेर जौ दे और उनके साथ अलग-अलग दस पात्रोंमें

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गव्य (दही-घी आदि) भी दे। तत्पश्चात् पहलेसे तैयार करायी हुई मछली, कछुआ, मेढ़क, मगर आदि जलचर जीवोंकी यथाशक्ति सुवर्णमयी अथवा रजतमयी प्रतिमा स्थापित करके उनकी पूजा करे, वैसी प्रतिमा न मिलनेपर आटेकी प्रतिमा बनावे और मन्त्रज्ञ पुरुष पुष्प आदिसे पूर्वनिर्दिष्ट मन्त्रद्वारा ही उनकी पूजा करके उन्हें गङ्गाजीमें छोड़ दे। यदि अपने पास वैभव हो तो उस दिन गङ्गाजीकी रथयात्रा भी करावे। रथपर गङ्गाजीकी प्रतिमा या चित्र हो, उसका मुख उत्तर दिशाकी ओर रहे। रथपर भ्रमण करती हुई गङ्गाजीका दर्शन इस लोकमें पापी मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। इस प्रकार विधिपूर्वक रथयात्रा सम्पन्न करके मनुष्य आगे बताये जानेवाले दस प्रकारके पापोंसे तत्काल ही मुक्त हो जाता है। बिना दिये हुए किसीकी वस्तु ले लेना, हिंसा करना और परायी स्त्रीके साथ सम्बन्ध रखना—ये तीन प्रकारके शारीरिक पाप माने गये हैं। कठोरतापूर्ण वचन, असत्य, चुगली तथा अनाप-शनाप बातें बकना—ये चार प्रकारके वाचिक पाप कहे गये हैं। दूसरेका धन हड़पनेकी बात सोचना, मनसे किसीका अनिष्ट-चिन्तन करना और झूठा अभिनिवेश (मरण-भय)—ये तीन प्रकारके मानसिक पाप हैं। ये दस प्रकारके पाप करोड़ों जन्मोंद्वारा संचित हो तो भी पूर्वोक्त विधिसे रथयात्रा करनेवाला पुरुष उनसे मुक्त हो जाता है।

पूजाका मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ नमो दशहरायै नारायण्यै गङ्गायै नमः।' जो मनुष्य उस दिन रातमें और दिनमें भी उक्त मन्त्रका पाँच-पाँच हजार जप करता है, वह मनुके बताये हुए दस धर्मों* का फल प्राप्त करता है। आगे बताये जानेवाले स्तोत्रको विधिपूर्वक ग्रहण करके उस दिन गङ्गाजीके आगे उसका पाठ करे। फिर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। वह स्तोत्र इस प्रकार है—

ॐ शिवस्वरूपा गङ्गाको नमस्कार है। कल्याण प्रदान करनेवाली गङ्गाको नमस्कार है। विष्णुरूपिणी देवीको नमस्कार है। आप भगवती गङ्गाको बारंबार नमस्कार है। सम्पूर्ण देवता आपके स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूपभूत जल उत्तम औषध है, आपको नमस्कार है। आप समस्त जीवोंके सम्पूर्ण रोगोंका निवारण करनेके लिये श्रेष्ठ वैद्यके समान हैं, आपको नमस्कार है। आप स्थावर और जङ्गम जीवोंसे उत्पन्न होनेवाले विषका नाश करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। संसाररूपी विषका नाश करनेवाली जीवनदायिनी गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। आप आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंका निवारण करनेवाली एवं सबके प्राणोंकी अधीश्वरी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप शान्तिस्वरूपा तथा सबका संताप दूर करनेवाली हैं, सब कुछ आपका ही स्वरूप है, आपको नमस्कार है। सबको पूर्णतः शुद्ध करनेवाली और सब पापोंसे छुटकारा दिलानेवाली आपको नमस्कार है। आप भोग और मोक्ष देनेवाली भोगवती (नामक पातालगङ्गा) हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ही मन्दाकिनी नामसे प्रसिद्ध आकाशगङ्गा हैं, आपको नमस्कार है। आप स्वर्ग देनेवाली हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। तीनों लोकोंमें मूर्तरूपसे प्रकट होनेवाली आप गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। शुक्लरूपसे स्थित होनेवाली आपको नमस्कार है। सबका क्षेम चाहनेवाली क्षेमवतीको


* श्रीमनुके बतलाये हुए दस धर्म ये हैं—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ (६। ९२)

'धैर्य, क्षमा, मनका निग्रह, चोरी न करना, बाहर-भीतरकी पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, सात्त्विक बुद्धि, अध्यात्मविद्या, सत्य और अक्रोध—ये दस धर्मके लक्षण हैं।'

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नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओंके सिंहासनपर विराजमान होनेवाली तेजोमयी आप गङ्गादेवीको नमस्कार है। आप मन्द गति धारण करके 'मन्दा' और शिवलिङ्गका आधार होनेसे 'लिङ्गधारिणी' कहलाती हैं। भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंसे प्रकट होनेके कारण आप 'नारायणी' कहलाती हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌को मित्र माननेवाली आप विश्वमित्राको नमस्कार है। रेवती नामसे प्रसिद्ध गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। आप बृहतीदेवीको नित्य नमस्कार है। लोकधात्रीको बारंबार नमस्कार है। विश्वमें प्रधान होनेसे आपका नाम विश्वमुख्या है, आपको नमस्कार है। जगत्‌को आनन्दित करनेके कारण नन्दिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। पृथ्वी¹, शिवामृता² और विरजा³ नामवाली गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। परावरगता⁴, आद्या⁵ एवं तारा⁶ नामवाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वर्गमें विराजमान गङ्गादेवी ! आपको नमस्कार है। आप सबसे अभिन्न हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप शान्त-स्वरूपा, प्रतिष्ठा (आधारस्वरूपा) तथा वरदायिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप उग्रा⁷, मुखजल्पा⁸ और संजीवनी⁹ हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आपकी ब्रह्मलोकतक पहुँच है। आप ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाली तथा पापनाशिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाली जगन्माता गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। देवि ! आप जल-बिन्दुओंकी राशि हैं, दुर्गम संकटका नाश करनेवाली तथा जगत्‌के उद्धारमें दक्ष हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विपत्तियोंका विरोध करनेवाली मङ्गलमयी गङ्गादेवीको नमस्कार है, नमस्कार है। पर और अपर सब आपके ही स्वरूप हैं, आप ही पराशक्ति हैं, मोक्षदायिनी देवि ! आपको सदा नमस्कार है। गङ्गा मेरे आगे रहें, गङ्गा मेरे दोनों पार्श्वमें रहें, गङ्गा मेरे चारों ओर रहें और हे गङ्गे ! आपमें ही मेरी स्थिति हो। पृथ्वीपर प्राप्त हुई शिवस्वरूपा देवि ! आदि, मध्य और अन्तमें आप ही हैं। आप सर्वस्वरूपा हैं। आप ही मूल प्रकृति हैं। आप ही सर्वसमर्थ नर-नारायण हैं। गङ्गे ! आप ही परमात्मा और आप ही शिव हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है¹⁰।


१. पृथ्वीपर स्थित होने अथवा पृथुल जलराशि धारण करनेके कारण गङ्गाजीका नाम 'पृथ्वी' है। भगवदीय शक्ति होनेसे गङ्गा और पृथ्वीमें अभेद भी है।
२. शिव (कल्याणमय) हैं अमृत (जल) जिनका, वे गङ्गाजी 'शिवामृता' हैं, शिवस्वरूपा और अमृतस्वरूपा होनेके कारण उनका यह नाम सार्थक है।
३. रजोगुणरहित, निर्मलस्वरूप होनेके कारण गङ्गाजीको 'विरजा' कहते हैं। गोलोकस्थित विरजासे अभिन्न होनेके कारण भी इनका नाम 'विरजा' है।
४. पर (ऊपर स्वर्गलोक) और अवर (नीचे पाताललोक)-में स्थित।
५. आदिशक्तिस्वरूपा।
६. सबको संसार-सागरसे तारनेवाली अथवा 'तारा' नामक शक्तिसे अभिन्न।
७. पाप-समुदायके लिये भयंकर।
८. अपने स्रोतरूप मुखसे निरन्तर कलकल शब्द करनेवाली।
९. सेवकोंको जन्म-मृत्युसे छुड़ाकर नूतन अमृतमय जीवन प्रदान करनेवाली।
१०. ॐ नमः शिवायै गङ्गायै शिवदायै नमोऽस्तु ते। नमोऽस्तु विष्णुरूपिण्यै गङ्गायै ते नमो नमः॥
सर्वदेवस्वरूपिण्यै नमो भेषजमूर्तये। सर्वस्य सर्वव्याधीनां भिषक्श्रेष्ठे नमोऽस्तु ते॥
स्थाणुजङ्गमसम्भूतविषहन्त्रि नमोऽस्तु ते। संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमो नमः॥