सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २३९

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३९

आँख। गाँवके नेताको ग्रामणी^१ कहते हैं। अम्बु^२-शब्द जलका वाचक है। खलपू^३का अर्थ है खलिहान या भूमि साफ करनेवाला। कर्तृ^४-शब्द कर्ताका वाचक है। जो धनकी सीमाको लाँघ गया हो, उस कुलको अतिरि^५ कहते हैं। जो पानी नावकी शक्तिसे बाहर हो, जिसे नावसे भी पार करना असम्भव हो, उसे 'अतिनु^६' कहते हैं ॥४१॥<br><br>स्वनडुच्च विमलद्यु वाश्वत्वारीदमेव च।<br>एतद्ब्रह्माहश्च दण्डी असृक्किञ्चित्त्यदादि च ॥४२॥<br><br>जिस कुल या गृहमें गाड़ी खींचनेवाले अच्छे बैल हों, उसको 'स्वनडुत्^७' कहते हैं। जिस दिन आकाश साफ हो, उस दिनको विमलद्यु^८ कहते हैं। वार्^९-शब्द जलका वाचक है। चतुर् शब्दका रूप नपुंसकलिङ्गमें केवल प्रथमा और द्वितीयामें'चत्वारि' होता है, शेष पुँल्लिङ्गवत्। इदम्-शब्दके रूप नपुंसकमें इस प्रकार हैं—इदम् इमे इमानि, शेष पुँल्लिङ्गवत्। एतत्-शब्दके रूप पुँल्लिङ्गमें—एषः एतौ एते इत्यादि सर्वशब्दके समान होते हैं। नपुंसकमें केवल प्रथम दो विभक्तियोंमें ये रूप हैं—एतत् एते एतानि। ब्रह्मन्-शब्दके रूप नपुंसकमें 'ब्रह्म ब्रह्मणी ब्रह्माणि' हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्^{१०}। अहन्^{११}-शब्द दिनका वाचक है। दण्डिन्-शब्दके नपुंसकमें 'दण्डि दण्डिनी दण्डीनि' ये रूप हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। असृक्^{१२}-शब्द रक्तका वाचक है। किम्-शब्दके रूप पुँल्लिङ्गमें 'कः कौ के' इत्यादि सर्ववत् होते हैं। नपुंसकमें केवल प्रथम दो विभक्तिमें 'किम् के कानि'—ये रूप होते हैं। चित्-शब्दके रूप

१. पुँल्लिङ्गमें इसके रूप ग्रामणीः ग्रामण्यौ ग्रामण्यः इत्यादि होते हैं। यदि कोई कुल (खानदान) गाँवका अगुआ हो तो यह शब्द नपुंसकलिङ्गमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसके रूप इस प्रकार होंगे—ग्रामणि ग्रामणिनी ग्रामणीनि। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें 'ग्रामण्या ग्रामणिना। ग्रामण्ये ग्रामणिने। ग्रामण्यः २ ग्रामणिनः २। ग्रामण्याम् ग्रामणिनि—ये रूप हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् होते हैं। २. इसके रूप—अम्बु अम्बुनी अम्बूानि इत्यादि हैं। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें क्रमशः अम्बुना। अम्बुने। अम्बुनः २। अम्बुनि—ये रूप होते हैं। शेष रूप भानुवत् हैं। ३. पुँल्लिङ्गमें इसके रूप 'खलपूः खलप्वौ खलप्वः' इत्यादि होते हैं। जब यह किसी साधन या औजारका वाचक होता है तो नपुंसकमें प्रयुक्त होता है। उसमें इसके रूप इस प्रकार हैं—खलपु खलपुनी खलपूनि। इसमें भी तृतीयासे सप्तमीतक एकवचनमें 'खलपुना, खलपुने, खलपुनः २, खलपुनि'—ये रूप अधिक होते हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं। ४. इसका रूप पुँल्लिङ्गमें बताया गया है। नपुंसकमें 'कर्तृ कर्तृणी कर्तृणि'—ये रूप होते हैं। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें दो-दो रूप होते हैं। यथा—कर्तृणा कर्त्रा। कर्तृणे कर्त्रे। कर्तुणः २ कर्तुः २। कर्तृणि कर्तरि। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं। ५. इसके 'अतिरि अतिरिणी अतिरीणि' ये रूप हैं। तृतीया विभक्तिसे इस प्रकार रूप चलते हैं—अतिरिणा, अतिराभ्याम् ३ अतिराभिः। अतिरिणे अतिराभ्यः २। अतिरिणः २। अतिरिणोः २ अतिरीणाम्। अतिरिणि अतिरासु। ६. इसके रूप इस प्रकार है—'अतिनु अतिनुनी अतिनूनि। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें—'अतिनुना, अतिनुने, अतिनुनः २, अतिनुनि'—ये रूप होते हैं। शेष भानुवत्। ७. रूप इस प्रकार हैं—स्वनडुत् स्वनडुही स्वनड्वांहि। शेष पुँल्लिङ्गवत्। ८. रूप इस प्रकार हैं—विमलद्यु विमलदिवी विमलदिवि। तृतीया आदि विभक्तियोंमें 'विमलदिवा विमलद्युभ्याम्' इत्यादि रूप होते हैं। ९. इसके रूप इस प्रकार हैं—'वाः वारी वारि। वारा वारभ्याम् वार्भिः' इत्यादि। १०. पुँल्लिङ्गमें इसके सब रूप इस प्रकार हैं—ब्रह्मा, ब्रह्माणौ, ब्रह्माणः। ब्रह्माणं ब्रह्माणौ ब्रह्मणः। ब्रह्मणा ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभिः। ब्रह्मणे ब्रह्मभ्यम् ब्रह्मभ्यः। ब्रह्मणः ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभ्यः। ब्रह्मणः ब्रह्मणोः ब्रह्मणाम्। ब्रह्मणि ब्रह्मणो ब्रह्मसु। ११. इसके रूप इस प्रकार हैं—'अहः अह्नी अहानि। अह्ना अहोभ्याम् अहोभिः' इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें अह्नि, अहनि—ये दो रूप होते हैं। १२. इसके रूप इस प्रकार हैं—'असृक् असृजी असृञ्जि। असृजा असृग्भ्याम् असृग्भिः' इत्यादि।

२४० * संक्षिप्त नारदपुराण *


‘चित् चिती चिन्ति, चिता चिद्भ्याम् चिद्भिः’ इत्यादि होते हैं। त्यद् आदि१ शब्दोंके रूप पुँल्लिङ्गमें ‘स्यः त्यौ ते’ इत्यादि सर्ववत् होते हैं। नपुंसकमें ‘त्यत् त्ये त्यानि’—ये रूप होते हैं॥ ४२ ॥

एतद् बेभिद्गवाग् गवाङ् गोअग् गोङ् गोग् गोङ्।
तिर्यग्यकृच्छकृच्चैव ददद्भवत्पचत्तुदत् ॥ ४३ ॥

(इदम् और) एतत्-शब्दके रूप अन्वादेशमें२ द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियोंमें कुछ भिन्न होते हैं। पुँल्लिङ्गमें ‘एनम् एनौ एनान्, एनेन एनयोः।’ नपुंसकमें ‘एनत् एने एनानि’ ये रूप हैं। अन्वादेश न होनेपर पूर्वोक्त रूप होते हैं। बेभित्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—‘बेभित् बेभिद् बेभिदी बेभिदि (यहाँ नुम् नहीं होता)। बेभिदा बेभिद्भ्याम् बेभिद्भिः’ इत्यादि। गवाक्-शब्दके रूप गति और पूजा-अर्थके भेदसे अनेक होते हैं। गति-पक्षमें गवाक्‌का अर्थ है गायके पास जानेवाला और पूजा-पक्षमें उसका अर्थ है गो-पूजक। प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें उसके उभयपक्षीय रूप इस प्रकार हैं—एकवचनमें ये नौ रूप होते हैं—गवाक् गवाग् गोअक् गोअग् गोक् गोग् गवाङ् गोअङ् गोङ् द्विवचनमें चार रूप होते हैं—गोची गवाञ्ची गोअञ्ची गोञ्ची। बहुवचनमें तीन रूप हैं—गवाञ्चि गोअञ्चि और गोञ्चि। प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें ये ही रूप होते हैं। तृतीयासे लेकर सप्तमीके एकवचनमें सर्वत्र चार-चार रूप होते हैं—‘गोचा गवाञ्चा गोअञ्चा गोञ्चा’ इत्यादि। भ्याम्, भिस् और भ्यस्‌में छः-छः रूप होते हैं— गवाग्भ्याम् गोअग्भ्याम् गोग्भ्याम् गवाङ्भ्याम् गोअङ्भ्याम् गोङ्भ्याम् इत्यादि। सप्तमीके बहुवचनमें भी नौ रूप होते हैं—गवाक्षु गोअक्षु गोक्षु, गवाङ्क्षु गोअङ्क्षु गोङ्क्षु गवाक्षु गोअक्षु गोक्षु। इस प्रकार कुल एक सौ नौ रूप होते हैं३। तिर्यक्४-शब्द पशु-पक्षियोंका वाचक है। यकृत्५-शब्द कलेजा तथा उससे सम्बन्ध रखनेवाली बीमारीका बोधक है। शकृत्६-शब्द विष्ठाका वाचक है। ददत्-शब्दका रूप पुँल्लिङ्गमें बिभ्रत् शब्दकी तरह होता है। नपुंसकमें ‘ददत्, ददती, ददन्ति ददति’ ये रूप होते हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। भवत्७ शब्दका अर्थ है, पूज्य। शतृ प्रत्ययान्त ‘भवत्’ शब्दके रूप पुँल्लिङ्गमें ‘भवन् भवन्तौ भवन्तः’ इत्यादि होते हैं। शेष पूर्ववत्। स्त्रीलिङ्गमें ‘भवन्ती भवन्त्यौ भवन्त्यः’ इत्यादि गोपीके समान रूप हैं। नपुंसकमें पूर्ववत् हैं। पचत्-शब्दका रूप सभी लिङ्गोंमें शतृ-प्रत्ययान्त ‘भवत्’ शब्दके समान होता है। तुदत्-शब्द पुँल्लिङ्गमें पचत्‌शब्दके ही समान है। स्त्रीलिङ्गमें ङीप् प्रत्यय होनेपर उसके दो रूप होते हैं—तुदती और तुदन्ती, फिर इन दोनोंके रूप गोपी-शब्दकी भाँति चलते हैं। नपुंसकमें प्रथम दो विभक्तियोंके रूप इस प्रकार हैं—तुदत् तुदती


१. त्यद्, तद, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि—ये त्यदादि कहलाते हैं। २. एकके विषयमें दोबारा की हुई चर्चा अन्वादेश है, जैसे—‘यह आया, इसे भोजन दो’ इस वाक्यमें ‘इसे’ अन्वादेश हुआ। ३. कुछ मनीषी विद्वान् इसमें ५२७ रूपोंकी उद्भावना करते हैं। ४. पुँल्लिङ्गमें इसके ‘तिर्यङ् तिर्यञ्चौ’ इत्यादि प्रत्यङ् -शब्दकी तरह रूप होते हैं। द्वितीयाके बहुवचनमें ‘तिरश्चः’ रूप होता है। तृतीया आदिमें ‘तिरश्चा तिर्यग्भ्याम्’ इत्यादि रूप होते हैं। नपुंसकमें ‘तिर्यक् तिरश्ची तिर्यञ्चि’ रूप होते हैं। पूजा-पक्षमें ‘तिर्यङ् तिर्यञ्ची तिर्यञ्चि’ रूप होते हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। ५. इसके रूप होते हैं—यकृत् यकृती यकृन्ति। यकृता यकृद्भ्याम् इत्यादि। ‘यकन्’ आदेश होनेपर ‘यकानि’ रूप केवल ‘शस्’ विभक्तिमें होता है। तृतीया आदिके एकवचनमें ‘यक्रा’ आदि रूप अधिक होते हैं। ६. इसके रूप भी यकृत्-शब्दकी भाँति ही होते हैं। ७. इसके तीनों लिङ्गोंमें रूप होते हैं। पुँल्लिङ्गमें ‘भवान् भवन्तौ भवन्तः’ इत्यादि ‘धीमत्’ शब्दके समान रूप हैं। स्त्रीलिङ्गमें ‘भवती भवत्यौ भवत्यः’ इत्यादि गोपी-शब्दके समान रूप होते हैं। नपुंसकमें दो विभक्तियोंमें उसके ‘भवत् भवती भवन्ति’ रूप होते हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्।