संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ उत्तरभाग \
* उत्तरभाग *
७११
आसन-मन्त्र
कर्णिकायां सुपीठेऽत्र पद्मकल्पितमासनम्॥
सर्वसत्त्वहितार्थाय तिष्ठ त्वं मधुसूदन।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। २७-२८)
'यहाँ कमलकी कर्णिकामें सुन्दर पीठपर कमलका आसन बिछा हुआ है। मधुसूदन! सब प्राणियोंका हित करनेके लिये आप इसपर विराजमान हों। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
अर्घ्य-मन्त्र
ॐ त्रैलोक्यपतीनां पतये देवदेवाय हृषीकेशाय विष्णवे नमः।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
'त्रिभुवनपतियोंके भी पति, देवताओंके भी देवता, इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
पाद्य-मन्त्र
ॐ पाद्यं ते पादयोर्देव पद्मनाभ सनातन॥
विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। २८-२९)
'देवपद्मनाभ! सनातन विष्णो!! कमलनयन मधुसूदन!!! आपके चरणोंमें यह पाद्य (पाँव पखारनेके लिये जल) समर्पित है, आप इसे स्वीकार करें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
मधुपर्क-मन्त्र
मधुपर्कं महादेव ब्रह्माद्यैः कल्पितं तव॥
मया निवेदितं भक्त्या गृहाण पुरुषोत्तम।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। २९-३०)
'महादेव! पुरुषोत्तम! ब्रह्मा आदि देवताओँने आपके लिये जिसकी व्यवस्था की थी, वही मधुपर्क मैं भक्तिपूर्वक आपको निवेदन करता हूँ। कृपया स्वीकार कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
आचमनीय-मन्त्र
मन्दाकिन्याः सितं वारि सर्वपापहरं शिवम्॥
गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम्।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। ३०-३१)
'भगवन्! मैंने गङ्गाजीका स्वच्छ जल जो सब पापोंको दूर करनेवाला तथा कल्याणमय है, आचमनके लिये भक्तिपूर्वक आपको अर्पित किया है, कृपया ग्रहण कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
स्नान-मन्त्र
त्वमापः पृथिवी चैव ज्योतिस्त्वं वायुरेव च॥
लोकेश वृत्तिमात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। ३१-३२)
'लोकेश्वर! आप ही जल, पृथ्वी तथा अग्नि और वायुरूप हैं। मैं जीवनरूप जलके द्वारा आपको स्नान करता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
वस्त्र-मन्त्र
देव तन्तुसमायुक्ते यज्ञवर्णसमन्विते॥
स्वर्णवर्णप्रभे देव वाससी तव केशव।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। ३२-३३)
'देव केशव! यह दिव्य तन्तुओंसे युक्त यज्ञवर्णसमन्वित तथा सुनहले रंग और सुनहली प्रभावाले दो वस्त्र आपकी सेवामें समर्पित हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
७१२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
विलेपन-मन्त्र
शरीरं ते न जानामि चेष्टां चैव न केशव ॥
मया निवेदितो गन्धः प्रतिगृह्य विलिप्यताम्।
ॐ नमो नारायणाय नमः ॥
(ना० उत्तर० ५७ । ३३-३४)
'केशव! मुझे आपके शरीर और चेष्टाका ज्ञान नहीं है। मैंने जो यह गन्ध (रोली-चन्दन आदि) निवेदन किया है, इसे लेकर अपने अङ्गमें लगायें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
यज्ञोपवीत-मन्त्र
ऋग्यजुःसाममन्त्रेण त्रिवृतं पद्मयोनिना ॥
सावित्रीग्रन्थिसंयुक्तमुपवीतं तवार्पये ।
ॐ नमो नारायणाय नमः ॥
(ना० उत्तर० ५७। ३४-३५)
'भगवन् ! ब्रह्माजीने ऋक्, यजुः और सामवेदके मन्त्रोंसे जिसको त्रिवृत् (त्रिगुण) बनाया है, वह सावित्री ग्रन्थिसे युक्त यज्ञोपवीत मैं आपकी सेवामें अर्पित करता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
अलंकार-मन्त्र
दिव्यरत्नसमायुक्ता वह्निभानुसमप्रभाः ॥
गात्राणि शोभयिष्यन्ति अलंकारास्तु माधव।
ॐ नमो नारायणाय नमः ॥
(ना० उत्तर० ५७। ३५-३६)
'माधव! अग्नि और सूर्यके समान चमकीले तथा दिव्य रत्नोंसे जटिल ये दिव्य आभूषण आपके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ायेंगे। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'
पूर्वोक्त अष्टदलकमलके पूर्व दलमें भगवान् वासुदेवका और दक्षिण दलमें श्रीसंकर्षणका न्यास करे। पश्चिम दलमें प्रद्युम्नका तथा उत्तर दलमें अनिरुद्धका न्यास करे। अग्निकोणवाले दलमें भगवान् वराहका तथा नैर्ऋत्य दलमें नृसिंहका न्यास करे। वायव्य दलमें माधवका तथा ईशान दलमें भगवान् त्रिविक्रमका न्यास करे। अष्टाक्षर देवस्वरूप भगवान् विष्णुके सम्मुख गरुड़जीकी स्थापना करनी चाहिये। भगवान्के वामभागमें चक्र और दक्षिणभागमें शङ्खकी स्थापना करे। इसी प्रकार उनके दक्षिणभागमें महागदा कौमोदकी और वामभागमें शार्ङ्ग नामक धनुषको स्थापित करे। दक्षिणभागमें दो दिव्य तरकस और वामभागमें खड्गका न्यास करे। फिर दक्षिणभागमें श्रीदेवी और वामभागमें पुष्टिदेवीकी स्थापना करे। भगवान्के सम्मुख वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ रखे; फिर पूर्व आदि चारों दिशाओंमें हृदय आदिका न्यास करे। कोणमें देवदेव विष्णुके अस्त्रका न्यास करे। पूर्व आदि आठ दिशाओंमें तथा नीचे और ऊपर क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, अनन्त तथा ब्रह्माजीका उनके नाम-मन्त्रोंद्वारा पूजन करे। इसी विधिसे पूजित मण्डलस्थ भगवान् जनार्दनका जो दर्शन करता है, वह भी अविनाशी विष्णुमें प्रवेश करता है। जिसने उपर्युक्त विधिसे एक बार भी श्रीकेशवका पूजन किया है, वह जन्म-मृत्यु और जरावस्थाको लाँघकर भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त होता है। जो आलस्य छोड़कर निरन्तर भक्तिभावसे भगवान् नारायणका स्मरण करता है, उसके नित्य निवासके लिये श्वेतद्वीप बताया गया है। 'नमः' सहित ॐकार जिसके आदिमें है और जो अन्तमें भी 'नमः' पदसे सुशोभित है, ऐसा नारायणका 'नारायण' नाम सम्पूर्ण तत्त्वोंका प्रकाशक मन्त्र कहलाता है। (उसका स्वरूप है—ॐ नमो नारायणाय नमः)-इसी विधिसे प्रत्येकको गन्ध-पुष्प आदि वस्तुएँ क्रमशः निवेदन करनी चाहिये। इसी क्रमसे आठ मुद्राएँ बाँधकर दिखावे। तदनन्तर मन्त्रवेत्ता पुरुष 'ॐ नमो नारायणाय' इस मूलमन्त्रका एक सौ आठ बार या अट्ठाईस बार अथवा आठ बार जप