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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

उत्तरभाग ७५७

  • उत्तरभाग * ७५७

शैवतीर्थ हैं। वैष्णवतीर्थ बाईस हैं। ब्राह्मतीर्थ तो सभी हैं। अट्ठाईस शाक्ततीर्थ हैं। उनमें भी सात तीर्थ मातृकाओंके हैं। उनमेंसे तीन ब्राह्मीके हैं। भद्रे ! दो वैष्णवी और दो रौद्री-तीर्थ हैं। ब्राह्मी और वैष्णवीके सिवा शेष स्थानोंमें रुद्रशक्ति विद्यमान हैं। सुमुखि ! एक तीर्थ क्षेत्रपालका भी बताया गया है। मोहिनी ! नर्मदामें गुप्त और प्रकट बहुत-से अवान्तर तीर्थ हैं। वायुदेवताने भूतल, अन्तरिक्ष और द्युलोकमें जो साढ़े तीन करोड़ तीर्थ बताये हैं, वे सब नर्मदामें विद्यमान हैं। महाभागे ! जो मानव इनमें जहाँ-कहीं भी स्नान करता है, वह शुद्धचित्त होकर उत्तम गति पाता है। नर्मदाके तटपर किया हुआ स्नान, दान, जप, होम, वेदाध्ययन और पूजन सब अक्षय हो जाता है। देवि ! इस प्रकार मैंने तुमसे नर्मदाके तीर्थ-समुदायका वर्णन किया है। यह स्मरण करनेवाले मनुष्योंके भी महापातकका निवारण करनेवाला है। जो मानव नर्मदाके तीर्थोंका यह संग्रह सुन लेता है अथवा पढ़ता या सुनाता है, भद्रे ! वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

अवन्ती—महाकालवनके तीर्थोंकी महिमा

मोहिनी बोली— विप्रवर ! आपने नर्मदाका जो माहात्म्य बताया है, यह मनुष्योंके पापका नाश करनेवाला है। महाभाग ! प्रभो ! अब मुझे अवन्तीतीर्थका तथा देववन्द्य भगवान् महाकालका माहात्म्य बताइये।

पुरोहित वसुने कहा— भद्रे ! सुनो, मैं तुम्हें अवन्तीका माहात्म्य बतलाता हूँ, जो मनुष्योंको पुण्य देनेवाला है। महाकालवन पवित्र एवं परम उत्तम तपोभूमि है। महाकालवनसे दूसरा कोई क्षेत्र इस पृथ्वीपर नहीं है। वहाँ कपालमोचन नामक तीर्थ है जिसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे ब्रह्महत्यारा मनुष्य भी शुद्ध हो जाता है। रुद्र-सरोवरमें स्नान करनेवाला मानव रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। स्वर्गद्वारमें जाकर स्नान और भगवान् सदाशिवकी पूजा करनेवाला मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता; वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। राजस्थलमें जाकर सामुद्रिकतीर्थमें नहानेवाला मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नान करनेका उत्तम फल पाता है। शङ्करवापीमें नियमपूर्वक स्नान करनेवाला मानव इहलोकमें मनोवाञ्छित भोग भोगकर अन्तमें रुद्रलोकमें जाता है। जो मनुष्य नीरगङ्गामें नहाकर भक्तिभावसे गन्धवतीदेवीकी पूजा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दशाश्वमेधिक-तीर्थमें स्नान करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। तदनन्तर मनुष्य देवेश्वरी एकानंशाके समीप जाकर गन्ध-पुष्प आदिसे उनकी पूजा करके सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो मानव रुद्रसरोवरमें स्नान करके श्रद्धापूर्वक हनुमत्केश्वरका पूजन करता है, वह सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको पा लेता है। वाल्मीकेश्वरकी पूजा करनेसे मानव सम्पूर्ण विद्याओंकी निधि होता है। पञ्चेश्वरकी पूजा करनेसे मानव समस्त सिद्धियोंका भागी होता है। कुशस्थलीकी परिक्रमा करनेसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। मन्दाकिनीमें गोता लगानेसे गङ्गा-स्नानका फल मिलता है। अङ्घ्रिपादका पूजन करके मनुष्य भगवान् शिवका अनुचर होता है। यज्ञवापीमें स्नान और मार्कण्डेयेश्वरका पूजन करनेसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाकर मनुष्य एक युगतक स्वर्गमें निवास करता है। सती मोहिनी ! सोमवती अमावास्याको स्नान और सोमेश्वरका पूजन करके मनुष्य इहलोक और परलोकमें मनोवाञ्छित भोग पाता है। फिर केदारेश्वर, रामेश्वर, सौभाग्येश्वर तथा नगरादित्यकी पूजा करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाता है। केशवादित्यकी पूजा करनेसे मानव भगवान् केशवका

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प्रिय होता है। शक्तिभेद-तीर्थमें स्नान करके बड़े भयंकर संकटोंसे छुटकारा मिल जाता है। जो मनुष्य ॐकारेश्वर आदि लिङ्गोंकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह भगवान् महेश्वरके प्रसादसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। देवि! महाकालवनमें शिवलिङ्गोंकी कोई नियत संख्या नहीं है। जहाँ-कहीं भी विद्यमान शिवलिङ्गका पूजन करके मनुष्य भगवान् शङ्करका प्रिय होता है। अवन्तीके प्रत्येक कल्पमें भिन्न-भिन्न नाम होते हैं। यथा—कनकभृङ्गा, कुशस्थली, अवन्तिका, पद्मावती, कुमुद्वती, उज्जयिनी, विशाला और अमरावती। जो मनुष्य शिप्रा नदीमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका पूजन करता है, वह महादेवजी तथा महादेवीकी कृपासे सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है। जो वामनकुण्डमें स्नान करके 'विष्णुसहस्रनामस्तोत्र' के द्वारा सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी भगवान् श्रीधर (विष्णु) -की स्तुति करता है, वह इस पृथिवीपर साक्षात् श्रीहरिके समान है। जो देवप्रयाग-सरोवरमें स्नान करके भगवान् माधवकी आराधना करता है, वह भगवान् माधवकी भक्ति पाकर विष्णुधाममें जाता है। जो अन्तर्गृहकी यात्रामें विघ्नेश, भैरव, उमा, रुद्रादित्य तथा अन्यान्य देवताओंकी श्रद्धापूर्वक प्राप्त उपचारोंसे पूजा करता है, वह स्वर्गलोकका भागी होता है। भामिनि! रुद्रसरोवर आदि स्थलोंमें जो अन्य बहुत-से तीर्थ हैं उन सबमें भगवान् शङ्करकी पूजा करके मनुष्य सुखी होता है। वहाँके आठ तीर्थोंमें स्नान करके मानव महाकालवनकी यात्राका साङ्गोपाङ्ग फल पाता है। इस प्रकार अवन्तीपुरीका यह सब माहात्म्य तुम्हें बताया गया है। इसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।


मथुराके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य

मोहिनी बोली— पुरोहितजी! मैंने अवन्तीका माहात्म्य सुना, जो मनुष्योंके पाप दूर करनेवाला है। अब मैं मथुराका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।

पुरोहित वसुने कहा— मोहिनी! सुनो, मैं मथुराके कल्याणकारी वैभवका वर्णन करता हूँ, जहाँ ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर साक्षात् भगवान् अवतीर्ण हुए हैं। वहाँ प्रकट होकर भगवान् नन्दके गोकुलमें गये और वहीं रहकर उन्होंने गोपोंके साथ सब लीलाएँ कीं। वनोंमें तथा मथुरामें जो तीर्थ हैं, उनका तुमसे इस समय वर्णन करता हूँ, सुनो। पहला मधुवन है, जहाँ स्नान करनेवाला श्रेष्ठ मानव देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। दूसरा उत्तम तालवन है, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला मानव कृतकृत्य होता है। तीसरा कुमुदवन है, जहाँ स्नान करके मनुष्य मनोवाञ्छित भोगोंको पाता है और इहलोक तथा परलोकमें आनन्दित होता है। चौथेका नाम काम्यवन है; उसमें बहुत-से तीर्थ हैं; वहाँकी यात्रा करनेवाला पुरुष विष्णुलोकका भागी होता है। भद्रे! वहाँ जो विमलकुण्ड है, वह सब तीर्थोंमें उत्तम-से-उत्तम है; वहाँ दान करनेवाला मनुष्य वैकुण्ठधाम पाता है। पाँचवाँ बहुलावन है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है; वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। छठा भद्रवन नामक वन है, जहाँ स्नान करनेवाला मानव भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे सब कल्याण-ही-कल्याण देखता है। वहाँ सातवाँ खदिरवन है, जिसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है। आठवाँ