संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-तृतीय पाद ४४९
- पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४४९
करे—
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल।
भक्त्या समर्पये तुभ्यममुकावरणार्चनम् ॥ ८१-८२॥
‘शरणागतवत्सल ! मुझे अभीष्टसिद्धि प्रदान कीजिये। मैं आपको भक्तिपूर्वक अमुक आवरणकी पूजा समर्पित करता हूँ। (अमुकके स्थानपर ‘प्रथम’ या ‘द्वितीय’ आदि पद बोलना चाहिये)।’
ऐसा कहकर इष्टदेवके मस्तकपर पुष्पाञ्जलि बिखेरे। तदनन्तर कल्पोक्त आवरणोंकी क्रमशः पूजा करनी चाहिये। आयुध और वाहनोंसहित इन्द्र आदि ही आवरण देवता हैं। उनका अपनी-अपनी दिशाओंमें पूजन करे। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, ब्रह्मा तथा नागराज अनन्त—ये दस देवता अथवा दिक्पाल प्रथम आवरणके देवता हैं। ऐरावत, भेड़, भैंसा, प्रेत, तिमि (मगर), मृग, अश्व, वृषभ, हंस और कच्छप—ये विद्वानोंद्वारा इन्द्रादि देवताओंके वाहन माने गये हैं, जो द्वितीय आवरणमें पूजित होते हैं। वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, अंकुश, गदा, त्रिशूल, कमल और चक्र—ये क्रमशः इन्द्रादिके आयुध हैं (जो तृतीय आवरणमें पूजित होते हैं)। इस प्रकार आवरणपूजा समाप्त करके भगवान्की आरती करे। फिर शङ्खका जल चारों ओर छिड़ककर ऊपर बाँह उठाये हुए भगवान्का नाम लेकर नृत्य करे और दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करे। उसके बाद उठकर अपने इष्टदेवकी प्रार्थना करे। प्रार्थनाके पश्चात् दक्षिण भागमें वेदी बनाकर उसका संस्कार करे। मूलमन्त्रसे ईक्षण, अस्त्र (फट्)-द्वारा प्रोक्षण और कुशोंसे ताड़न (मार्जन) करके कवच (हुम्) के द्वारा पुनः वेदीका अभिषेक करे। उसके बाद वेदीकी पूजा करके उसपर अग्निकी स्थापना करे। फिर अग्निको प्रज्वलित करके उसमें इष्टदेवका ध्यान करते हुए आहुति दे। समस्त महाव्याहृतियोंसे चार बार घीकी आहुति देकर उत्तम साधक भात, तिल अथवा घृतयुक्त खीरद्वारा पचीस आहुति करे। फिर व्याहृतिसे होम करके गन्ध आदिके द्वारा पुनः इष्टदेवकी पूजा करे। भगवान्की मूर्तिमें अग्निके लीन होनेकी भावना करे। उसके बाद निम्नाङ्कित प्रार्थना पढ़कर अग्निका विसर्जन करे—
भो भो वह्ने महाशक्ते सर्वकर्मप्रसाधक।
कर्मान्तरेऽपि सम्प्राप्ते सान्निध्यं कुरु सादरम् ॥ ९३॥
हे अग्निदेव ! आपकी शक्ति बहुत बड़ी है। आप सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धि करानेवाले हैं। कोई दूसरा कार्य प्राप्त होनेपर भी आप यहाँ सादर पधारें।
इस प्रकार विसर्जन करके अग्निदेवताके लिये आचमनार्थ जल दे। फिर बचे हुए हविष्यसे इष्टदेवको, पूर्वोक्त पार्षदोंको भी गन्ध, पुष्प और अक्षतसहित बलि दे। इसके बाद सब दिशाओंमें योगिनी आदिको बलि अर्पण करे।
ये रौद्रा रौद्रकर्माणो रौद्रस्थाननिवासिनः ।
योगिन्यो ह्युग्ररूपाश्च गणानामधिपाश्च ये ॥
विघ्नभूतास्तथा चान्ये दिग्विदिक्षु समाश्रिताः ।
सर्वे ते प्रीतमनसः प्रतिगृह्णन्त्विमं बलिम् ॥
(९५-९७)
जो भयंकर हैं, जिनके कर्म भयंकर हैं, जो भयंकर स्थानोंमें निवास करते हैं, जो उग्र रूपवाली योगिनियाँ हैं, जो गणोंके स्वामी तथा विघ्नस्वरूप हैं और प्रत्येक दिशा तथा विदिशामें स्थित हैं, वे सब प्रसन्नचित्त होकर यह बलि ग्रहण करें।
इस प्रकार आठों दिशाओंमें बलि अर्पण करके पुनः भूतबलि दे। तत्पश्चात् धेनुमुद्राद्वारा जलका अमृतीकरण करके इष्टदेवताके हाथमें पुनः आचमनीयके लिये जल दे। फिर मूर्तिमें स्थित देवताका विसर्जन करके पुनः उस मूर्तिमें ही उनको प्रतिष्ठित करे। तत्पश्चात् भगवत्प्रसादभोजी पार्षदको नैवेद्य दे। महादेवजीके ‘चण्डेश’ भगवान् विष्णुके ‘विष्वक्सेन’ सूर्यके ‘चण्डांशु’ गणेशजीके ‘वक्रतुण्ड’ और भगवती दुर्गाकी ‘उच्छिष्ट
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चाण्डाली'—ये सब उच्छिष्टभोजी कहे गये हैं।
तदनन्तर मूलमन्त्रके ऋषि आदिका स्मरण करके मूलसे ही षडङ्ग-न्यास करे और यथाशक्ति मन्त्रका जप करके देवताको अर्पित करे।
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात्त्वयि स्थिता ॥ १०२ ॥
'देव! आप गुह्यसे अतिगुह्य वस्तुकी भी रक्षा करनेवाले हैं। आप मेरे द्वारा किये गये इस जपको ग्रहण करें। आपके प्रसादसे आपके भीतर रहनेवाली सिद्धि मुझे प्राप्त हो।'
इसके बाद पराङ्मुख अर्घ्य देकर फूलोंसे पूजा करे। पूजनके पश्चात् प्रणाम करना चाहिये। दोनों हाथोंसे, दोनों पैरोंसे, दोनों घुटनोंसे, छातीसे, मस्तकसे, नेत्रोंसे, मनसे और वाणीसे जो नमस्कार किया जाता है उसे 'अष्टाङ्ग प्रणाम' कहा गया है। दोनों बाहुओंसे, घुटनोंसे, छातीसे, मस्तकसे जो प्रणाम किया जाता है, वह 'पञ्चाङ्ग प्रणाम' है। पूजामें ये दोनों अष्टाङ्ग और पञ्चाङ्ग प्रणाम श्रेष्ठ माने गये हैं। मन्त्रका साधक दण्डवत्-प्रणाम करके भगवान्की परिक्रमा करे। भगवान् विष्णुकी चार बार, भगवान् शङ्करकी आधी बार, भगवती दुर्गाकी एक बार, सूर्यकी सात बार और गणेशजीकी तीन बार परिक्रमा करनी चाहिये। तत्पश्चात् मन्त्रोपासक भक्तिपूर्वक स्तोत्र-पाठ करे। इसके बाद इस प्रकार कहे—
'ॐ इतः पूर्वं प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थासु मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्नेन यत्स्मृतं यदुक्तं यत्कृतं तत्सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु स्वाहा। मां मदीयं च सकलं विष्णवे ते समर्पये ॐ तत्सत्।*
यह विद्वानोंने 'ब्रह्मार्पण मन्त्र' कहा है। इसके आदिमें प्रणव है, उसके बाद बयासी अक्षरोंका यह मन्त्र है, इसीसे भगवान्को आत्म-समर्पण करना चाहिये। इसके बाद नीचे लिखे अनुसार क्षमा-प्रार्थना करे—
अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा वैकल्यात् साधनस्य च।
यन्न्यूनमतिरिक्तं वा तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि॥
द्रव्यहीनं क्रियाहीनं मन्त्रहीनं मयान्यथा।
कृतं यत्तत् क्षमस्वेश कृपया त्वं दयानिधे॥
यन्मया क्रियते कर्म जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु।
तत्सर्वं तावकी पूजा भूयाद् भूत्यै च मे प्रभो॥
भूमौ स्खलितपादानां भूमिरेवावलम्बनम्।
त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात् कारुण्यभावेन क्षमस्व परमेश्वर॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व जगतां पते॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि त्वं गतिः परमेश्वर॥
(ना० पू० ६७। ११०-११७)
'भगवन्! अज्ञानसे, प्रमादसे तथा साधनकी कमीसे मेरे द्वारा जो न्यूनता या अधिकताका दोष बन गया हो, उसे आप क्षमा करेंगे। ईश्वर! दयानिधे! मैंने जो द्रव्यहीन, क्रियाहीन तथा मन्त्रहीन विधिविपरीत कर्म किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें। प्रभो! मैंने जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थाओंमें जो कर्म किया है, वह सब आपकी पूजारूप हो जाय और मेरे लिये कल्याणकारी हो। धरतीपर जो लड़खड़ाकर गिरते हैं, उनको सहारा देनेवाली भी धरती ही है, उसी प्रकार आपके प्रति अपराध करनेवाले मनुष्योंके लिये भी आप ही शरणदाता हैं, परमेश्वर! आपके
* इसका भावार्थ इस प्रकार है—'इससे पहले प्राण, बुद्धि, देहधर्मके अधिकारसे जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओंमें मनसे, वाणीसे, दोनों हाथोंसे, चरणोंसे, उदरसे, लिङ्गसे मैंने जो कुछ सोचा है, जो बात कही है तथा जो कर्म किया है, वह ब्रह्मार्पण हो, स्वाहा। मैं अपनेको और अपने सर्वस्वको आप श्रीविष्णुकी सेवामें समर्पित करता हूँ। ॐ तत्सत्।'