संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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दो-दो मासोंकी शिशिरादि छः ऋतुएँ होती हैं॥ १२७॥ मकरसे दो-दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमशः शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म—ये तीन ऋतुएँ उत्तरायणमें होती हैं और कर्कसे दो-दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमशः वर्षा, शरद् और हेमन्त—ये तीन ऋतुएँ दक्षिणायनमें होती हैं॥ १२८॥ शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे अमावास्यातक 'चान्द्र मास' होता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तितक 'सौर मास' होता है। तीस दिनोंका एक 'सावन मास' होता है और चन्द्रमाद्वारा सब नक्षत्रोंके उपभोगमें जितने दिन लगते हैं, उतने अर्थात् २७ दिनोंका एक 'नाक्षत्र मास' होता है॥ १२९॥ मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभः, नभस्य, इष, उर्ज, सहाः, सहस्य, तप और तपस्य—ये चैत्रादि बारह मासोंकी संज्ञाएँ हैं। जिस मासकी पौर्णमासी जिस नक्षत्रसे युक्त हो, उस नक्षत्रके नामसे ही उस मासका नामकरण होता है। (जैसे जिस मासकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्रसे युक्त होती है, उस मासका नाम 'चैत्र' होता है और वह पौर्णमासी भी उसी नामसे विख्यात होती है, जैसे चैत्री, वैशाखी आदि।) प्रत्येक मासके दो पक्ष क्रमशः देवपक्ष और पितृपक्ष हैं, अन्य विद्वान् उन्हें शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष कहते हैं॥ १३०—१३२॥ वे दोनों पक्ष शुभाशुभ कार्योंमें सदा उपयुक्त माने जाते हैं। ब्रह्मा, अग्नि, विरञ्चि, विष्णु, गौरी, गणेश, यम, सर्प, चन्द्रमा, कार्तिकेय, सूर्य, इन्द्र, महेन्द्र, वासव, नाग, दुर्गा, दण्डधर, शिव, विष्णु, हरि, रवि, काम, शंकर, कलाधर, यम, चन्द्रमा (विष्णु, काम और शिव)—ये सब शुक्ल प्रतिपदासे लेकर क्रमशः उनतीस तिथियोंके स्वामी होते हैं। अमावास्या नामक तिथिके स्वामी पितर माने गये हैं।
(तिथियोंकी नन्दादि पाँच संज्ञा—) प्रतिपदा आदि तिथियोंकी क्रमशः नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा—ये पाँच संज्ञाएँ मानी गयी हैं। पंद्रह तिथियोंमें इनकी तीन आवृत्ति करके इनका पृथक्-पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। शुक्लपक्षमें प्रथम आवृत्तिकी (१, २, ३, ४, ५—ये) तिथियाँ अधम द्वितीय आवृत्तिकी (६, ७, ८, ९, १०—ये) तिथियाँ मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी (११, १२, १३, १४, १५—ये) तिथियाँ शुभ होती हैं। इसी प्रकार कृष्णपक्षकी प्रथम आवृत्तिकी नन्दादि तिथियाँ इष्ट (शुभ), द्वितीय आवृत्तिकी मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी अनिष्टप्रद (अधम) होती हैं। दोनों पक्षोंकी ८, १२, ६, ४, ९, १४—ये तिथियाँ पक्षरन्ध्र कही गयी हैं। इन्हें अत्यन्त रूक्ष कहा गया है। इनमें क्रमशः आरम्भकी ४, १४, ९, ९, २५ और ५ घड़ियाँ सब शुभ कार्योंमें त्याग देने योग्य हैं। अमावास्या और नवमीको छोड़कर अन्य सब विषम तिथियाँ (३, ५, ७, ११, १३) सब कार्योंमें प्रशस्त हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदा मध्यम है (कृष्ण पक्षकी प्रतिपदा शुभ है)।
षष्ठीमें तैल, अष्टमीमें मांस* चतुर्दशीमें क्षौर एवं पूर्णिमा और अमावास्यामें स्त्रीका सेवन त्याग दे। अमावास्या, षष्ठी, प्रतिपदा, द्वादशी, सभी पर्व और नवमी—इन तिथियोंमें कभी दातौन नहीं करना चाहिये। व्यतीपात, संक्रान्ति, एकादशी, पर्व, रवि और मङ्गलवार तथा षष्ठी तिथि और वैधृति-योगमें अभ्यञ्जन (उबटन)-का निषेध है। जो मनुष्य दशमी तिथिमें आँवलेसे स्नान करता है, उसको पुत्रकी हानि उठानी पड़ती है। त्रयोदशीको आँवलेसे स्नान करनेपर धनका नाश होता है और द्वितीयाको उससे स्नान करनेवालोंके धन और पुत्र दोनोंका नाश होता है। इसमें संशय नहीं है। अमावास्या, नवमी और सप्तमी—इन तीन तिथियोंमें आँवलेसे स्नान करनेवालोंके कुलका विनाश होता है॥ १३३—१४४ १/२ ॥
जो पूर्णिमा दिनमें पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो
*मांस तो सबके लिये सदा ही त्याज्य है, किंतु जो मांसाहारी हैं उन्हें भी अष्टमीको तो मांस त्याग ही देना चाहिये।
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* संक्षिप्त नारदपुराण *
(अर्थात् जिसमें रात्रिके समय चन्द्रमा कलाहीन हो) वह पूर्णिमा 'अनुमती' कहलाती है और जो रात्रिमें पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो वह 'राका' कहलाती है। इसी प्रकार अमावास्या भी दो प्रकारकी होती है। जिसमें चन्द्रमाकी किंचित् कलाका अंश शेष रहता है, वह 'सिनीवाली' कही गयी है तथा जिसमें चन्द्रमाकी सम्पूर्ण कला लुप्त हो जाती है, वह अमावास्या 'कुहू' कहलाती है१ ॥ १४५-१४६ ॥
(युगादि तिथियाँ—) कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी सत्ययुगकी आदि तिथि है (इसी दिन सत्ययुगका प्रारम्भ हुआ था), वैशाख शुक्लपक्षकी पुण्यमयी तृतीया त्रेतायुगकी आदि तिथि है। माघकी अमावास्या द्वापरयुगकी आदि तिथि और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी कलियुगकी आदि तिथि है। (ये सब तिथियाँ अति पुण्य देनेवाली कही गयी हैं) ॥ १४७-१४८ ॥
(मन्वादि तिथियाँ—) कार्तिकशुक्ला द्वादशी, आश्विनशुक्ला नवमी, चैत्रशुक्ला तृतीया, भाद्रपदशुक्ला तृतीया, पौषशुक्ला एकादशी, आषाढ़शुक्ला दशमी, माघशुक्ला सप्तमी, भाद्रपदकृष्णा अष्टमी, श्रावणकी अमावास्या, फाल्गुनकी पूर्णिमा, आषाढ़की पूर्णिमा, कार्तिककी पूर्णिमा, ज्येष्ठकी पौर्णमासी और चैत्रकी पूर्णिमा—ये चौदह मन्वादि तिथियाँ हैं। ये सब तिथियाँ मनुष्योंके लिये पितृकर्म (पार्वण-श्राद्ध)-में अत्यन्त पुण्य देनेवाली हैं॥ १४९-१५१ १/२ ॥
(गजच्छाया-योग—) भादोंके२ कृष्णपक्षकी (शुक्लादि क्रमसे भाद्रकृष्ण और कृष्णादि क्रमसे आश्विन कृष्ण पक्षकी) त्रयोदशीमें यदि सूर्य हस्त-नक्षत्रमें और चन्द्रमा मघामें हो तो 'गजच्छाया' नामक योग होता है; जो पितरोंके पार्वणादि श्राद्ध कर्ममें अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाला है॥ १५२ १/२ ॥
किसी एक दिनमें तीन तिथियोंका स्पर्श हो तो क्षयतिथि तथा एक ही तिथिका तीन दिनमें स्पर्श हो तो अधिक तिथि (अधितिथि) होती है। ये दोनों ही निन्दित हैं। जिस दिन सूर्योदयसे सूर्यास्तपर्यन्त जो तिथि रहती है, उस दिन वह 'अखण्ड तिथि' कहलाती है। यदि सूर्यास्तसे पूर्व ही समाप्त होती है तो वह 'खण्ड तिथि' कही जाती है ॥ १५३-१५४ १/२ ॥
(क्षणतिथिकथन—) प्रत्येक तिथिमें तिथि-मानका पंद्रहवाँ भाग 'क्षणतिथि' कहलाता है। (अर्थात् प्रत्येक तिथिमें उसी तिथिसे आरम्भ करके पंद्रह तिथियोंके अन्तर्भोग होते हैं।) तथा उन क्षणतिथियोंका भी आधा क्षण तिथ्यर्ध (क्षण करण) होता है३ ॥ १५५ १/२ ॥
(वारप्रकरण—) रवि स्थिर, सोम चर, मङ्गल
१. अमावास्या प्रायः दो दिन हुआ करती है। उनमें प्रथम दिनकी 'सिनीवाली' और दूसरे दिनकी 'कुहू' होती है। चतुर्दशीयुक्ता अमावास्याका क्षय न हो तो वह सिनीवाली होती है।
२. 'अमावास्यान्त' मासकी दृष्टिसे यहाँ भादोंका कृष्णपक्ष कहा गया है। जहाँ पूर्णिमान्त मास माना जाता है, वहाँके लिये इस भादोंका अर्थ आश्विन समझना चाहिये।
३. जैसे प्रतिपदाका भोगमान (आरम्भसे अन्ततक) ६० घड़ी है तो उस तिथिमें आरम्भसे ४ घड़ी प्रतिपदा है, उसके बादकी ४ घड़ी द्वितीया है और उसके बादकी ४ घड़ी तृतीया है। इसी प्रकार आगे भी चतुर्थी आदि सब तिथि प्राप्त होती है। इसी तरह द्वितीयामें भी द्वितीया आदि सब तिथियोंका भोग समझना चाहिये तथा क्षणतिथिमें भी २-२ घड़ी क्षणकरणका मान समझना चाहिये। इसका प्रयोजन यह है कि जिस तिथिमें जो कार्य शुभ या अशुभ कहा गया है, वह क्षणतिथिमें भी शुभ या अशुभ समझना चाहिये। जैसे चतुर्दशीमें क्षौर कराना अशुभ कहा गया है तो तृतीया आदि अन्य तिथियोंमें भी जब चतुर्दशी क्षणतिथिके रूपमें प्राप्त हो तो उसमें क्षौर कराना अशुभ होता है तथा चतुर्दशीमें भी आवश्यक हो तो अन्य तिथिके भोगसमयमें क्षौर करानेमें दोष नहीं समझा जायगा। विशेष आवश्यक शुभ कार्यमें ही तिथि और क्षणतिथिका विचार करना चाहिये।