संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-प्रथम पाद ११९
- पूर्वभाग-प्रथम पाद * ११९
परतिथिको। यदि पहले दिन क्षयाहतिथि चार घड़ी हो और दूसरे दिन वह सायंकालतक व्यास हो तो श्राद्धके लिये दूसरे दिनवाली तिथि ही उत्तम मानी गयी है। द्विजोत्तम! निमन्त्रित ब्राह्मणोंके एकत्र होनेपर प्रायश्चित्तसे शुद्ध हृदयवाला श्राद्धकर्ता पुरुष उनसे श्राद्धके लिये आज्ञा ले। ब्राह्मणोंसे श्राद्धके लिये आज्ञा मिल जानेपर श्राद्धकर्ता पुरुष फिर उनमेंसे दोको विश्वेदेव श्राद्धके लिये और तीनको विधिपूर्वक पितृश्राद्धके लिये पुनः निमन्त्रित करे। अथवा देवश्राद्ध तथा पितृश्राद्धके लिये एक-एक ब्राह्मणको ही निमन्त्रित करे। श्राद्धके लिये आज्ञा लेकर एक-एक मण्डल बनावे। ब्राह्मणके लिये चौकोर, क्षत्रियके लिये त्रिकोण तथा वैश्यके लिये गोल मण्डल बनाना आवश्यक समझना चाहिये और शूद्रको मण्डल न बनाकर केवल भूमिको सींच देना चाहिये। योग्य ब्राह्मणोंके अभावमें भाईको, पुत्रको अथवा अपने-आपको ही श्राद्धमें नियुक्त करे। परंतु वेदशास्त्रके ज्ञानसे रहित ब्राह्मणको श्राद्धमें नियुक्त न करे। ब्राह्मणोंके पैर धोकर उन्हें आचमन करावे और नियत आसनपर बैठाकर भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए उनकी विधिपूर्वक पूजा करे। ब्राह्मणोंके बीचमें तथा श्राद्धमण्डपके द्वारदेशमें श्राद्धकर्ता पुरुष 'अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः।' इस ऋचाका उच्चारण करते हुए तिल बिखेरे। जौ और कुशोंद्वारा विश्वेदेवोंको आसन दे। हाथमें जौ और कुश लेकर कहे—'विश्वेषां देवानाम् इदम् आसनम्' ऐसा कहकर विश्वेदेवोंके बैठनेके लिये आसनरूपसे उस कुशाको रख दे और प्रार्थना करे—हे विश्वेदेवो! आपलोग इस देवश्राद्धमें अपना क्षण (समय) दें और प्रतीक्षा करें। अक्षय्योदक और आसन समर्पणके वाक्यमें विश्वेदेवों और पितरोंके लिये षष्ठी विभक्तिका प्रयोग करना चाहिये। आवाहन-वाक्यमें द्वितीया विभक्ति बतायी गयी है। अन्न समर्पणके वाक्यमें चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग होना चाहिये। शेष कार्य सम्बोधनपूर्वक करना चाहिये। कुशकी पवित्रीसे युक्त दो पात्र लेकर उनमें 'शं नो देवी' इत्यादि ऋचाका उच्चारण करके जल डाले। फिर 'यवोऽसि' इत्यादि मन्त्र बोलकर उसमें जव डाले। उसके बाद चुपचाप बिना मन्त्रके ही गन्ध और पुष्प छोड़ दे। इस प्रकार अर्घ्यपात्र तैयार हो जानेपर 'विश्वेदेवाः स' इत्यादि मन्त्रसे विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तदनन्तर 'या दिव्या आपः' इत्यादि मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके एकाग्रचित्त हो पितृ और मातामह-सम्बन्धी विश्वेदेवोंको संकल्पपूर्वक क्रमशः अर्घ्य दे। उसके बाद गन्ध, पत्र, पुष्प, यज्ञोपवीत, धूप, दीप आदिके द्वारा उन देवताओंका पूजन करे। तत्पश्चात् विश्वेदेवोंसे आज्ञा लेकर पितृगणोंका पूजन करे। उनके लिये सदा तिलयुक्त कुशोंवाला आसन देना चाहिये। उन्हें अर्घ्य देनेके लिये द्विज पूर्ववत् तीन पात्र रखे। 'शं नो देवी०' इत्यादि मन्त्रसे जल डालकर 'तिलोऽसि सोमदैवत्यो' इत्यादि मन्त्रसे तिल डाले। फिर 'उशन्तस्त्वा' इत्यादि मन्त्रद्वारा पितरोंका आवाहन करके ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो 'या दिव्या आपः' इत्यादि मन्त्रसे
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अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके पूर्ववत् संकल्पपूर्वक पितरोंको समर्पित करे (अर्घ्यपात्रको उलटकर पितरोंके वामभागमें रखना चाहिये)। साधुशिरोमणे! तदनन्तर गन्ध, पत्र, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र और आभूषणसे अपनी शक्तिके अनुसार उन सबकी पूजा करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष घृतसहित अन्नका ग्रास ले 'अग्नौ करिष्ये' (अग्निमें होम करूँगा) ऐसा कहकर उन ब्राह्मणोंसे इसके लिये आज्ञा ले। मुने! 'करवै'—अथवा 'करवाणि' (करूँ?) ऐसा कहकर श्राद्धकर्ताके पूछनेपर ब्राह्मण लोग 'कुरुष्व' 'क्रियताम्' अथवा 'कुरु' (करो) ऐसा कहें। इसके बाद अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार उपासनाग्निकी स्थापना करके उसमें पूर्वोक्त अन्नके ग्रासकी दो आहुतियाँ डाले। उस समय 'सोमाय पितृमते स्वधा नमः' ऐसा उच्चारण करे। फिर 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः' ऐसा उच्चारण करे। विद्वान् पुरुष अन्तमें स्वधाकी जगह स्वाहा लगाकर भी पितृयज्ञकी भाँति आहुति दे सकते हैं। इन्हीं दो आहुतियोंसे पितरोंको अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। अग्निके अभावमें अर्थात् यजमानके अग्निहोत्री न होनेपर ब्राह्मणके हाथमें दानरूप होम करनेका विधान है*। ब्रह्मन्! जैसा आचार हो, उसके अनुसार ब्राह्मणके हाथ या अग्निमें उक्त होम करना चाहिये। पार्वण उपस्थित होनेपर अग्निको दूर नहीं करना चाहिये। विप्रवर! यदि पार्वण उपस्थित होनेपर अपनी उपास्य अग्नि दूर हो तो पहले नूतन अग्निकी स्थापना करके उसमें होम आदि आवश्यक कार्य करनेके पश्चात् विद्वान् पुरुष उस अग्निका विसर्जन कर दे। यदि क्षयाह (निधनदिन) तिथि प्राप्त हो और उपासनाग्नि दूर हो तो अपने अग्निहोत्री द्विज भाइयोंसे विधिपूर्वक श्राद्धकर्म सम्पन्न करावे। द्विजश्रेष्ठ! श्राद्धकर्ता प्राचीनावीती होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर करके) अग्निमें होम करे और होमावशिष्ट अन्नको ब्राह्मणके पात्रोंमें भगवत्स्मरणपूर्वक डाले। फिर स्वादिष्ट भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आदिके द्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त हो विश्वेदेव और पितर—दोनोंके लिये अन्न परोसे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे—
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः॥
ये यत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते।
(ना० पूर्व० २८। ५७-५८)
'महान् बलवान् महाभाग विश्वेदेवगण यहाँ पधारें और जो जिस श्राद्धमें विहित हों वे उसके लिये सावधान रहें।'
इस प्रकार विश्वेदेवोंसे प्रार्थना करे। 'ये देवासः' इत्यादि मन्त्रसे भी उनकी अभ्यर्थना करनी चाहिये। देवपक्षके ब्राह्मणोंसे भी ऐसी ही प्रार्थना करे। उसके बाद 'ये चेह पितरो' इत्यादि मन्त्रसे पितरोंकी अभ्यर्थना करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे उनको नमस्कार करे—
अमूर्तानां च मूर्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम्॥
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां योगचक्षुषाम्।
(ना० पूर्व० २८। ५९-६०)
'जिनका तेज सब ओर प्रकाशित हो रहा है, जो ध्यानपरायण तथा योगदृष्टिसे सम्पन्न हैं, उन मूर्त पितरोंको तथा अमूर्त पितरोंको भी मैं सदा नमस्कार करता हूँ।'
इस प्रकार पितरोंको प्रणाम करके श्राद्धकर्ता
* आजकल अपात्रक पार्वण आदि श्राद्धोंमें अग्नौकरण होमकी दोनों आहुतियाँ पुटकस्थित जलमें डाली जाती हैं। परंतु प्राचीन मत उपासनाग्निमें ही हवन करनेका है। आश्वलायनका वचन है 'अग्नौकरणहोमं तु कुर्यादौपासनानले' और अग्निके अभावमें पितृस्वरूप ब्राह्मणोंके हाथमें हवन करनेका विधान है जैसा कि आश्वलायनका वचन है। 'सव्यहस्तं पितृपाणिषु' अतः नारदपुराणका मूलोक्त वचन अन्य स्मृतिकारोंके मतसे भी मिलता-जुलता है।