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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

श्रीमद्भागवतका परिचय, माहात्म्य तथा दानजनित फल

५२६
* संक्षिप्त नारदपुराण *


वर्णन है और विस्तारके साथ शिवसंहिता कही गयी है। जो भगवान् सम्पूर्ण देवताओंके लिये दुर्ज्ञेय और सनातन हैं, वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते हैं, वही यह नर्मदाका जल ब्रह्मा है, यही विष्णु है और यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात् शिव है। यह नर्मदाजल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है। निश्चय ही भगवान् शिवने समस्त लोकोंका हित करनेके लिये अपने शरीरसे इस नर्मदा नदीके रूपमें किसी दिव्य शक्तिको ही धरतीपर उतारा है। जो नर्मदाके उत्तर तटपर निवास करते हैं, वे भगवान् रुद्रके अनुचर होते हैं और जिनका दक्षिण तटपर निवास है, वे भगवान् विष्णुके लोकमें जाते हैं। ॐकारेश्वरसे लेकर पश्चिम समुद्रतक नर्मदा नदीमें दूसरी नदियोंके पैंतीस पापनाशक संगम हैं, उनमेंसे ग्यारह तो उत्तर तटपर हैं और तेईस दक्षिण तटपर। पैंतीसवाँ तो स्वयं नर्मदा और समुद्रका संगम कहा गया है। नर्मदाके दोनों तटोंपर इन संगमोंके साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ हैं। मुनीश्वर! इनके सिवा अन्य साधारण तीर्थ तो रेवाके दोनों तटोंपर पग-पगपर विद्यमान हैं, जिनकी संख्या साठ करोड़ साठ हजार है। यह परमात्मा शिवकी संहिता परम पुण्यमयी है, जिसमें वायुदेवताने नर्मदाके चरित्रका वर्णन किया है। जो इस पुराणको लिखकर गुड़मयी धेनुके साथ श्रावणकी पूर्णिमाको भक्तिपूर्वक कुटुम्बी ब्राह्मणके हाथमें दान देता है, वह चौदह इन्द्रोंके राज्यकालतक रुद्रलोकमें निवास करता है। जो मनुष्य नियमपूर्वक हविष्य भोजन करते हुए इस वायुपुराणको सुनाता अथवा सुनता है, वह साक्षात् रुद्र है, इसमें संशय नहीं है। जो इस अनुक्रमणिकाको सुनता और सुनाता है, वह भी समस्त पुराणके श्रवणका फल पा लेता है।

श्रीमद्भागवतका परिचय, माहात्म्य तथा दानजनित फल

**ब्रह्माजी कहते हैं—**मरीचे! सुनो, वेदव्यासजीने जो वेदतुल्य श्रीमद्भागवत नामक महापुराणका सम्पादन किया है, वह अठारह हजार श्लोकोंका बतलाया गया है। यह पुराण सब पापोंका नाश करनेवाला है। यह बारह शाखाओंसे युक्त कल्पवृक्षस्वरूप है। विप्रवर! इसमें विश्वरूप भगवान्‌का ही प्रतिपादन किया गया है। इसके पहले स्कन्धमें सूत और शौनकादि ऋषियोंके समागमका प्रसंग उठाकर व्यासजी तथा पाण्डवोंके पवित्र चरित्रका वर्णन किया गया है। इसके बाद परीक्षित्‌के जन्मसे लेकर प्रायोपवेशनतककी कथा कही गयी है। यहींतक प्रथम स्कन्धका विषय है। फिर परीक्षित्-शुकसंवादमें स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारकी धारणाओंका निरूपण है। तदनन्तर ब्रह्म-नारद-संवादमें भगवान्‌के अवतारसम्बन्धी अमृतोपम चरित्रोंका वर्णन है। फिर पुराणका लक्षण कहा गया है। बुद्धिमान् व्यासजीने यह द्वितीय स्कन्धका विषय बताया है, जो सृष्टिके

  • पूर्वभाग-चतुर्थ पाद * ५२७

कारणतत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रतिपादक है। तत्पश्चात् विदुरका चरित्र, मैत्रेयजीके साथ विदुरका समागम, परमात्मा ब्रह्मासे सृष्टिक्रमका निरूपण और महर्षि कपिलद्वारा कहा हुआ सांख्य—यह सब विषय तृतीय स्कन्धके अन्तर्गत बताया गया है। तदनन्तर पहले सतीचरित्र, फिर ध्रुवका चरित्र, तत्पश्चात् राजा पृथुका पवित्र उपाख्यान, फिर राजा प्राचीनबर्हिष्की कथा—यह सब विसर्गविषयक परम उत्तम चौथा स्कन्ध कहा गया है। राजा प्रियव्रत और उनके पुत्रोंका पुण्यदायक चरित्र, ब्रह्माण्डके अन्तर्गत विभिन्न लोकोंका वर्णन तथा नरकोंकी स्थिति—यह संस्थानविषयक पाँचवाँ स्कन्ध है। अजामिलका चरित्र, दक्ष प्रजापतिद्वारा की हुई सृष्टिका निरूपण, वृत्रासुरकी कथा और मरुद्गणोंका पुण्यदायक जन्म—यह सब व्यासजीके द्वारा छठा स्कन्ध कहा गया है। वत्स! प्रह्लादका पुण्यचरित्र और वर्णाश्रमधर्मका निरूपण यह सातवाँ स्कन्ध बताया गया है। यह ‘ऊति’ अथवा कर्मवासनाविषयक स्कन्ध है। इसमें उसीका प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् मन्वन्तरनिरूपणके प्रसंगमें गजेन्द्रमोक्षकी कथा, समुद्रमन्थन, बलिके ऐश्वर्यकी वृद्धि और उनका बन्धन तथा मत्स्यावतारचरित्र—यह आठवाँ स्कन्ध कहा गया है। महामते! सूर्यवंशका वर्णन और चन्द्रवंशका निरूपण—यह वंशानुचरितविषयक नवाँ स्कन्ध बताया गया है। श्रीकृष्णका बालचरित, कुमारावस्थाकी लीलाएँ, व्रजमें निवास, किशोरावस्थाकी लीलाएँ, मथुरामैं निवास, युवावस्था, द्वारकामें निवास और भूभारहरण—यह निरोधविषयक दसवाँ स्कन्ध है। नारद-वसुदेव-संवाद, यदु-दत्तात्रेय-संवाद और श्रीकृष्णके साथ उद्धवका संवाद, आपसके कलहसे यादवोंका संहार—यह सब मुक्तिविषयक ग्यारहवाँ स्कन्ध है। भविष्य राजाओंका वर्णन, कलिधर्मका निर्देश, राजा परीक्षित्के मोक्षका प्रसङ्ग, वेदोंकी शाखाओंका विभाजन, मार्कण्डेयजीकी तपस्या, सूर्यदेवकी विभूतियोंका वर्णन, तत्पश्चात् भागवती विभूतिका वर्णन और अन्तमें पुराणोंकी श्लोक-संख्याका प्रतिपादन—यह सब आश्रयविषयक बारहवाँ स्कन्ध है। वत्स! इस प्रकार तुम्हें श्रीमद्भागवतका परिचय दिया गया है। वह वक्ता, श्रोता, उपदेशक, अनुमोदक और सहायक—सबको भक्ति, भोग और मोक्ष देनेवाला है। जो भगवान्की भक्ति चाहता हो, वह भाद्रपदकी पूर्णिमाको सोनेके सिंहासनके साथ इस भागवतका भगवद्भक्त ब्राह्मणको प्रेमपूर्वक दान करे। उसके पहले वस्त्र और सुवर्ण आदिके द्वारा ब्राह्मणकी पूजा कर लेनी चाहिये। जो मनुष्य भागवतकी इस विषयानुक्रमणिकाका दूसरेको श्रवण कराता अथवा स्वयं सुनता है, वह समस्त पुराणके श्रवणका उत्तम फल प्राप्त कर लेता है।

५२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

नारदपुराणकी विषय-सूची, इसके पाठ, श्रवण और दानका फल

**ब्रह्माजी कहते हैं—**ब्रह्मन्! सुनो, अब मैं नारदीय पुराणका वर्णन करता हूँ। इसमें पचीस हजार श्लोक हैं। इसमें बृहत्कल्पकी कथाका आश्रय लिया गया है। इसमें पूर्वभागके प्रथम पादमें पहले सूत-शौनक-संवाद है; फिर सृष्टिका संक्षेपसे वर्णन है। फिर महात्मा सनकके द्वारा नाना प्रकारके धर्मोंकी पुण्यमयी कथाएँ कही गयी हैं। पहले पादका नाम ‘प्रवृत्तिधर्म’ है। दूसरा पाद ‘मोक्षधर्म’के नामसे प्रसिद्ध है। उसमें मोक्षके उपायोंका वर्णन है। वेदाङ्गोंका वर्णन और शुकदेवजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग विस्तारके साथ आया है। सनन्दनजीने महात्मा नारदको इस द्वितीय पादका उपदेश किया है। तृतीय पादमें सनत्कुमार मुनिने नारदजीको महातन्त्रवर्णित ‘पशुपशविमोक्ष’का उपदेश दिया है। फिर गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति आदिके मन्त्रोंका शोधन, दीक्षा, मन्त्रोद्धार, पूजन, प्रयोग, कवच, सहस्रनाम और स्तोत्रका क्रमशः वर्णन किया है। तदनन्तर चतुर्थ पादमें सनातन मुनिने नारदजीसे पुराणोंका लक्षण, उनकी श्लोक-संख्या तथा दानका पृथक्-पृथक् फल बताया है। साथ ही उन दानोंका अलग-अलग समय भी नियत किया है। इसके बाद चैत्र आदि सब मासोंमें पृथक्-पृथक् प्रतिपदा आदि तिथियोंका सर्वपापनाशक व्रत बताया है। यह ‘बृहदाख्यान’ नामक पूर्वभाग बताया गया है। इसके उत्तर भागमें एकादशी व्रतके सम्बन्धमें किये हुए प्रश्नके उत्तरमें महर्षि वसिष्ठके साथ राजा मान्धाताका संवाद उपस्थित किया गया है। तत्पश्चात् राजा रुक्माङ्गदकी पुण्यमयी कथा, मोहिनीकी उत्पत्ति, उसके कर्म, पुरोहित वसुका मोहिनीके लिये शाप, फिर शापसे उसके उद्धारका कार्य, गङ्गाकी पुण्यतम कथा, गयायात्रावर्णन, काशीका अनुपम माहात्म्य, पुरुषोत्तमक्षेत्रका वर्णन, उस क्षेत्रकी यात्राविधि, तत्सम्बन्धी अनेक उपाख्यान, प्रयाग, कुरुक्षेत्र और हरिद्वारका माहात्म्य, कामोदाकी कथा, बदरीतीर्थका माहात्म्य, कामाक्षा और प्रभासक्षेत्रकी महिमा, पुष्करक्षेत्रका माहात्म्य, गौतममुनिका आख्यान, वेदपादस्तोत्र, गोकर्णक्षेत्रका माहात्म्य, लक्ष्मणजीकी कथा, सेतुमाहात्म्यकथन, नर्मदाके तीर्थोंका वर्णन, अवन्तीपुरीकी महिमा, तदनन्तर मथुरा-माहात्म्य, वृन्दावनकी महिमा, वसुका ब्रह्माके निकट जाना, तत्पश्चात् मोहिनीका तीर्थोंमें भ्रमण आदि विषय हैं। इस प्रकार यह सब नारदमहापुराण है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो इस पुराणको सुनता अथवा सुनाता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जो आश्विनकी पूर्णिमाके दिन सात धेनुओंके साथ इस पुराणका श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान करता है, वह निश्चय ही मोक्ष पाता है। जो एकचित्त होकर नारदपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका वर्णन अथवा श्रवण करता है, वह भी स्वर्गलोकमें जाता है।