सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २६१

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २६१
पञ्चराश्यादिकेऽन्योन्यपक्षं कृत्वा फलच्छिदाम्।<br>बहुराशिवधे भक्ते फलं स्वल्पवधेन च ॥ ३८ ॥<br>इष्टकर्मविधेर्मूलं च्युतं मिश्रात् कलान्तरम्।<br>मानघ्नकालश्रातीतकालघ्नफलसंहताः ॥ ३९ ॥<br>स्वयोगभक्ता मिश्रघ्नाः सम्प्रयुक्तदलानि च।<br>पञ्चराशिक, सप्तराशिक (नवराशिक, एकादशराशिक) आदिमें फल और हरोंको परस्परपक्षमें परिवर्तन करके (प्रमाण-पक्षवालेको इच्छा-पक्षमें और इच्छा-पक्षवालेको प्रमाण-पक्षमें रखकर) अधिक राशियोंके घातमें अल्पराशिके घातसे भाग देनेपर जो लब्धि आवे, वही इच्छाफल है॥ ३८॥ मिश्रधनको इष्ट मानकर इष्टकर्मसे मूलधनका ज्ञान करे, उसको मिश्रधनमें घटानेसे कलान्तर (सूद) समझना चाहिये।^१ अपने-अपने

फल १०० को इच्छासे गुणा करके प्रमाणसे भाग दिया जायगा तो \frac{१००\times७}{५} = १४० यह इच्छाफल हुआ (अर्थात् सात रुपयेके १४० आम हुए)।

जहाँ इच्छाकी वृद्धिमें फलकी वृद्धि और

२७० * संक्षिप्त नारदपुराण *


प्रमाण धनसे अपने-अपने कालको गुणा करना, उसमें अपने-अपने व्यतीत काल और फलके घात (गुणा)-से भाग देना, लब्धिको पृथक् रहने देना, उन सबमें उन्हींके योगका पृथक्-पृथक् भाग देना तथा सबको मिश्रधनसे गुणा कर देना चाहिये। फिर क्रमसे प्रयुक्त व्यापारमें लगाये हुए धनखण्डके प्रमाण ज्ञात होते हैं^१॥ ३९ \frac{१}{२} ॥

बहुराशिफलात् स्वल्पराशिमासफलं बहु ॥ ४० ॥
चेद्राशिजफलं मासफलाहितहतं चयः।

पञ्चराशिकादिमें फल और हरको अन्योन्य पक्षनयन करनेसे इच्छा-पक्षमें फलके चले जानेसे इच्छापक्ष बहुराशि और प्रमाण-पक्ष स्वल्पराशि माना गया है। इसी गणितके उदाहरणमें जब इच्छाफल जानकर मूलधन जानना होगा तो फलोंको परस्पर पक्षमें परिवर्तन करनेसे प्रमाण-पक्ष (स्वल्पराशि) का फल ही बहुराशि (इच्छापक्ष)-से अधिक होगा। यहाँ राशिजफलको इष्टमास और प्रमाण-फलके गुणनसे भाग देनेपर मूलधन होता है^२॥ ४० \frac{१}{२} ॥

क्षेपा मिश्रहताः क्षेपयोगभक्ताः फलानि च ॥ ४१ ॥
भजेच्छिदोंऽशैस्तैर्मिश्रै रूपं कालश्च पूर्तिकृत् ।

प्रक्षेप (पूँजीके टुकड़े)-को पृथक्-पृथक् मिश्रधनसे गुण देना और उसमें प्रक्षेपके योगसे भाग देना चाहिये। इससे पृथक्-पृथक् फल ज्ञात


१. कल्पित ब्याज हुआ। कल्पित मिश्रधन ५+३=८, इससे इष्टगुणित दृश्यमें भाग देनेसे उद्दिष्ट मूलधन १०००×५=६२५) इसको मिश्रधन १००० में घटानेसे ३७५) ब्याजके हुए। संक्षेपसे इस प्रकार न्यास करना चाहिये—

\frac{८}{५} ११२लब्धिक्रमसे मूल ६२५)
१००१०००ब्याज ३७५)
५०

अथवा इष्टकर्मसे कल्पित इष्ट १
पूर्वोक्त रीतिसे कलान्तर (सूद) ३/५ इससे युक्त १=८/५
१००० ÷ \frac{८}{५} = \frac{१०००\times ५}{८} = ६२५) मूलधन
१०००-६२५=३७५) ब्याज

२. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है—किसीने अपने ९४) रुपये मूलधनके तीन भाग करके एक भागको माहवारी पाँच रुपये सैकड़े ब्याज, दूसरे भागको तीन रुपये और तीसरे भागको चार रुपये सैकड़े ब्याजपर दिया। क्रमशः तीनों भागोंमें सात, दस और पाँच मासमें बराबर ब्याज मिले तो तीनों भागोंकी अलग-अलग संख्या बताओ।

भाग १भाग २भाग ३मिश्रधन (सम्मिलित मूलधन) ९४
प्रमाणकाल १ व्यतीतकाल ७प्र०का०१ व्य०का०१०प्र० का० १ व्य० का० ५
प्रमाण धन १००प्रमाण धन १००प्रमाण धन १००
प्रमाण फल ५प्रमाण फल ३प्रमाण फल ४

अपने प्रमाणकाल और प्रमाणधनके गुणनफलमें व्यतीतकाल और प्रमाण-फलके गुणनफलसे भाग देनेपर—

\frac{१००\times १ = १००}{७\times ५ = ३५} = \frac{२०}{७} | \frac{१००\times १}{३\times १०} = \frac{१००}{३०} = \frac{१०}{३} | \frac{१००\times १}{४\times ५} = \frac{१००}{२०} = \frac{५}{१}

इनमें इनके योग २३५/२१ से भाग देने और मिश्रधन (९४)-से गुणा करनेपर पृथक्-पृथक् भाग इस प्रकार होते हैं—

\frac{२०}{७} \div \frac{२३५}{२१} = \frac{२०\times २१\times ९४}{७\times २३५} = २४ यह प्रथम भाग हुआ।
\frac{१०}{३} \div \frac{२३५}{२१} = \frac{१०\times २१\times ९४}{३\times २३५} = २८ यह द्वितीय भाग हुआ।
\frac{५}{१} \div \frac{२३५}{२१} = \frac{५\times २१\times ९४}{१\times २३५} = ४२ यह तृतीय भाग हुआ।

२. उदाहरण—एक मासमें १००) मूलधनका ५) रुपया ब्याज होता है तो १२ मासमें १६ रुपयेका कितना होगा?

उत्तरार्थ न्यास—

प्रमाणइच्छा
११२
१००१६
५x

अन्योन्य पक्षनयनसे

स्वल्प राशिबहुराशि
११२
१००१६
५
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २७१
    ---|---:
होते हैं।¹ वापी आदि पूरणके प्रश्नमें—अपने-अपने अंशोंसे हरमें भाग देना, फिर उन सबके योगसे १ में भाग देनेपर वापीके भरनेके समयका ज्ञान होता है² ॥ ४१ १/२ ॥उसमें १ घटाकर गुणक लिखे। यदि पद सम हो तो आधा करके वर्गचिह्न लिखे। इस प्रकार एक घटाने और आधा करनेमें भी जब विषमाङ्क हो तब गुणकचिह्न, जब समाङ्क हो तब वर्गचिह्न करना एवं जबतक पदकी कुल संख्या समाप्त न हो जाय तबतक करते रहना चाहिये। फिर अन्त्य चिह्नसे उलटा गुणज और वर्गफल साधन करके आद्य चिह्नतक जो फल हो, उसमें १ घटाकर शेषमें एकोन गुणकसे भाग देना चाहिये। लब्धिको आदि अङ्कसे गुणा करनेपर
गुणो गच्छेऽसमे व्येके समे वर्गोऽर्धितेऽन्ततः ॥ ४२ ॥<br>यद् गच्छान्तफलं व्यस्तं गुणवर्गभवं हि तत्।<br>व्येकं व्येकगुणाप्तं च प्राग्घ्नं मानं गुणोत्तरे ॥ ४३ ॥
(द्विगुणचयादि-वृद्धिमें फलका साधन)—<br>(जहाँ द्विगुण-त्रिगुण आदि चय हो वहाँ) पद यदि विषम संख्या (३, ५, ७ आदि) हो तो

श्लोकोक्त रीतिके अनुसार— \frac{१२\times१६\times५}{१००} = \frac{४८}{५} = इच्छाफल।

इसी उदाहरणमें मूलधन जाननेके लिये—
न्यास—

प्रमाण-पक्षइच्छा-पक्ष
मास ११२ मास
धनराशि १००x
फल ५\frac{४८}{५}=इच्छाफल (५ वीं राशि)

यहाँ फल और हरके अन्योन्य पक्षनयन करनेसे—

बहुराशिस्वल्पराशि
प्रमाणइच्छा
मास ११२
धन १००x
४८५
५

'बहुराशिपलात्' इत्यादि ४० वें श्लोकके अनुसार—
\frac{१\times१००\times४८}{१२\times५\times५} = १६ = मूलधन।


१. मान लीजिये कि ३ व्यापारियोंके क्रमसे ५१, ६८, ८५ रुपये मूलधन हैं। तीनोंने एक साथ मिलकर व्यापारसे ३००) रुपये प्राप्त किये तो इन तीनोंके पृथक्-पृथक् कितने धन होंगे? यहाँ मूलोक्त नियमके अनुसार प्रक्षेपों (५१, ६८, ८५)-को मिश्रधन ३०० से गुणाकर प्रक्षेपोंके योग २०४ के द्वारा भाग देनेपर लब्धिक्रमसे तीनोंके पृथक्-पृथक् भाग हुए।
यथा—प्रथमका
भाग=\frac{५१\times३००}{२०४}=७५। द्वितीयका भाग=\frac{६८\times३००}{२०४}=१००। तृतीयका भाग=\frac{८५\times३००}{२०४}=१२५।

२. कल्पना कीजिये कि एक झरना या नल किसी तालाबको १ दिन (१२ घंटे) में, दूसरा १/२ दिनमें, तीसरा १/३ दिनमें और चौथा १/६ दिनमें अलग-अलग खोलनेपर भर देता है तो यदि चारों एक ही साथ खोल दिये जायें तो दिनके कितने भागमें तालाबको भरेंगे।
मूलोक्त रीतिसे अपने-अपने अंशसे हरमें भाग देनेसे १/१, २/१, ३/१, ६/१, इनके योग १२/१ से १ में भाग देनेपर १/१२ हुआ। अर्थात् १ दिनके १२ वें भागमें (१ घंटेमें) तालाब भर जायगा।

२७२* संक्षिप्त नारदपुराण *

सर्वधन होता है^१॥ ४२-४३ ॥
भुजकोटिकृतेर्योगमूलं कर्णश्च दोर्भवेत्।
श्रुतिकोटिकृतेरन्तः पदं दोःकर्णवर्गयोः ॥ ४४ ॥
विवराद् यत्पदं कोटिः क्षेत्रे त्रिचतुरस्रके।
राश्योरन्तरवर्गेण द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥ ४५ ॥
वर्गयोगोऽथ योगान्तर्हतिर्वर्गान्तरं भवेत्।
(क्षेत्रव्यवहार-प्रकरण)—भुज और कोटिके वर्गयोगका मूल कर्ण होता है, भुज और कर्णके वर्गान्तरका मूल कोटि होता है तथा कोटि एवं कर्णके वर्गान्तरका मूल भुज होता है—यह बात त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रके लिये कही गयी है^२। अथवा राशिके अन्तरवर्गमें उन्हीं दोनों राशियोंका द्विगुणित घात (गुणनफल) जोड़ दें तो वर्गयोग होता है अथवा उन्हीं दोनों राशियोंके योगान्तरका घात वर्गान्तर होता है^३॥ ४४-४५\frac{१}{२}॥


१. कल्पना कीजिये कि किसी दाताने किसी याचकको पहले दिन २ रुपये देकर उसके बाद प्रतिदिन द्विगुणित करके देनेका निश्चय किया तो बताइये कि उसने ३० दिनमें कितने रुपये दान किये।
उत्तर—यहाँ आदि=२, गुणात्मकचय=२, पद=३० है। पद सम अंक है। अतः आधा करके १५ के स्थानमें वर्गचिह्न लगाया, यह विषमाङ्क हुआ, अतः उसमें १ घटाकर १४ के स्थानमें गुणकचिह्न लिखा। फिर यह सम हो गया, अतः आधा ७ करके वर्गचिह्न किया, इस प्रकार पद-संख्याकी समाप्तिपर्यन्त न्यास किया। न्यास देखिये—

न्यास—

१५ वर्ग१०७३७४१८२४
१४ गुण३२७६८
७ वर्ग१६३८४
६ गुण१२८
३ वर्ग६४
२ गुण८
१ वर्ग४
० गुण२

अन्तमें गुणचिह्न हुआ। वहाँ गुणकाङ्क २ को रखकर उलटा प्रथम चिह्नतक गुणक-वर्गज फल-साधन किया तो १०७३७४१८२४ हुआ।
इसमें एक घटाकर एकोनगुण (१)-से भाग देकर आदि (२)-से गुणा किया तो २,१४,७४,८३,६४६ रुपये सर्वधन हुआ।

२. लीलावती (क्षेत्रव्यवहार श्लोक १, २)-में इस विषयको इस प्रकार स्पष्ट किया है—‘त्रिभुज या चतुर्भुजमें जब एक भुजपर दूसरा भुज लम्बरूप हो, उन दोनोंमें एक (नीचेकी पड़ी रेखा)-को ‘भुज’ और दूसरी (ऊपरकी खड़ी रेखा)-को ‘कोटि’ कहते हैं। तथा उन दोनोंके वर्गयोग मूलको ‘कर्ण’ कहते हैं। भुज और कर्णका वर्गान्तर मूल कोटि तथा कोटि और कर्णका वर्गान्तर मूल भुज होता है। यथा—‘क, ग, च’ यह एक त्रिभुज है। ‘क, ग’ इस रेखाको कोटि कहते हैं। ‘ग, च’ इस रेखाका नाम भुज है, ‘क, च’ का नाम कर्ण है।

    क
    |\
    | \
    |  \
    |   \
    |    \
    |_____\
   ग       च

उदाहरण—जैसे प्रश्न हुआ कि जिस जात्य त्रिभुजमें कोटि=४, भुज=३ है वहाँका कर्णमान क्या होगा? तथा भुज और कर्ण जानकर कोटि बताओ और कोटि, कर्ण जानकर भुज बताओ।

उक्त रीतिसे ४ का वर्ग १६ और ३ का वर्ग ९, दोनोंके योग २५ का मूल ५ यह कर्ण हुआ। एवं कर्ण ५ और भुज ३, इन दोनोंके वर्गान्तर २५-९=१६, इसका मूल ४ कोटि हुई तथा कर्णके वर्ग २५ में कोटिके वर्ग १६ को घटाकर शेष ९ का मूल ३ भुज हुआ।
इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिये।
३. जैसे ३ और ४ ये दो राशियाँ हैं। इन दोनोंके दूने गुणनफलमें ३×४×२=२४ में दोनों राशियोंका अन्तर वर्ग (४-३)²=(१)²=१ मिलानेसे २४+१=२५ यह दोनों राशियोंके वर्गयोग (३)²+(४)²=९+१६=२५ के बराबर है तथा उन्हीं दोनों राशियोंके योगान्तर घात (३+४)×(४-३)=७×१=७ यह दोनों राशियोंके वर्गान्तर १६-९=७ के बराबर है। (^२यह निशान वर्गका है।