सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग *
    ७५३

राजा बनाया। फिर सुग्रीवकी आज्ञासे सीताकी खोजके लिये सब ओर वानर गये। हनुमान् आदि वानर सीताको ढूँढ़ते हुए दक्षिण समुद्रके तटपर गये। वहाँ सम्पातिके कहनेसे उन्हें यह निश्चय हो गया कि सीताजी लंकामें हैं।

तदनन्तर अकेले हनुमान्‌जी समुद्रके दूसरे तटपर बसी हुई लंकापुरीमें गये और वहाँ रामप्रिया सती सीताको उन्होंने देखा तथा श्रीरामचन्द्रजीकी अँगूठी उन्हें देकर अपने प्रति उनके मनमें विश्वास उत्पन्न किया; फिर उन दोनों भाइयोंका कुशल-समाचार सुनाकर उनसे चूड़ामणि प्राप्त की। तदनन्तर अशोकवाटिकाको उजाड़कर सेनासहित अक्षकुमारको मारा और मेघनादके बन्धनमें आकर रावणसे वार्तालाप किया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण लंकापुरीको जलाकर पुनः मिथिलेश-नन्दिनी सीताका दर्शन किया और उनकी आज्ञा ले समुद्र लाँघकर श्रीरामचन्द्रजीसे उनका समाचार निवेदन किया।

सीता राक्षसराज रावणके निवासस्थानमें रहती हैं—यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी भी वानर-सेनाके साथ समुद्रके तटपर पहुँचे। फिर समुद्रकी ही अनुमति लेकर उन्होंने महासागरपर पर्वतीय शिलाखण्डोंसे पुल बाँधा और उसके द्वारा दूसरे तटपर पहुँचकर सेनाकी छावनी डाली। तदनन्तर अपने छोटे भाई विभीषणके समझानेपर भी रावणको यह बात नहीं रुची कि सीता अपने पतिको वापस दे दी जाय। रावणने विभीषणको लातसे मारा और विभीषण श्रीरामचन्द्रजीकी शरणमें गये। तब श्रीरामचन्द्रजीने लंकाको चारों ओरसे घेर लिया। तदनन्तर रावणने क्रमशः अपने मन्त्रियों, अमात्यों, पुत्रों और सेवकोंको युद्धके लिये भेजा; किंतु वे सब श्रीराम-लक्ष्मण तथा कपीश्वरोंद्वारा नष्ट कर दिये गये। लक्ष्मणने इन्द्रविजयी मेघनादको तीखे बाणोंसे मार डाला। इधर श्रीरामने भी कुम्भकर्ण तथा रावणको मौतके घाट उतार दिया। इसके बाद श्रीरामने अपनी प्रियतमा सीताकी अग्निपरीक्षा ली और विभीषणको राक्षसोंका आधिपत्य, लंका तथा एक कल्पकी आयु देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके सुग्रीव और

७५४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

विभीषणके साथ पुष्पक-विमानद्वारा अयोध्याको प्रस्थान किया। भरतजी नन्दिग्राममें रहते थे। उन्हें साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यामें गये। फिर चारों भाइयोंके अपनी सब माताओंको प्रणाम किया। तदनन्तर पुरोहित वसिष्ठकी आज्ञा लेकर भाइयोंने श्रीरामका राजाके पदपर अभिषेक किया। भगवान् श्रीराम भी प्रजाका औरस पुत्रकी भाँति पालन करने लगे। धर्मके ज्ञाता श्रीरामने लोकनिन्दासे सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञसभामें सीताके साथ महर्षि वाल्मीकिको बुलवाया। जगदम्बा सीताने वहाँ आकर अपने दोनों पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको सौंप दिये और स्वयं उन्होंने पृथ्वीके विवरमें प्रवेश किया। यह एक अद्भुत घटना हुई। तबसे श्रीरामचन्द्रजी केवल ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इस पृथ्वीपर यज्ञानुष्ठानमें ही लगे रहे।

तदनन्तर एक समय काल और दुर्वासा मुनि श्रीरामचन्द्रजीके पास आये। भद्रे! कालको ब्रह्माजीने भेजा था और वे श्रीरामसे वैकुण्ठ-धाममें पधारनेके लिये प्रार्थना करने आये थे। उन्होंने एकान्तमें आकर श्रीरामसे कहा— 'इस समय कोई भी डरकर सीतादेवीको त्याग दिया। गर्भवती सीता वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर जाकर सुखसे रहने लगीं। वहाँ उन्होंने दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे कुश और लव। महर्षि वाल्मीकिने उन दोनोंके जातकर्म आदि संस्कार शास्त्रोक्त विधिसे किये। उन उदारबुद्धि महर्षिने रामायण महाकाव्यकी रचना करके उन दोनों बालकोंको पढ़ाया। वे दोनों बालक मुनियोंके यज्ञोंमें रामायणगान करते थे। इसके कारण उनकी सर्वत्र ख्याति फैल गयी। एक समय श्रीरामचन्द्रजीका अश्वमेध-यज्ञ प्रारम्भ होनेपर वे दोनों भाई कुश और लव उस यज्ञमें गये। वहाँ उन दोनोंके मुँहसे अपने चरित्रका गान यहाँ न आवे। यदि कोई आये तो आप उसका वध कर डालें।' श्रीरामने ऐसा करनेकी प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात् रघुनाथजीने लक्ष्मणको बुलाकर कहा—'तुम यहाँ द्वारपर खड़े रहो। किसीको भीतर न आने देना। यदि कोई भीतर प्रवेश करेगा तो वह मेरा वध्य होगा।' तब लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाके पालनमें लग गये। इतनेहीमें महर्षि दुर्वासा राजद्वारपर लक्ष्मणके समीप आये। उन्हें आया देख लक्ष्मणने प्रणाम करके कहा—'भगवन् ! दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। इस समय श्रीरघुनाथजी मन्त्रणामें लगे हैं।' उन्होंने लक्ष्मणकी बात सुनकर उनसे क्रोधपूर्वक कहा—