संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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भृगुजीने कहा—मुने! जगत्का हित-साधन करनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने पहलेसे ही धर्मकी रक्षाके लिये चार आश्रमोंका उपदेश किया है। उनमेंसे गुरुकुलमें निवास ही पहला आश्रम बतलाया जाता है। इस आश्रममें शौच, संस्कार, नियम तथा व्रतके नियमपूर्वक पालनमें चित्त लगाकर दोनों संध्याओंके समय उपासना करनी चाहिये। सूर्यदेव तथा अग्निदेवका उपस्थान करे। आलस्य छोड़कर गुरुको प्रणाम करे। गुरुमुखसे वेदका श्रवण और अभ्यास करके अपने अन्तःकरणको पवित्र करे। तीनों समय स्नान करके ब्रह्मचर्यपालन, अग्निहोत्र तथा गुरु-शुश्रूषा करे। प्रतिदिन भिक्षा माँगे और भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, वह सब गुरुके अर्पित कर दे तथा अपने अन्तरात्माको भी गुरुके चरणोंमें अर्पित कर दे। गुरुके वचन और आज्ञाका पालन करनेमें कभी प्रतिकूलता न दिखाये—सदा आज्ञापालनके लिये तैयार रहे तथा गुरुकी कृपासे प्राप्त हुए वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहे। इस विषयमें यह उक्ति प्रसिद्ध है—जो द्विज गुरुकी आराधना करके वेदका ज्ञान प्राप्त करता है, उसे स्वर्गरूप फलकी उपलब्धि होती है और उसका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जाता है।
दूसरे आश्रमको गार्हस्थ्य कहते हैं। उसके सदाचारका जो स्वरूप है, उसकी पूर्णरूपसे व्याख्या करेंगे। जो गुरुकुलसे लौटे हुए सदाचारपरायण स्नातक हैं और धर्मानुष्ठानका फल चाहते हैं, उनके लिये गृहस्थ-आश्रमका विधान है। इसमें धर्म, अर्थ और काम—तीनोंकी प्राप्ति होती है। यहाँ त्रिवर्ग-साधनकी अपेक्षा रखकर निन्दित कर्मके परित्यागपूर्वक उत्तम (न्याययुक्त) कर्मसे धनोपार्जन करे। वेदोंके स्वाध्यायद्वारा, उपलब्ध हुई प्रतिष्ठासे अथवा ब्रह्मर्षिनिर्मित मार्गसे प्राप्त हुए धनके द्वारा या समुद्रसे उपलब्ध हुए द्रव्यद्वारा अथवा नियमोंके अभ्यास तथा देवताके कृपाप्रसादसे मिली हुई सम्पत्तिद्वारा गृहस्थ पुरुष अपनी गृहस्थी चलावे। गृहस्थ-आश्रमको सम्पूर्ण आश्रमोंका मूल कहते हैं। गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारी, संन्यासी तथा अन्य लोग जो संकलित व्रत, नियम एवं धर्मका अनुष्ठान करनेवाले हैं, उन सबका आधार गृहस्थ-आश्रम है। उनके अतिरिक्त भी गृहस्थ-आश्रममें भिक्षा और बलिवैश्व आदिका वितरण चलता रहता है। वानप्रस्थोंके लिये भी आवश्यक द्रव्य-सामग्री गृहस्थाश्रमसे ही प्राप्त होती है। प्रायः ये श्रेष्ठ पुरुष उत्तम पथ्य अन्नका सेवन करते हुए स्वाध्यायके प्रसङ्गसे अथवा तीर्थयात्राके लिये देश-दर्शनके निमित्त इस पृथ्वीपर घूमते रहते हैं। गृहस्थको उचित है कि उठकर उनकी अगवानी करे, उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये, उनसे ईर्ष्यारहित वचन बोले, उनके लिये आवश्यक वस्तुओंका दान करे, उन्हें सुख और सत्कारपूर्वक आसन दे तथा उनके लिये सुखसे सोने और खाने-पीनेकी सुव्यवस्था करे। इस विषयमें यह उक्ति है—जिसके घरसे अतिथि निराश होकर
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लौट जाता है, उसे वह अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है*। इसके सिवा, इस आश्रममें यज्ञ-कर्मोंद्वारा देवता तृप्त होते हैं, श्राद्ध एवं तर्पणसे पितरोंकी तृप्ति होती है, विद्याके बार-बार श्रवण और धारणसे ऋषि संतुष्ट होते हैं और संतानोत्पादनसे प्रजापतिको प्रसन्नता होती है। इस विषयमें हैं—इस आश्रममें सम्पूर्ण भूतोंके लिये वात्सल्यका भाव होता है। देवता और अतिथियोंका वाणीद्वारा स्तवन किया जाता है। इसमें दूसरोंको सताना, कष्ट देना या कठोरता करना निन्दित है। इसी तरह दूसरोंकी अवहेलना तथा अपनेमें अहंकार और दम्भका होना भी निन्दित ही माना गया है। अहिंसा, सत्य और अक्रोध—ये सभी आश्रमके लिये तप हैं। जिसके गृहस्थ-आश्रममें प्रतिदिन धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गका सम्पादन होता है, वह इस लोकमें सुखका अनुभव करके श्रेष्ठ पुरुषोंकी गतिको प्राप्त होता है। जो गृहस्थ उञ्छवृत्तिसे रहकर अपने धर्मके पालनमें तत्पर है और काम्यसुखको त्याग चुका है, उसके लिये स्वर्गलोक दुर्लभ नहीं है।
वानप्रस्थी भी धर्मका अनुष्ठान करते हुए पुण्य तीर्थों तथा नदियों और झरनोंके आसपास रहते हैं; वनोंमें रहकर तपस्या करते और घूमते हैं। ग्रामीण वस्त्र, भोजन और उपभोगका वे त्याग कर देते हैं। जंगली अन्न, फल, मूल और पत्तोंका परिमित एवं नियमित भोजन करते हैं। अपने स्थानपर ही बैठते हैं और पृथ्वी, पत्थर, सिकता, कंकड़ तथा बालूपर सो जाते हैं। काश, कुश, मृगचर्म तथा वल्कलसे ही अपने शरीरको ढकते हैं। केश, दाढ़ी, मूँछ, नख तथा लोम धारण किये रहते हैं। नियत समयपर स्नान करते और शुष्क बलिवैश्व एवं होमका शास्त्रोक्त समयपर अनुष्ठान करते हैं। समिधा, कुशा, पुष्प-संचय तथा सम्मार्जन आदि कार्योंमें ही विश्राम पाते हैं। सर्दी, गरमी तथा वायुके आघातसे उनके शरीरकी सारी त्वचाएँ फटी होती हैं। अनेक प्रकारके नियम और योगचर्याके अनुष्ठानसे उनके शरीरका मांस और रक्त सूख जाता है और वे अस्थि-चर्मावशिष्ट होकर धैर्यपूर्वक सत्त्वगुणके योगसे शरीर धारण करते हैं। जो ब्रह्मर्षियोंद्वारा विहित इस व्रतचर्याका नियमपूर्वक पालन करता है, वह अग्निकी भाँति सम्पूर्ण दोषोंको जला देता है और दुर्जय लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लेता है।
अब संन्यासियोंका आचार बतलाया जाता है। धन, स्त्री तथा राजोचित सामग्रियोंमें जो अपना स्नेह बना हुआ है, उस स्नेह-बन्धनको काटकर तथा अग्निहोत्र आदि कर्मोंका विधिपूर्वक त्याग करके विरक्त एवं जिज्ञासु पुरुष संन्यासी होते हैं। वे ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हैं। धर्म, अर्थ और काममयी प्रवृत्तियोंमें उनकी बुद्धि आसक्त नहीं होती। शत्रु, मित्र और उदासीनोंके प्रति उनकी दृष्टि समान रहती है। वे स्थावर, जरायुज, अण्डज और स्वेदज प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी द्रोह नहीं करते। उनका कोई एक निवासस्थान नहीं होता। वे पर्वत, नदी-तट, वृक्ष मूल तथा देवमन्दिर आदि स्थानोंमें ठहरते और विचरते हुए कभी किसी समूहके पास जाकर रहते हैं अथवा नगर या गाँवमें विश्राम करते हैं। क्रोध, दर्प, लोभ, मोह, कृपणता, दम्भ, निन्दा तथा अभिमानके कारण उनसे कभी हिंसा नहीं होती। इस विषयमें ऐसा कहा है—जो मुनि सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान
* अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते। स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥
(ना० पूर्व० ४३। ११३)
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| देकर स्वच्छन्द विचरता है, उसको कभी उन सब प्राणियोंसे भय नहीं होता*। ब्राह्मण संन्यासी अग्निहोत्रको अपने शरीरमें स्थापित करके शरीररूपी अग्निको तृप्त करनेके लिये भिक्षान्नरूपी हविष्यकी आहुति अपने मुखमें डालता है और उसी | शरीरसंचित अग्निद्वारा उत्तम लोकोंमें जाता है। अपने संकल्पके अनुसार बुद्धिको संयममें रखनेवाला जो पवित्र ब्राह्मण शास्त्रोक्तविधिसे संन्यास-आश्रममें विचरता है, वह ईंधनरहित अग्निकी भाँति परम शान्तिमय ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। |
उत्तम लोक, अध्यात्मतत्त्व तथा ध्यानयोगका वर्णन
| **भरद्वाजजी बोले—**महर्षे! इस लोकसे उत्तम एक लोक यानी प्रदेश सुना जाता है। मैं उस उत्तम लोकको जानना चाहता हूँ। आप उसके विषयमें बतलानेकी कृपा करें।<br><br>**भृगुजीने कहा—**उत्तरमें हिमालयके पास सर्वगुणसम्पन्न पुण्यमय प्रदेश है, जो पुण्यदायक, क्षेमकारक और कमनीय है। वही 'उत्तम लोक' कहा जाता है। वहाँके मनुष्य पापकर्मसे रहित, पवित्र, अत्यन्त निर्मल, लोभ-मोहसे शून्य तथा उपद्रवरहित हैं। वह प्रदेश स्वर्गके समान है। वहाँ सात्त्विक शुभ गुण बताये गये हैं। वहाँ समय आनेपर ही मृत्यु होती है (अकाल मृत्यु नहीं होती)। रोग वहाँके मनुष्योंका स्पर्श नहीं करता। वहाँ किसीके मनमें परायी स्त्रीके लिये लोभ नहीं होता। सब लोग अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखनेवाले हैं। उस देशमें धनके लिये दूसरोंका वध नहीं किया जाता। उस प्रदेशमें अधर्म अच्छा नहीं माना जाता। किसीको धर्मविषयक संदेह नहीं होता। वहाँ किये हुए कर्मका फल प्रत्यक्ष मिलता है। इस लोकमें तो किन्हींके पास जीवन-निर्वाहमात्रके लिये सब सामग्री उपलब्ध है और कोई-कोई बड़े परिश्रमसे जीविका चलाते हैं। यहाँ कुछ लोग धर्मपरायण हैं, कुछ लोग शठता करनेवाले हैं, कोई सुखी है, कोई दुःखी; कोई धनवान् है, कोई निर्धन। इस लोकमें | परिश्रम, भय, मोह और तीव्र क्षुधाका कष्ट प्राप्त होता है। मनुष्योंके मनमें धनके लिये लोभ रहता है, जिससे अज्ञानी पुरुष मोहित होते हैं। कपट, शठता, चोरी, परनिन्दा, दोषदृष्टि, दूसरोंपर चोट करना, हिंसा, चुगली तथा मिथ्याभाषण—इन दुर्गुणोंका जो सेवन करता है, उसकी तपस्या नष्ट होती है। जो विद्वान् इनका आचरण नहीं करता उसकी तपस्या बढ़ती है। इस लोकमें धर्म और अधर्म-सम्बन्धी कर्मके लिये नाना प्रकारकी चिन्ता करनी पड़ती है। लोकमें यह कर्मभूमि है। यहाँ शुभ और अशुभ कर्म करके मनुष्य शुभ कर्मोंका शुभ फल और अशुभ कर्मोंका अशुभ फल पाता है। पूर्वकालमें यहाँ प्रजापति ब्रह्मा, अन्यान्य देवता तथा महर्षियोंने यज्ञ और तपस्या करके पवित्र हो ब्रह्मलोक प्राप्त किया था। पृथ्वीका उत्तरीय भाग सबसे अधिक पवित्र और शुभ है। यहाँ जो पुण्य कर्म करनेवाले मनुष्य हैं, वे यदि सत्कार (शुभ फल) चाहते हैं तो पृथ्वीके उस भागमें जन्म पाते हैं। कुछ लोग कर्मानुसार पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें जन्म लेते हैं, दूसरे लोग क्षीणायु होकर यहीं भूतलपर नष्ट हो जाते हैं। जो एक-दूसरेको खा जानेके लिये उद्यत रहते हैं, ऐसे लोभ और मोहमें डूबे हुए मनुष्य यहीं चक्कर लगाते रहते हैं, उत्तर दिशाको नहीं जाते। जो गुरुजनोंकी सेवा करते और इन्द्रियसंयमपूर्वक |
* अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः। न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित्॥ (ना० पूर्व० ४३। १२५)
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ब्रह्मचर्यके पालनमें तत्पर होते हैं, वे मनीषी पुरुष सम्पूर्ण लोकोंका मार्ग जानते हैं। इस प्रकार मैंने ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो जगत्के धर्म और अधर्मको जानता है, वही बुद्धिमान् है।
भरद्वाजजीने कहा—तपोधन! पुरुषके शरीरमें अध्यात्म-नामसे जिस वस्तुका चिन्तन किया जाता है, वह अध्यात्म क्या है और कैसा है। यह मुझे बताइये।
भृगुजी बोले—ब्रह्मर्षे! जिस अध्यात्मके विषयमें पूछ रहे हो, उसकी व्याख्या करता हूँ। तात! वह अतिशय कल्याणकारी सुखस्वरूप है। अध्यात्मज्ञानका जो फल मिलता है—वह है सम्पूर्ण प्राणियोंका हित। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज—ये पाँच महाभूत हैं, जो सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और लयके स्थान हैं। जो भूत जिससे उत्पन्न होते हैं, वे फिर उसीमें लीन हो जाते हैं। जैसे समुद्रसे लहरें उठती हैं और फिर उसीमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ये महाभूत क्रमशः अपने-अपने कारणरूप अन्य भूतोंसे उत्पन्न होते और प्रलयकाल आनेपर फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं। जैसे कछुआ अपने अङ्गोंको फैलाकर फिर उन्हें समेट लेता है, उसी प्रकार भूतात्मा परमेश्वर अपने रचे हुए भूतोंको पुनः अपनेमें लीन करते हैं। महाभूत पाँच ही हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति करनेवाले परमात्माने समस्त प्राणियोंमें उन्हीं पाँचों भूतोंको भलीभाँति नियुक्त किया है, किंतु जीव उन परमात्माको नहीं देखता है।
शब्द, कान और शरीरके छिद्र—ये तीनों आकाशसे प्रकट हुए हैं। स्पर्श, चेष्टा और त्वचा—ये तीन वायुके कार्य हैं। रूप, नेत्र और पाक—इन तीन रूपोंमें तेजकी उपलब्धि कही जाती है। रस, क्लेद (गीलापन) और जिह्वा—ये तीन जलके गुण बताये गये हैं। गन्ध, नासिका और शरीर—ये तीन भूमिके कार्य हैं। इन्द्रियरूपमें पाँच ही महाभूत हैं और छठा मन है। इस प्रकार श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियोंका और मनका ही परिचय दिया गया है। बुद्धिको सातवाँ तत्त्व कहा गया है। क्षेत्रज्ञ आठवाँ है। कान सुननेके लिये और त्वचा स्पर्शका अनुभव करनेके लिये है। रसका आस्वादन करनेके लिये रसना (जिह्वा) और गन्ध ग्रहण करनेके लिये नासिका है। नेत्रका काम देखना है। मन संदेह करता है। बुद्धि निश्चय करनेके लिये है और क्षेत्रज्ञ साक्षीकी भाँति स्थित है। दोनों पैरोंसे ऊपर सिरतक—जो कुछ भी नीचे-ऊपर है, सबको वह क्षेत्रज्ञ ही देखता है। क्षेत्रज्ञ (आत्मा) व्यापक है। इसने इस सम्पूर्ण शरीरको बाहर-भीतरसे व्यास कर रखा है। पुरुष ज्ञाता है और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उसके लिये ज्ञेय हैं। तम, रज और सत्त्व—ये सारे भाव पुरुषके आश्रित हैं। जो मनुष्य इस अध्यात्मज्ञानको जान लेता है, वह भूतोंके आवागमनका विचार करके धीरे-धीरे उत्तम शान्ति पा लेता है। पुरुष जिससे देखता है, वह नेत्र है। जिससे सुनता है, उसे श्रोत्र (कान) कहते हैं। जिससे सूँघता है, उसका नाम प्राण (नासिका) है। वह जिह्वासे रसका अनुभव करता है और त्वचासे स्पर्शको जानता है। बुद्धि सदा ज्ञान या निश्चय कराती है। पुरुष जिससे कुछ इच्छा करता है, वह मन है। बुद्धि इन सबका अधिष्ठान है। अतः पाँच विषय और पाँच इन्द्रियाँ उससे पृथक् कही गयी हैं। इन सबका अधिष्ठाता चेतन क्षेत्रज्ञ इनसे नहीं देखा जाता।
प्रीति या प्रसन्नता सत्त्वगुणका कार्य है। शोक रजोगुण और क्रोध तमोगुण है। इस प्रकार ये तीन भाव हैं। लोकमें जो-जो भाव हैं, वे सब इन तीनों गुणोंमें आबद्ध हैं। सत्त्व, रज और तम—