संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \ ३२१
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३२१
अपने उच्च या मूल त्रिकोणमें हों तो बालक राजा होता है। सिंहमें सूर्य, मेष लग्नमें चन्द्रमा, मकरमें मङ्गल, कुम्भमें शनि और धनुमें बृहस्पति हो तो उत्पन्न शिशु भूपाल होता है। मुने! शुक्र अपनी राशिमें होकर चतुर्थ स्थानमें स्थित हों, चन्द्रमा नवम भावमें रहकर शुभ ग्रहसे दृष्ट या युक्त हों तथा शेष ग्रह ३, १, ११वें भावमें विद्यमान हों तो जातक इस वसुधाका अधीश्वर होता है। बुध सबल होकर लग्नमें स्थित हों, बलवान् शुभग्रह नवम भावमें स्थित हों तथा शेष ग्रह ९, ५, ३, ६, १० और ११वें भावमें हो तो उत्पन्न बालक धर्मात्मा नरेश होता है। चन्द्रमा, शनि और बृहस्पति क्रमशः दसवें, ग्यारहवें तथा लग्नमें स्थित हों, बुध और मङ्गल द्वितीय भावमें तथा शुक्र और रवि चतुर्थ भावमें स्थित हों तो जातक भूपाल होता है। वृष लग्नमें चन्द्रमा, द्वितीयमें गुरु, ११ वेंमें शनि तथा शेष ग्रह भी स्थित हों तो बालक नरेश होता है॥ १७९-१८३॥
चतुर्थ भावमें गुरु, १० वें भावमें रवि और चन्द्रमा, लग्नमें शनि और ११वें भावमें शेष ग्रह हों तो उत्पन्न शिशु राजा होता है। मङ्गल और शनि लग्नमें हों, चन्द्रमा, गुरु, शुक्र, रवि और बुध—ये क्रमसे ४, ७, ९, १० और ११ वेंमें हों तो ये सब ग्रह ऐसे बालकको जन्म देते हैं, जो भावी नरेश होता है। मुनीश्वर ! ऊपर कहे हुए योगोंमें उत्पन्न मनुष्यके दशम भाव या लग्नमें जो ग्रह हो, उसकी दशा-अन्तर्दशा आनेपर उसे राज्यकी प्राप्ति होती है। इन दोनों स्थानोंमें ग्रह न हो तो जन्म-समयमें जो ग्रह बलवान् हो, उसकी दशामें राज्यलाभ समझना चाहिये तथा जो ग्रह जन्म-समयमें शत्रु-राशि या अपनी नीच राशिमें हो, उसकी राशिमें क्लेश, पीड़ा आदिकी प्राप्ति होती है॥ १८४-१८५ १/२ ॥
(नाभस* योग-कथन—) समीपवर्ती दो केन्द्रस्थानोंमें ही (रविसे शनिपर्यन्त) सब ग्रह हों तो 'गदा' नामक योग होता है। केवल लग्न और सप्तम दो ही स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'शकट' योग होता है। दशम और चतुर्थमें ही सब ग्रहोंकी स्थिति हो तो 'विहग' (पक्षी) योग होता है। ५, ९ और लग्न—इन तीन ही स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'शृङ्गाटक' योग होता है। इसी प्रकार यदि लग्न भिन्न स्थानसे त्रिकोण स्थानोंमें ही सब ग्रह हों तो 'हल' नामक योग होता है॥१८६-१८७॥ लग्न और सप्तममें सब शुभ ग्रह हों अथवा चतुर्थ-दशममें सब पापग्रह हों तो दोनों स्थितियोंमें 'वज्र' योग होता है। इसके विपरीत यदि लग्न, सप्तममें सब पापग्रह अथवा चतुर्थ, दशममें सब शुभग्रह हों तो 'यव' योग होता है। यदि चारों केन्द्रोंमें सब (शुभ और पाप)-ग्रह मिलकर बैठे हों तो 'कमल' योग होता है और केन्द्रस्थानसे बाहर (चारों पणफर अथवा चारों आपोक्लिमस्थानोंमें) ही सब ग्रह स्थित हों तो 'वापी' नामक योग होता है॥१८८॥ लग्नसे लगातार ४ स्थान (१, २, ३, ४) में ही सब ग्रह मौजूद हों तो 'यूप' योग होता है। चतुर्थसे चार स्थान (४, ५, ६, ७)-में ही सब ग्रह स्थित हों तो 'शर' योग होता है। सप्तमसे ४ स्थान (७, ८, ९, १०)-में ही सब ग्रहोंकी स्थिति हो तो 'शक्ति' योग होता है और दशमसे ४ स्थान (१०, ११, १२, १)-में ही सब ग्रह मौजूद हों तो 'दण्ड' योग होता है॥ १८९॥ लग्नसे क्रमशः सात स्थानों (१, २, ३, ४, ५, ६, ७)-में सब ग्रह हों तो 'नौका' योग, चतुर्थ भावसे आरम्भ करके लगातार सात स्थानोंमें सातों ग्रह हों तो 'कूट' योग, सप्तम भावसे आरम्भ करके लगातार सात स्थानोंमें सातों ग्रह विद्यमान हों तो 'छत्र' योग और दशमसे आरम्भ
*नाभस योग अनेक होते हैं। इन योगोंमें राहु और केतुको छोड़कर केवल सूर्य आदि सात ग्रह ही लिये गये हैं।
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करके सात स्थानोंमें सब ग्रह स्थित हों तो 'चाप' नामक योग होता है। इसी प्रकार केन्द्रभिन्न स्थानसे आरम्भ करके लगातार सात स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'अर्धचन्द्र' नामक योग होता है॥ १९०॥
लग्नसे आरम्भ करके एक स्थानका अन्तर देकर क्रमशः (१, ३, ५, ७, ९ और ११ इन) ६ स्थानोंमें ही सब ग्रह स्थित हों तो 'चक्र' नामक योग होता है और द्वितीय भावसे लेकर एक स्थानका अन्तर देकर क्रमशः ६ स्थानों (२, ४, ६, ८, १०, १२)-में ही सब ग्रह मौजूद हों तो 'समुद्र' नामक योग होता है।
७ से १ स्थानतकमें सब ग्रहोंके रहनेपर क्रमशः वीणा आदि नामवाले ७ योग होते हैं। जैसे-७ स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'वीणा', ६ स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'दाम', ५ स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'पाश', ४ स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'क्षेत्र', ३ स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'शूल', २ स्थानोंमें सब ग्रह हों तो 'युग' और एक ही स्थानमें सब ग्रह हों तो 'गोल' नामक योग होता है। सब ग्रह चरराशिमें हों तो 'रज्जु', स्थिर राशिमें हों तो 'मुसल' और द्विस्वभावमें हों तो 'नल' नामक योग होता है। सब शुभग्रह केन्द्रस्थानोंमें हों तो 'माला' और सब पापग्रह केन्द्रस्थानोंमें हों तो 'सर्प' नामक योग होता है॥ १९१-१९३॥
(इन योगोंमें जन्म लेनेवालोंके फल—) रज्जुयोगमें जन्म लेनेवाला बालक ईर्ष्यावान् और राह चलने (यात्रा करने या घूमने-फिरने)-की इच्छावाला होता है। मुसलयोंगमें उत्पन्न शिशु धन और मानसे युक्त होता है। नलयोंगमें उत्पन्न पुरुष अङ्गहीन, स्थिरबुद्धि और धनी होता है। मालायोगमें पैदा हुआ मानव भोगी होता है तथा सर्पयोगमें उत्पन्न पुरुष दुःखसे पीड़ित होता है॥ १९४॥ वीणायोगमें जिसका जन्म हुआ हो, वह मनुष्य सब कार्योंमें निपुण तथा सङ्गीत और नृत्यमें रुचि रखनेवाला होता है। दामयोगमें उत्पन्न मनुष्य दाता और धनाढ्य होता है। पाशयोगमें उत्पन्न धनवान् और सुशील होता है। केदार (क्षेत्र)-योगमें पैदा हुआ खेतीसे जीविका चलानेवाला होता है तथा शूलयोगमें उत्पन्न पुरुष शूरवीर, शस्त्रसे आघात न पानेवाला और अधन (धनहीन) होता है। युगयोगमें जन्म लेनेवाला पाखण्डी तथा गोलयोगमें उत्पन्न मनुष्य मलिन और निर्धन होता है॥ १९५-१९६॥
चक्रयोगमें जन्म लेनेवाले पुरुषके चरणोंमें राजा लोग भी मस्तक झुकाते हैं। समुद्रयोगमें उत्पन्न पुरुष राजोचित भोगोंसे सम्पन्न होता है। अर्धचन्द्रमें पैदा हुआ बालक सुन्दर शरीरवाला तथा चापयोगमें उत्पन्न शिशु सुखी और शूरवीर होता है॥ १९७॥ छत्रयोगमें उत्पन्न मनुष्य मित्रोंका उपकार करनेवाला तथा कूटयोगमें उत्पन्न मिथ्याभाषी और जेलका मालिक होता है। नौकायोगमें उत्पन्न पुरुष निश्चय ही यशस्वी और सुखी होता है। यूपयोगमें जन्म लेनेवाला मनुष्य दानी, यज्ञ करनेवाला और आत्मवान् (मनस्वी और जितात्मा) होता है। शरयोगमें उत्पन्न मनुष्य दूसरोंको कष्ट देनेवाला और गोपनीय स्थानोंका स्वामी होता है। शक्तियोगमें उत्पन्न नीच, आलसी और निर्धन होता है तथा दण्डयोगमें उत्पन्न पुरुष अपने प्रियजनोंसे वियोगका कष्ट भोगता है॥ १९८-१९९॥
(चन्द्रयोगका कथन—) यदि चन्द्रमासे द्वितीयमें सूर्यको छोड़कर कोई भी अन्य ग्रह हो तो 'सुनफा' योग होता है। द्वादशमें हो तो 'अनफा' और दोनों (२,१२) स्थानोंमें ग्रह हों तो 'दुरुधरा' योग समझना चाहिये, अन्यथा (अर्थात् २, १२ में कोई ग्रह नहीं हों तो) 'केमद्रुम' योग होता है॥ २००॥
(उक्त योगोंका फल—) 'सुनफा'योगमें जन्म लेनेवाला पुरुष अपने भुजबलसे उपार्जित धनका भोगी, दाता, धनवान् और सुखी होता है। 'अनफा' योगमें उत्पन्न मनुष्य रोगहीन, सुशील, विख्यात और सुन्दर रूपवाला होता है। 'दुरुधरा'