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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-तृतीय पाद ४७५

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४७५

द्वादशकलान्यास सूर्यमण्डल, षोडशकलान्यास
चन्द्रमण्डल तथा दशकलाव्यास अग्निमण्डलका न्यास
करे। साथ ही मन्त्रके पदोंमें स्थित आठ, आठ
और दो अक्षरोंका भी क्रमशः उन मण्डलोंके
साथ योग करके उन सबका हृदयमें न्यास करे
(यथा—क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय अं द्वादशकला-
व्याससूर्यमण्डलात्मने नमः, गोपीजनवल्लभाय ॐ
षोडशकलान्यासचन्द्रमण्डलात्मने नमः स्वाहा,
मं दशकलाव्यासवह्निमण्डलात्मने नमः—
हृत्पुण्डरीके)। तत्पश्चात् आकाशादिके स्थलोंमें अर्थात्
मूर्द्धा, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरणोंमें क्रमशः
वासुदेव आदिका न्यास करे। वासुदेव, सङ्कर्षण,
प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण—ये वासुदेव आदि
कहलाते हैं। ये क्रमशः परमेष्ठी आदिसे युक्त हैं।
परमेष्ठि पुरुष, शौच, विश्व, निवृत्ति तथा सर्व—
ये परमेष्ठ्यादि कहे गये हैं। परमेष्ठि पुरुष आदि
क्रमशः श्वेतवर्ण, अनिलवर्ण, अग्निवर्ण, अम्बुवर्ण
तथा भूमिवर्णके हैं। इन सबका पूर्ववत् न्यास करे
(यथा— श्वेतवर्णपरमेष्ठिपुरुषात्मने वासुदेवाय
नमः मूर्द्धनि। अनिलवर्णशौचात्मने सङ्कर्षणाय नमः
मुखे। अग्निवर्णविश्वात्मने प्रद्युम्नाय नमः हृदये।
अम्बुवर्णनिवृत्त्यात्मनेऽनिरुद्धाय नमः गुह्ये।
भूमिवर्णसर्वात्मने नारायणाय नमः पादयोः।) ॐ
क्षाँ कोपतत्त्वात्मने नृसिंहाय नमः इति सर्वाङ्गे।
इस प्रकार सम्पूर्ण अङ्गमें न्यास करे। यह तत्त्व-
न्यास कहा गया है। इसी प्रकार श्रेष्ठ साधकोंको
यह जानना चाहिये कि वासुदेव आदि नामोंका
'ङे' विभक्त्यन्त रूप ही न्यासमें ग्राह्य है। तदनन्तर
मन्त्रज्ञ पुरुष मूलमन्त्रको चार बार पढ़कर पूरक,
छः बार पढ़कर कुम्भक और दो बार पढ़कर
रेचक करते हुए प्राणायाम सम्पन्न करे। कुछ
आचार्योंका यहाँ यह कथन है कि प्राणायामके
पश्चात् पीठन्यास करके दूसरे न्यासोंका अनुष्ठान
करे। आगे बतायी जानेवाली विधिके अनुसार
दशतत्त्वादि न्यास करके विद्वान् पुरुष मूर्तिपञ्जर
नामक न्यास करे। फिर किरीटमन्त्रद्वारा बुद्धिमान्
साधक सर्वाङ्गमें व्यापक न्यास करके प्रणवसम्पुटित
मन्त्रको तीन बार दोनों हाथोंकी पाँचों अंगुलियोंमें
न्यास (विन्यस्त) करे। उसके बाद तीन बार
पञ्चाङ्ग-न्यास करे। तदनन्तर मूलमन्त्रको पढ़कर
सिरसे लेकर पैरतक व्यापक-न्यास करे। फिर
केवल प्रणवद्वारा एक बार व्यापक-न्यास करके
मन्त्र-न्यास करे। इसके बाद पुनः नेत्र, मुख,
हृदय, गुह्य और चरणद्वय—इनमें क्रमशः मन्त्रके
पाँच पदोंका अन्तमें 'नमः' लगाकर न्यास करे
(यथा—क्लीं नमः नेत्रद्वये। कृष्णाय नमः मुखे।
गोविन्दाय नमः हृदये। गोपीजनवल्लभाय नमः
गुह्ये। स्वाहा नमः पादयोः)। पुनः ऋषि आदि
न्यास करके पूर्वोक्त पञ्चाङ्ग-न्यास करे।

अब मैं सब न्यासोंमें उत्तमोत्तम परमगुह्य
न्यासका वर्णन करता हूँ, जिसके विज्ञानमात्रसे
मनुष्य जीवन्मुक्त तथा अणिमा आदि आठों
सिद्धियोंका अधीश्वर हो जाता है, जिसकी आराधनासे
मन्त्रोपासक श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त कर लेता
है। प्रणवादि व्याहृतियोंसे सम्पुटित मन्त्रका और
मन्त्रसे सम्पुटित प्रणवादिका तथा गायत्रीसे
सम्पुटित मन्त्रका और मन्त्रसे सम्पुटित गायत्रीका
मातृकास्थलमें न्यास करे। मातृका-सम्पुटित मूलका
और मूलसे सम्पुटित मातृका वर्णोंका श्रेष्ठ साधक
क्रमशः न्यास करे। विद्वान् पुरुष पहले मातृका
वर्णोंका नियतस्थलमें न्यास कर ले। उसके बाद
पूर्वोक्त न्यास करने चाहिये। इस तरह उपर्युक्त
छः प्रकारके न्यास करे। यह षोढान्यास कहा
गया है। इस श्रेष्ठ न्यासके अनुष्ठानसे साधक
साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके समान हो जाता है।
न्याससे सम्पुटित पुरुषको देखकर सिद्ध, गन्धर्व,
किन्नर और देवता भी उसे नमस्कार करते हैं।
फिर इस भूतलपर मनुष्योंके लिये तो कहना ही
क्या है? तत्पश्चात् 'ॐ नमः सुदर्शनाय अस्त्राय
फट्' इस मन्त्रसे दिग्बन्ध करे। इसके बाद अपने

४७६* संक्षिप्त नारदपुराण *

हृदयमें सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाले इष्टदेवका इस प्रकार ध्यान करे—

उत्फुल्लकुसुमव्रातप्रशाखैर्वरद्रुमैः ।
सस्मेरमञ्जरीवृन्दबल्लरीवेष्टितैः शुभैः ॥
गलत्परागधूलीभिः सुरभीकृतदिङ्मुखैः ।
स्मरेच्छिशिरितं वृन्दावनं मन्त्री समाहितः ॥
उन्मीलन्नवकञ्जालि विगलन्मधुसञ्चयैः ।
लुब्धान्तःकरणैर्गूञ्जद्द्विरेफपटलैः शुभम् ॥
मरालपरभृत्कीरकपोतनिकरैर्मुहुः ।
मुखरीकृतमानृत्यन्मयूरकुलमञ्जुलम् ॥
कालिन्द्या लोलकल्लोलविप्रुषैर्मन्दवाहिभिः ।
उत्तनिद्राम्बुरुहव्रातरजोभिर्धूसरैः शिवैः ॥
प्रदीपतस्मेरैर्गोष्ठसुन्दरीमृदुवाससाम् ।
विलोलनपरैः संसेवितं वा तैर्निरन्तरम् ॥
स्मरेत्तदन्ते गीर्वाणभूरुहं सुमनोहरम् ।
तदधः स्वर्णवेद्यां च रत्नपीठमनुत्तमम् ॥
रत्नकुट्टिमपीठेऽस्मिन्नरुणं कमलं स्मरेत् ।
अष्टपत्रं च तन्मध्ये मुकुन्दं संस्मरेत्स्थितम् ॥
फुल्लेन्दीवरकान्तं च केकिबर्हावतंसकम् ।
पीतांशुकं चन्द्रमुखं सरसीरुहनेत्रकम् ॥
कौस्तुभोद्भासिताङ्गं च श्रीवत्साङ्कं सुभूषितम् ।
व्रजस्त्रीनेत्रकमलाभ्यर्चितं गोगणावृतम् ॥
गोपवृन्दयुतं वंशीं वादयन्तं स्मरेत्सुधीः । (४०-५०)

'मन्त्रोपासक एकाग्रचित्त होकर श्रीवृन्दावनका चिन्तन करे, जो शुभ एवं सुन्दर हरे-भरे वृक्षोंसे परिपूर्ण तथा शीतल है। उन वृक्षोंकी शाखाएँ खिले हुए कुसुम-समूहोंके भारसे झुकी हुई हैं। उनपर प्रफुल्ल मञ्जरियोंसे युक्त विकसित लतावल्लरियाँ फैली हुई हैं। वे वृक्ष झड़ते हुए पुष्पपरागरूप धूलिकणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको सुवासित करते रहते हैं, वहाँ खिलते हुए नूतन कमल-वनोंसे निकलती मधुधाराओंके संचयसे लुभाये अन्तःकरणवाले भ्रमरोंका समुदाय मनोहर गुञ्जार करता रहता है। हंस, कोकिल, शुक और पारावत आदि पक्षियोंका समूह बारम्बार कलरव करते हुए वृन्दावनको कोलाहलपूर्ण किये रहता है। चारों ओर नृत्य करते मोरोंके झुंडसे वह वन अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है। कालिन्दीकी चञ्चल लहरोंसे नीर-विन्दुओंको लेकर मन्द-मन्द गतिसे प्रवाहित होनेवाली शीतल सुखद वायु प्रफुल्ल पङ्कजोंके पराग-पुञ्जसे धूसर हो रही है। व्रजसुन्दरियोंके मृदुल वसनाञ्चलोंको वह चञ्चल किये देती है और इस प्रकार मनमें प्रेमोन्मादका उद्दीपन करती हुई वह मन्द वायु वृन्दावनका निरन्तर सेवन करती रहती है। उस वनके भीतर एक अत्यन्त मनोहर कल्पवृक्षका चिन्तन करे, जिसके नीचे सुवर्णमयी वेदीपर परम उत्तम रत्नमय पीठ शोभा पाता है। वहाँकी प्राङ्गण-भूमि भी रत्नोंसे आबद्ध है। उस रत्नमय पीठपर लाल रंगके अष्टदलकमलकी भावना करे, जिसके मध्यभागमें श्रीमुकुन्द विराजमान हैं। उनके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करे—उनकी अङ्ग-कान्ति विकसित नील कमलके समान श्याम है। वे मोर-पङ्खका मुकुट पहने हुए हैं, कटिभागमें पीताम्बर शोभा पा रहा है। उनका मुख चन्द्रमाको लज्जित कर रहा है, नेत्र खिले हुए कमलोंकी शोभा छीने लेते हैं, उनका सम्पूर्ण अङ्ग कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हो रहा है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित है। वे परम सुन्दर दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं, व्रजसुन्दरियाँ मानो अपने नेत्रकमलोंके उपहारसे उनकी पूजा करती हैं, गौएँ उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी हैं। गोपवृन्द उनके साथ हैं और वे वंशी बजा रहे हैं। विद्वान् पुरुष भगवान्‌का चिन्तन करे।'

बुद्धिमान् साधक इस तरह ध्यान करके पहले बीस हजार मन्त्र-जप करे। फिर एकाग्रचित्त हो अरुण कमल-कुसुमोंकी दशांश आहुति दे। तत्पश्चात् समाहित होकर मन्त्र-सिद्धिके लिये पाँच लाख जप करे। लाल कमलोंकी आहुति देकर साधक