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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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कहते हैं। अधरोत्तरभेदसे सप्तस्वरात्मक सामके भी पूर्वोक्त तीन ही स्थान हैं। उरोभाग, कण्ठ तथा सिर—ये सातों स्वरोंके विचरण-स्थान हैं। किंतु उरःस्थलमें मन्द्र और अतिस्वारकी ठीक अभिव्यक्ति न होनेसे उसे सातों स्वरोंका विचरण-स्थल नहीं कहा जा सकता; तथापि अध्ययनाध्यापनके लिये वैसा विधान किया गया है। (ठीक अभिव्यक्ति न होनेपर भी उपांशु या मानस प्रयोगमें वर्ण तथा स्वरका सूक्ष्म उच्चारण तो होता ही है।) कठ, कलाप, तैत्तिरीय तथा आह्वरक शाखाओंमें और ऋग्वेद तथा सामवेदमें प्रथम स्वरका उच्चारण करना चाहिये। ऋग्वेदकी प्रवृत्ति दूसरे और तीसरे स्वरके द्वारा होती है। लौकिक व्यवहारमें उच्च और मध्यमका संघात-स्वर होता है। आह्वरक शाखावाले तृतीय तथा प्रथममें उच्चारित स्वरोंका प्रयोग करते हैं। तैत्तिरीय शाखावाले द्वितीयसे लेकर पञ्चमतक चार स्वरोंका उच्चारण करते हैं। सामगान करनेवाले विद्वान् प्रथम (षड्ज), द्वितीय (ऋषभ), तृतीय (गान्धार), चतुर्थ (मध्यम), मन्द्र (पञ्चम), क्रुष्ट (धैवत) तथा अतिस्वार (निषाद)—इन सातों स्वरोंका प्रयोग करते हैं। द्वितीय और प्रथम—ये ताण्डी (ताण्ड्यपञ्चविंशादि ब्राह्मणके अध्येता कौथुम आदि शाखावाले) तथा भाल्लवी (छन्दोग शाखावाले) विद्वानोंके स्वर हैं तथा शतपथ ब्राह्मणमें आये हुए ये दोनों स्वर वाजसनेयी शाखावालोंके द्वारा भी प्रयुक्त होते हैं। ये सब वेदोंमें प्रयुक्त होनेवाले स्वर विशेषरूपसे बताये गये हैं। इस प्रकार सार्ववैदिक स्वर-संचार कहा गया है।

अब मैं सामवेदके स्वर-संचारका वर्णन करूँगा। अर्थात् छन्दोग विद्वान् सामगानमें तथा ऋक्पाठमें जिन स्वरोंका उपयोग करते हैं, उनका यहाँ विशेषरूपसे निरूपण किया जाता है। यहाँ श्लोक थोड़े होंगे; किंतु उनमें अर्थ-विस्तार अधिक होगा। यह उत्तम वेदाङ्गका विषय सावधानीसे श्रवण करनेयोग्य है। नारद! मैंने तुम्हें पहले भी कभी तान, राग, स्वर, ग्राम तथा मूर्च्छनाओंका लक्षण बताया है, जो परम पवित्र, पावन तथा पुण्यमय है। द्विजातियोंको ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके स्वरूपका परिचय कराना—इसे ही शिक्षा कहते हैं। सात स्वर, तीन ग्राम, इक्कीस मूर्च्छना और उनचास तान—इन सबको स्वर-मण्डल कहा गया है। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत तथा सातवाँ निषाद—ये सात स्वर हैं। षड्ज, मध्यम और गान्धार—ये तीन ग्राम कहे गये हैं। भूर्लोकसे षड्ज उत्पन्न होता है, भुवर्लोकसे मध्यम प्रकट होता है तथा स्वर्ग एवं मेघलोकसे गान्धारका प्राकट्य होता है। ये तीन ही ग्राम-स्थान हैं। स्वरोंके राग-विशेषसे ग्रामोंके विविध राग कहे गये हैं। साम-गान करनेवाले विद्वान् मध्यम-ग्राममें बीस, षड्जग्राममें चौदह तथा गान्धारग्राममें पंद्रह तान स्वीकार करते हैं। नन्दी, विशाला, सुमुखी, चित्रा, चित्रवती, सुखा तथा बला—ये देवताओंकी सात मूर्च्छनाएँ जाननी चाहिये। आप्यायिनी, विश्वभृता, चन्द्रा, हेमा, कपर्दिनी, मैत्री तथा बार्हती—ये पितरोंकी सात मूर्च्छनाएँ हैं। षड्जस्वरमें उत्तर मन्द्रा, ऋषभमें अभिरूढता (या अभिरुद्रता) तथा गान्धारमें अश्वक्रान्ता नामवाली तीसरी मूर्च्छना मानी गयी है। मध्यमस्वरमें सौवीरा, पञ्चममें हृषिका तथा धैवतमें उत्तरायता नामकी मूर्च्छना जाननी चाहिये। निषादस्वरमें रजनी नामक मूर्च्छनाको जाने। ये ऋषियोंकी सात मूर्च्छनाएँ हैं। गन्धर्वगण देवताओंकी सात मूर्च्छनाओंका आश्रय लेते हैं। यक्षलोग पितरोंकी सात मूर्च्छनाएँ अपनाते हैं, इसमें संशय नहीं है। ऋषियोंकी जो सात मूर्च्छनाएँ हैं, उन्हें

२०४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

लौकिक कहा गया है—उनका अनुसरण मनुष्य करते हैं। षड्जस्वर देवताओंको और ऋषभस्वर ऋषि-मुनियोंको तृप्त करता है। गान्धारस्वर पितरोंको, मध्यमस्वर गन्धर्वोंको तथा पञ्चमस्वर देवताओं, पितरों एवं महर्षियोंको भी संतुष्ट करता है। निषादस्वर यक्षोंको तथा धैवत सम्पूर्ण भूत-समुदायको तृप्त करता है। गानकी गुणवृत्ति दस प्रकारकी है अर्थात् लौकिक-वैदिक गान दस गुणोंसे युक्त हैं। रक्त, पूर्ण, अलंकृत, प्रसन्न, व्यक्त, विक्रुष्ट, श्लक्ष्ण, सम, सुकुमार तथा मधुर—ये ही वे दसों गुण हैं। वेणु, वीणा तथा पुरुषके स्वर जहाँ एकमें मिलकर अभिन्न-से प्रतीत होते हैं और उससे जो रञ्जन होता है, उसका नाम 'रक्त' है। स्वर तथा श्रुतिकी पूर्ति करनेसे तथा छन्द एवं पादाक्षरोंके संयोग (स्पष्ट उच्चारण)-से जो गुण प्रकट होता है, उसे 'पूर्ण' कहते हैं। कण्ठ अर्थात् प्रथम स्थानमें जो स्वर स्थित है, उसे नीचे करके हृदयमें स्थापित करना और ऊँचे करके सिरमें ले जाना—यह 'अलंकृत' कहलाता है। जिसमें कण्ठका गद्गदभाव निकल गया है और किसी प्रकारकी शङ्का नहीं रह गयी है, वह 'प्रसन्न' नामक गुण है। जिसमें पद, पदार्थ, प्रकृति, विकार, आगम, लोप, कृदन्त, तद्धित, समास, धातु, निपात, उपसर्ग, स्वर, लिङ्ग, वृत्ति, वार्तिक, विभक्त्यर्थ तथा एकवचन, बहुवचन आदिका भलीभाँति उपपादन हो, उसे 'व्यक्त' कहते हैं। जिसके पद और अक्षर स्पष्ट हों तथा जो उच्च स्वरसे बोला गया हो, उसका नाम 'विक्रुष्ट' है। द्रुत (जल्दबाजी) और विलम्बित— दोनों दोषोंसे रहित, उच्च, नीच, प्लुत, समाहार, हेल, ताल और उपनय आदि उपपत्तियोंसे युक्त गीतको 'श्लक्ष्ण' कहते हैं। स्वरोंके अवाप-निर्वाप (चढ़ाव-उतार)-के जो प्रदेश हैं, उनका व्यवहित स्थानोंमें जो समावेश होता है, उसीका नाम 'सम' है। पद, वर्ण, स्वर तथा कुहरण (अव्यक्त अक्षरोंको कण्ठ दबाकर बोलना)—ये सभी जिसमें मृदु-कोमल हों, उस गीतको 'सुकुमार' कहा गया है। स्वभावसे ही मुखसे निकले हुए ललित पद एवं अक्षरोंके गुणसे सम्पन्न गीत 'मधुर' कहलाता है। इस प्रकार गान इन दस गुणोंसे युक्त होता है।

इसके विपरीत गीतके दोष बताये जाते हैं—इस विषयमें ये श्लोक कहे गये हैं। शङ्कित, भीषण, भीत, उद्घुष्ट, अनुनासिक, काकस्वर, मूर्धगत (अत्यन्त उच्च स्वरसे सिरतक चढ़ाया हुआ अपूर्णगान), स्थान-विवर्जित, विस्वर, विरस, विश्लिष्ट, विषमाहत, व्याकुल तथा तालहीन—ये चौदह गीतके दोष हैं। आचार्यलोग समगानकी इच्छा करते हैं। पण्डितलोग पदच्छेद (प्रत्येक पदका विभाग) चाहते हैं। स्त्रियाँ मधुर गीतकी अभिलाषा करती हैं और दूसरे लोग विक्रुष्ट (पद और अक्षरके विभागपूर्वक उच्च स्वरसे उच्चारित) गीत सुनना चाहते हैं। षड्जस्वरका रंग कमलपत्रके समान हरा है। ऋषभस्वर तोतेके समान कुछ पीलापन लिये हरे रंगका है। गान्धार सुवर्णके समान कान्तिवाला है। मध्यमस्वर कुन्दके सदृश श्वेतवर्णका है। पञ्चमस्वरका रंग श्याम है। धैवतको पीले रंगका माना गया है। निषादस्वरमें सभी रंग मिले हुए हैं। इस प्रकार ये स्वरोंके वर्ण कहे गये हैं। पञ्चम, मध्यम और षड्ज—ये तीनों स्वर ब्राह्मण माने गये हैं। ऋषभ और धैवत—ये दोनों ही क्षत्रिय हैं। गान्धार तथा निषाद—ये दोनों स्वर आधे वैश्य कहे गये हैं और पतित होनेके कारण ये आधे शूद्र हैं। इसमें संशय नहीं है। जहाँ ऋषभके अनन्तर प्रकट हुए षड्जके साथ धैवतसहित पञ्चमस्वर मध्यमरागमें प्राप्त होता है, उस निषादसहित