संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-प्रथम पाद \ ५५
* पूर्वभाग-प्रथम पाद * ५५
| प्रति नपुंसक होते हैं, वे भी सदा मुझे अपने भीतर धारण करते हैं*। जो तुलसीकी उपासनामें लगे हैं, सदा भगवन्नामके जपमें तत्पर हैं और गौओंकी रक्षामें संलग्न रहते हैं, वे सदा मुझे हृदयमें धारण करते हैं। जो दान नहीं लेते, पराये अन्नका सेवन नहीं करते और स्वयं दूसरोंको अन्न और जलका दान देते हैं, वे भी सदा मुझे धारण करते हैं। देवि! तुम तो सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर पतिप्राणा साध्वी स्त्री हो, अतः मैं तुम्हारा पुत्र होकर तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा।<br><br>देवमाता अदितिसे ऐसा कहकर देवदेवेश्वर<br><br>भगवान् विष्णुने अपने कण्ठकी माला उतारकर उन्हें दे दी और अभयदान देकर वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर दक्षकुमारी देवमाता अदिति प्रसन्नचित्तसे भगवान् कमलाकान्तको पुनः प्रणाम करके अपने स्थानपर लौट आयीं। फिर समय आनेपर विश्ववन्दित महाभागा अदितिने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक सर्वलोकनमस्कृत पुत्रको | जन्म दिया। वह बालक चन्द्रमण्डलके मध्य विराजमान और परम शान्त था। उसने एक हाथमें शङ्ख और दूसरेमें चक्र ले रखा था। तीसरे हाथमें अमृतका कलश और चौथेमें दधिमिश्रित अन्न था। यह भगवान्का सुप्रसिद्ध वामन अवतार था। भगवान् वामनकी कान्ति सहस्रों सूर्योंके समान उज्ज्वल थी। उनके नेत्र खिले हुए कमलके समान शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरधारी श्रीहरि सब प्रकारके दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे। सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र नायक, स्तोत्रोंद्वारा स्तवन करने योग्य तथा ऋषि-मुनियोंके ध्येय भगवान् विष्णुको प्रकट हुए जानकर महर्षि कश्यप हर्षसे विह्वल हो गये। उन्होंने भगवान्को प्रणाम करके हाथ जोड़कर इस प्रकार स्तुति करना आरम्भ किया।<br><br>कश्यपजी बोले— सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टिके कारणभूत ! आप परमात्माको नमस्कार है, नमस्कार है। समस्त जगत्का पालन करनेवाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओंके स्वामी ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। दैत्योंका नाश करनेवाले देव ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। भक्तजनोंके प्रियतम ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। साधु पुरुष आपको अपनी चेष्टाओंसे प्रसन्न करते हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। दुष्टोंका नाश करनेवाले भगवान्को नमस्कार है, नमस्कार है। उन जगदीश्वरको नमस्कार है, नमस्कार है। कारणवश वामनस्वरूप धारण करनेवाले अमित पराक्रमी भगवान् नारायणको नमस्कार है, नमस्कार है। धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमको नमस्कार है। क्षीरसागरमें निवास करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। साधु-पुरुषोंके हृदयकमलमें विराजमान |
* परोपकारनिरताः परद्रव्यपराङ्मुखाः । नपुंसकाः परस्त्रीषु ते वहन्ति च मां सदा ॥
(ना० पूर्व० १२।६२)
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* संक्षिप्त नारदपुराण *
परमात्माको नमस्कार है। जिनकी अनन्त प्रभाकी सूर्य आदिसे तुलना नहीं की जा सकती, जो पुण्यकथामें आते और स्थित रहते हैं, उन भगवान्को नमस्कार है, नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप यज्ञोंका फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप यज्ञके सम्पूर्ण अङ्गोंमें विराजित होते हैं, आपको नमस्कार है। साधु पुरुषोंके प्रियतम ! आपको नमस्कार है। जगत्के कारणोंके भी कारण आपको नमस्कार है। प्राकृत शब्द, रूप आदिसे रहित आप परमेश्वरको नमस्कार है। दिव्य सुख प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंके हृदयमें वास करनेवाले आपको नमस्कार है। मत्स्यरूप धारण करके अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। कच्छपरूपसे मन्दराचल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। यज्ञवराह-नामधारी आपको नमस्कार है। हिरण्याक्षको विदीर्ण करनेवाले आपको नमस्कार है। वामन-रूपधारी आपको नमस्कार है। क्षत्रिय-कुलका संहार करनेवाले परशुरामरूपधारी आपको नमस्कार है। रावणका संहार करनेवाले श्रीराम-रूपधारी आपको नमस्कार है। नन्दसुत बलराम जिनके ज्येष्ठ भ्राता हैं, उन श्रीकृष्णावतारधारी आपको नमस्कार है। कमलाकान्त ! आपको नमस्कार है। आप सबको सुख देनेवाले तथा स्मरणमात्र करनेपर सबकी पीड़ाओंका नाश करनेवाले हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। यज्ञेश ! यज्ञस्थापक ! यज्ञविघ्न-विनाशक ! यज्ञरूप ! और यजमानरूप परमेश्वर ! आप ही यज्ञके सम्पूर्ण अङ्ग हैं। मैं आपका यजन करता हूँ।
कश्यपजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले देवेश्वर वामन हँसकर कश्यपजीका हर्ष बढ़ाते हुए बोले।
श्रीभगवान्ने कहा— तात! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। देवपूजित महर्षे ? थोड़े ही दिनोंमें तुम्हारा सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करूँगा। मैं पहले भी दो जन्मोंमें तुम्हारा पुत्र हुआ हूँ तथा अब इस जन्ममें भी तुम्हारा पुत्र होकर तुम्हें उत्तम सुखकी प्राप्ति कराऊँगा।
इधर दैत्यराज बलिने भी अपने गुरु शुक्राचार्य तथा अन्य मुनीश्वरोंके साथ दीर्घकालतक चलनेवाला बहुत बड़ा यज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञमें ब्रह्मवादी महर्षियोंने हविष्य ग्रहण करनेके लिये लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका आवाहन किया। जिसका ऐश्वर्य बहुत बढ़ा-चढ़ा था, उस दैत्यराज बलिके महायज्ञमें माता-पिताकी आज्ञा ले ब्रह्मचारी वामनजी भी गये। वे अपनी मन्द मुसकानसे सब लोगोंका मन मोहे लेते थे। भक्तवत्सल वामनके रूपमें भगवान् विष्णु मानो बलिके हविष्यका प्रत्यक्ष भोग लगानेके लिये आये थे। दुराचारी हो या सदाचारी, मूर्ख हो या पण्डित, जो भक्तिभावसे युक्त है, उसके अन्तःकरणमें भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। वामनजीको आते देख ज्ञानदृष्टिवाले महर्षिगण उन्हें साक्षात् भगवान् नारायण जानकर सभासदोंसहित उनकी अगवानीमें गये। यह जानकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य एकान्तमें बलिको कुछ सलाह देने लगे।
शुक्राचार्य बोले— दैत्यराज ! सौम्य ! तुम्हारी राजलक्ष्मीका अपहरण करनेके लिये भगवान् विष्णु वामनरूपसे अदितिके पुत्र हुए हैं। वे तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं। असुरेश्वर ! तुम उन्हें कुछ न देना। तुम तो स्वयं विद्वान् हो। इस समय मेरा जो मत है, उसे सुनो। अपनी बुद्धि ही सुख देनेवाली होती है। गुरुकी बुद्धि विशेषरूपसे सुखद होती है। दूसरेकी बुद्धि विनाशका कारण होती है और स्त्रीकी बुद्धि तो प्रलय करनेवाली होती है।
बलिने कहा— गुरुदेव ! आपको इस प्रकार