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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

मोहिनीका सब तीर्थोंमें घूमकर यमुनामें प्रवेशपूर्वक दशमीके अन्तभागमें स्थित होना तथा नारदपुराणके पाठ एवं श्रवणकी महिमा

  • उत्तरभाग * | ७६५
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श्रीहरि अपने निकट आयी हुई बालघातिनी पूतनाको प्राणहीन कर देंगे। दानव चक्रवात (तृणावर्त)-को तथा देवपीडक महाकाय वत्सासुरको भी मौतके घाट उतार देंगे। कालियनागका दमन करके उसे यमुनासे उजाड़ देंगे। दुःसह धेनुकासुरको मारकर बकासुर और अघासुरके भी प्राण हर लेंगे। दाव, प्रदाव तथा प्रलम्बासूरका भी वध करेंगे। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण तथा मतवाले कुबेर-पुत्रोंका भी दर्प चूर्ण करके श्रीहरि वृषासुरका वध करेंगे। तदनन्तर मथुरामें जाकर धनुष तोड़कर श्रेष्ठ हाथी कुवलयापीडका वध करेंगे। तत्पश्चात् चाणूर आदि मल्लों और अपने मामा कंसको भी श्रीकृष्ण मार गिरायेंगे। फिर कैदमें पड़े हुए माता-पिताको मुक्त करके कालयवनको मारकर वे जरासन्धके भयसे द्वारकामें जा बसेंगे। तदनन्तर भगवान् श्रीहरि क्रमशः रुक्मिणी, सत्यभामा, सत्या, जाम्बवती, केकयराजकुमारी भद्रा, लक्ष्मणा, मित्रवृन्दा तथा कालिन्दीके साथ विवाह करेंगे। फिर भौमासुरको मारकर सोलह हजार स्त्रियोंका पाणिग्रहण करेंगे। इसके बाद पौण्ड्रक, शिशुपाल, दन्तवक्त्र, विदूरथ और शाल्वको मारकर बलभद्ररूपसे द्विविद बंदर और बल्वलका संहार करेंगे। फिर षट्पुरवासी दैत्योंके साथ वज्रनाभ, सुनाभ और वरदानसे बढ़े हुए त्रिशरीर दैत्यका वध करेंगे। शिवजी! फिर पृथ्वीका भार उतारनेको उत्सुक हो श्रीकृष्ण कौरव और पाण्डवपक्षके वीरोंको परस्पर एक-दूसरेको निमित्त बनाकर मार डालेंगे। इसी प्रकार यदुवंशियोंको यदुवंशियोंसे आपसमें ही लड़ाकर श्रीहरि अपने कुलका संहार कर डालेंगे और अपने अनुगामी बलरामजीके साथ फिर अपने परम धाममें चले जायेंगे। शम्भो ! इस प्रकार मैंने श्रीहरिके भविष्य चरित्रका वर्णन किया है। जाओ, जब भूतलपर भगवान् अवतार लेंगे, उस समय तुम वह सब कुछ देखोगे।' ब्रह्मकुमार नारद! सुरभिका वह वचन सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैं पुनः अपने स्थानपर आ गया। वही बात मैंने तुम्हें भी बतायी है। समय आनेपर तुम भी गोकुलपति श्रीकृष्णके चरित्रका अवलोकन करोगे।' वसुजी ! त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करका यह वचन सुनकर मेरा रोम-रोम हर्षसे खिल उठा है। मैं वीणा बजाकर भगवान्के गुण गाता और उसीमें मस्त रहता हुआ इस आतुर जगत्‌को आनन्द प्रदान करता रहता हूँ। द्विजश्रेष्ठ ! यह भविष्यमें होनेवाली बात है, जो मैंने तुझे बतायी है।'

सूतजी कहते हैं— विप्रवर वसुसे ऐसा कहकर देवर्षि नारदजी वीणा बजाते और यदुनन्दन श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए वहाँसे चले गये। ब्राह्मणो ! व्रजमें नारदजीका वह वचन सुनकर विप्रवर वसुका चित्त प्रसन्न हो गया और वे भावी श्रीकृष्णलीलाके दर्शनके लिये उत्सुक हो सदा वृन्दावनमें रहने लगे।


मोहिनीका सब तीर्थोंमें घूमकर यमुनामें प्रवेशपूर्वक दशमीके अन्तभागमें स्थित होना तथा नारदपुराणके पाठ एवं श्रवणकी महिमा

ऋषि बोले— साधु सूतजी! आपने भगवान् श्रीकृष्णके अमृतमय चरित्रका वर्णन किया और उसे हमने सुना। अतः आपकी कृपासे हम सब कृतार्थ हो गये। वसुके ब्रह्मलोक चले जानेपर ब्रह्मपुत्री मोहिनीने पीछे कौन-कौन-सा कार्य किया, यह हमें बतानेकी कृपा करें।

सूतजीने कहा— महर्षियो! आप सब लोग मोहिनीका शुभ चरित्र सुनें। विप्रवर वसुने जिस प्रकार उपदेश दिया था, उसीके अनुसार विधि-पूर्वक तीर्थयात्रा करनेके लिये ब्रह्मपुत्री मोहिनी

७६६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

गङ्गाजीके तटपर गयी। वहाँ जाकर विधि-नन्दिनीने गङ्गा आदि तीर्थोंमें स्नान करके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किया और हर्षमें भरकर उसने वहाँके महात्मा ब्राह्मणोंका सत्सङ्ग किया। पुरोहित वसुने जिस तीर्थकी जैसी विधि बतायी थी, उसी प्रकार उसका सेवन करती हुई वह तीर्थोंमें घूमने लगी। उन तीर्थोंमें वह विष्णु आदि देवताओंकी पूजा करती और ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके दान देती थी। गयामें जाकर उसने पतिको विधिपूर्वक पिण्डदान किया; फिर काशीमें विश्वनाथजीकी पूजा करके वह पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें गयी। उस क्षेत्रमें जगन्नाथजीका प्रसाद भोजन करके शुद्ध शरीर हो वहाँसे लक्ष्मणपर्वतपर गयी। वहाँ विधिपूर्वक लक्ष्मणजीकी पूजा करके सेतु-तीर्थमें जाकर उसने रामेश्वर शिवका पूजन किया और महेन्द्रपर्वतपर जाकर भृगुनन्दन परशुरामजीकी वन्दना की। तत्पश्चात् शिवजीके क्षेत्र गोकर्णमें जाकर गोकर्णनाथ भगवान् शिवका पूजन किया। ब्राह्मणो! तदनन्तर उन श्रेष्ठ द्विजोंके साथ उसने प्रभासको प्रस्थान किया और वहाँ स्नान करके देवता आदिका तर्पण करनेके पश्चात् उस तीर्थकी यात्रा पूरी करके द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन किया। उसके बाद वह कुरुक्षेत्रमें गयी। वहाँ भी विधिपूर्वक यात्रा सम्पन्न करके महारानी मोहिनीने गङ्गाद्वारको प्रस्थान किया और उस तीर्थमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार स्नान, दान आदि कार्य किये। तदनन्तर कामोदाका दर्शन और नमस्कार करके वह बड़ी प्रसन्नताके साथ बदरिकाश्रम-तीर्थको गयी। वहाँ नर-नारायण ऋषिकी पूजा करके उसने बड़ी उतावलीके साथ कामाक्षी देवीका दर्शन करनेके लिये वहाँकी यात्रा की। उस तीर्थमें सिद्धनाथको प्रणाम करके (आदियात्रा पूर्ण करनेके पश्चात्) वहाँसे अयोध्या आयी। वहाँ सरयूमें स्नान करके उसने विधिपूर्वक सीतापति श्रीरामचन्द्रजीकी पूजा की और वहाँसे मध्ययात्रा प्रारम्भ करके वह अमरकण्टक पर्वतपर गयी। वहाँ नर्मदाके स्रोतके समीप ॐकारेश्वर महादेवकी पूजा, सेवा और दर्शन करके मोहिनीने माहिष्मतीपुरीकी यात्रा की। वहाँके त्र्यम्बकेश्वरका पूजन करके वह त्रिपुष्कर-तीर्थमें आयी। तीनों पुष्करोंमें विधिपूर्वक अनेक प्रकारके दान दे वह सब तीर्थोंमें उत्तम मथुरा-पुरीको गयी। वहाँ बीस योजनकी आभ्यन्तरिक यात्रा सम्पन्न करके मथुरापुरीकी परिक्रमाके पश्चात् उसने चार व्यूहोंका दर्शन किया। तदनन्तर बीस तीर्थोंमें स्नान करके पुनः प्रदक्षिणा की। वहाँ मथुराके ब्राह्मणोंको समस्त अलंकारोंसे अलंकृत दस हजार गौएँ दान दीं और उन्हें उत्तम अन्न भोजन कराकर भक्तिविह्वल चित्तसे नमस्कार करनेके पश्चात् विदा किया। फिर यमुनाके तटपर जा बैठी। तदनन्तर मोहिनी पापनाशिनी यमुनादेवीके जलमें समा गयी और फिर आजतक नहीं निकली। उसने दशमी तिथिके अन्तिम भागमें अपना आसन जमा लिया। यदि सूर्योदयकालमें एकादशीका दशमीसे