संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-प्रथम पाद
- पूर्वभाग-प्रथम पाद *
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उद्धार करके भगवान् विष्णुके धाममें चले जाते हैं। ब्रह्मन्! जो गङ्गाजीका स्मरण करता है, उसने सब तीर्थोंमें स्नान और सभी पुण्य-क्षेत्रोंमें निवास कर लिया—इसमें संशय नहीं है। गङ्गा-स्नान किये हुए मनुष्यको देखकर पापी भी स्वर्गलोकका अधिकारी हो जाता है। उसके अङ्गोंका स्पर्श करनेमात्रसे वह देवताओंका अधिपति हो जाता है। गङ्गा, तुलसी, भगवान्के चरणोंमें अविचल भक्ति तथा धर्मोपदेशक सद्गुरुमें श्रद्धा—ये सब मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं¹। उत्तम धर्मका उपदेश देनेवाले गुरुके चरणोंकी धूल, गङ्गाजीकी मृत्तिका तथा तुलसीवृक्षके मूलभागकी मिट्टीको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अपने मस्तकपर धारण करता है, वह वैकुण्ठ धामको जाता है। जो मनुष्य मन-ही-मन यह अभिलाषा करता है कि मैं कब गङ्गाजीके समीप जाऊँगा और कब उनका दर्शन करूँगा, वह भी वैकुण्ठ धामको जाता है। ब्रह्मन्! दूसरी बातें बहुत कहनेसे क्या लाभ, साक्षात् भगवान् विष्णु भी सैकड़ों वर्षोंमें गङ्गाजीकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकते। अहो! माया सारे जगत्को मोहमें डाले हुए है, यह कितनी अद्भुत बात है? क्योंकि गङ्गा और उसके नामके रहते हुए भी लोग नरकमें जाते हैं। गङ्गाजीका नाम संसार-दुःखका नाश करनेवाला बताया गया है। तुलसीके नाम तथा भगवान्की कथा कहनेवाले साधु पुरुषके प्रति की हुई भक्तिका भी यही फल है। जो एक बार भी 'गङ्गा' इस दो अक्षरका उच्चारण कर लेता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है²। परम पुण्यमयी इस गङ्गा नदीका यदि मेष, तुला और मकरकी संक्रान्तियोंमें (अर्थात् वैशाख, कार्तिक और माघके महीनोंमें) भक्तिपूर्वक सेवन किया जाय तो सेवन करनेवाले सम्पूर्ण जगत्को यह पवित्र कर देती है। द्विजश्रेष्ठ! गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, नर्मदा, सरस्वती, तुङ्गभद्रा, कावेरी, यमुना, बाहुदा, वेत्रवती, ताम्रपर्णी तथा सरयू आदि सब तीर्थोंमें गङ्गाजी ही सबसे प्रधान मानी गयी हैं। जैसे सर्वव्यापी भगवान् विष्णु सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं, उसी प्रकार सब पापोंका नाश करनेवाली गङ्गादेवी सब तीर्थोंमें व्याप्त हैं। अहो! महान् आश्चर्य है! परम पावनी जगदम्बा गङ्गा स्नान-पान आदिके द्वारा सम्पूर्ण संसारको पवित्र कर रही हैं, फिर सभी मनुष्य इनका सेवन क्यों नहीं करते?
इसी प्रकार विख्यात काशीपुरी भी तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ और क्षेत्रोंमें उत्तम क्षेत्र है। समस्त देवता उसका सेवन करते हैं। इस लोकमें कानवाले पुरुषोंके वे ही दोनों कान धन्य हैं और वे ही बहुत-से शास्त्रोंका ज्ञान धारण करनेवाले हैं, जिनके द्वारा बारम्बार काशीका नाम श्रवण किया गया है। द्विजश्रेष्ठ! जो मनुष्य अविमुक्त क्षेत्र काशीका स्मरण करते हैं, वे सब पापोंका नाश करके भगवान् शिवके लोकमें चले जाते हैं। मनुष्य सौ योजन दूर रहकर भी यदि अविमुक्त क्षेत्रका स्मरण करता है तो वह बहुतेरे पातकोंसे भरा होनेपर भी भगवान् शिवके रोग-शोकरहित नित्यधामको चला जाता है। ब्रह्मन्! जो प्राण निकलते समय अविमुक्त क्षेत्रका स्मरण कर लेता है, वह भी सब पापोंसे छूटकर शिवधामको प्राप्त हो जाता है। काशीके गुणोंके विषयमें यहाँ बहुत
१. गङ्गा च तुलसी चैव हरिभक्तिरचञ्चला। अत्यन्तदुर्लभा नृणां भक्तिर्धर्मप्रवक्तरि ॥
(ना० पूर्व० ६। २१)
२. गङ्गाया महिमा ब्रह्मन् वक्तुं वर्षशतैरपि। न शक्यते विष्णुनापि किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥
अहो माया जगत्सर्वं मोहयत्येतदद्भुतम्। यतो वै नरकं यान्ति गङ्गानाम्नि स्थितेऽपि हि ॥
संसारदुःखविच्छेदि गङ्गानाम प्रकीर्तितम्। तथा तुलस्या भक्तिश्च हरिकीर्तिप्रवक्तरि ॥
सकृदप्युच्चरेद् यस्तु गङ्गेत्येवाक्षरद्वयम्। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥
(ना० पूर्व० ६। २४–२७)
४० * संक्षिप्त नारदपुराण *
कहनेसे क्या लाभ; जो काशीका नाम भी लेते हैं, उनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ दूर नहीं रहते। ब्रह्मन्! गङ्गा और यमुनाका संगम (प्रयाग) तो काशीसे भी बढ़कर है; क्योंकि उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य परम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। सूर्यके मकर राशिपर रहते समय जहाँ कहीं भी गङ्गामें स्नान किया जाय, वह स्नान-पान आदिके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करती और अन्तमें इन्द्रलोक पहुँचाती है। लोकका कल्याण करनेवाले लिङ्गस्वरूप भगवान् शङ्कर भी जिस गङ्गाका सदा सेवन करते हैं, उसकी महिमाका पूरा-पूरा वर्णन कैसे किया जा सकता है? शिवलिङ्ग साक्षात् श्रीहरिरूप है और श्रीहरि साक्षात् शिवलिङ्गरूप हैं। इन दोनोंमें थोड़ा भी अन्तर नहीं है। जो इनमें भेद करता है, उसकी बुद्धि खोटी है। अज्ञानके समुद्रमें डूबे हुए पापी मनुष्य ही आदि-अन्तरहित भगवान् विष्णु और शिवमें भेदभाव करते हैं। जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी और कारणोंके भी कारण हैं, वे भगवान् विष्णु ही प्रलयकालमें रुद्ररूप धारण करते हैं। ऐसा विद्वान् पुरुषोंका कथन है। भगवान् रुद्र ही विष्णुरूपसे सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हैं। वे ही ब्रह्माजीके रूपसे संसारकी सृष्टि करते हैं तथा अन्तमें हररूपसे वे ही तीनों लोकोंका संहार करते हैं। जो मनुष्य भगवान् विष्णु, शिव तथा ब्रह्माजीमें भेदबुद्धि करता है, वह अत्यन्त भयंकर नरकमें जाता है। जो भगवान् शिव, विष्णु और ब्रह्माजीको एक रूपसे देखता है, वह परमानन्दको प्राप्त होता है। यह शास्त्रोंका सिद्धान्त है। जो अनादि, सर्वज्ञ, जगत्के आदिस्रष्टा तथा सर्वत्र व्यापक हैं, वे भगवान् विष्णु ही शिवलिङ्गरूपसे काशीमें विद्यमान हैं। काशीपुरीका विश्वेश्वरलिङ्ग ज्योतिर्लिङ्ग कहलाता है। श्रेष्ठ मनुष्य उसका दर्शन करके परम ज्योतिको प्राप्त होता है। जिसने त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली काशीपुरीकी परिक्रमा कर ली, उसके द्वारा समुद्र, पर्वत तथा सात द्वीपोंसहित पृथिवीकी परिक्रमा हो गयी। धातु, मिट्टी, लकड़ी, पत्थर अथवा चित्र आदिसे निर्मित जो भगवान् शिव अथवा विष्णुकी निर्मल प्रतिमाएँ हैं, उन सबमें भगवान् विष्णु विद्यमान हैं। जहाँ तुलसीका बगीचा, कमलोंका वन और पुराणोंका पाठ हो, वहाँ भगवान् विष्णु स्थित रहते हैं। ब्रह्मन्! पुराणकी कथा सुननेमें जो प्रेम होता है, वह गङ्गास्नानके समान है तथा पुराणकी कथा कहनेवाले व्यासके प्रति जो भक्ति होती है, वह प्रयागके तुल्य मानी गयी है। जो पुराणोक्त धर्मका उपदेश देकर जन्म-मृत्युरूप संसार-सागरमें डूबे हुए जगत्का उद्धार करता है, वह साक्षात् श्रीहरिका स्वरूप बताया गया है। गङ्गाके समान कोई तीर्थ नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, भगवान् विष्णुके समान कोई देवता नहीं है तथा गुरुसे बढ़कर कोई तत्त्व नहीं है¹। जैसे चारों वर्णोंमें ब्राह्मण, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा तथा सरोवरोंमें समुद्र श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पुण्य तीर्थों और नदियोंमें गङ्गा सबसे श्रेष्ठ मानी गयी हैं। शान्तिके समान कोई बन्धु नहीं है, सत्यसे बढ़कर कोई तप नहीं है, मोक्षसे बड़ा कोई लाभ नहीं है और गङ्गाके समान कोई नदी नहीं है²। गङ्गाजीका उत्तम नाम पापरूपी वनको भस्म करनेके लिये दावानलके समान है। गङ्गा संसाररूपी रोगको दूर करनेवाली हैं, इसलिये यत्नपूर्वक उनका सेवन करना चाहिये। गायत्री और गङ्गा दोनों समस्त पापोंको हर लेनेवाली मानी गयी हैं। नारदजी! जो इन दोनोंके प्रति भक्तिभावसे रहित है, उसे पतित समझना चाहिये। गायत्री वेदोंकी माता हैं और जाह्नवी (गङ्गा)
१. नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरुः। नास्ति विष्णुसमं देवं नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥
(ना० पूर्व० ६।५८)
२. नास्ति शान्तिसमो बन्धुर्नास्ति सत्यात्परंतपः। नास्ति मोक्षात्परो लाभो नास्ति गङ्गासमा नदी॥
(ना० पूर्व० ६।६०)