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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-प्रथम पाद ३७

  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * ३७

रहते हैं, वे श्रेष्ठ भागवत हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य सबके लिये हितकारक वचन बोलते हैं और सबके गुणोंको ही ग्रहण करनेवाले हैं, वे इस लोकमें भगवद्भक्त माने गये हैं। जो श्रेष्ठ मानव सब जीवोंको अपने ही समान देखते तथा शत्रु और मित्रमें भी समान भाव रखते हैं, वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। जो धर्मशास्त्रके वक्ता, सत्यवादी तथा साधुपुरुषोंके सेवक हैं, वे भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ कहे गये हैं। जो पुराणोंकी व्याख्या करते, जो पुराण सुनते और पुराण-वक्तामें श्रद्धाभक्ति रखते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो मनुष्य सदा गौओं तथा ब्राह्मणोंकी सेवा करते और तीर्थयात्रामें लगे रहते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो मनुष्य दूसरोंका अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते और भगवन्नामका जप करते रहते हैं, वे उत्तम भागवत हैं। जो बगीचे लगाते, तालाब और पोखरोंकी रक्षा करते तथा बावड़ी और कुएँ बनवाते हैं, वे उत्तम भक्त हैं। जो तालाब और देवमन्दिर बनवाते तथा गायत्री-मन्त्रके जपमें संलग्न रहते हैं, वे श्रेष्ठ भक्त हैं। जो हरिनामका आदर करते, उन्हें सुनकर अत्यन्त हर्षमें भर जाते और पुलकित हो उठते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो मनुष्य तुलसीका बगीचा देखकर उसको नमस्कार करते और कानोंमें तुलसी काष्ठ धारण करते हैं, वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। जो तुलसीकी गन्ध सूँघकर तथा उसकी जड़के समीपकी मिट्टीको सूँघकर प्रसन्न होते हैं, वे भी श्रेष्ठ भक्त हैं। जो वर्णाश्रम-धर्मके पालनमें तत्पर, अतिथियोंका सत्कार करनेवाले तथा वेदार्थके वक्ता होते हैं, वे श्रेष्ठ भागवत माने गये हैं। जो भगवान् शिवसे प्रेम रखनेवाले, शिवके चिन्तनमें ही आसक्त रहनेवाले तथा शिवके चरणोंकी पूजामें तत्पर एवं त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाले हैं, वे भी श्रेष्ठ भक्त हैं। जो भगवान् विष्णु तथा परमात्मा शिवके नाम लेते तथा रुद्राक्षकी मालासे विभूषित होते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो बहुत दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा महादेवजी अथवा भगवान् विष्णुका उत्तम भक्तिसे यजन करते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो पढ़े हुए शास्त्रोंका दूसरोंके हितके लिये उपदेश करते और सर्वत्र गुण ही ग्रहण करते हैं, वे उत्तम भक्त माने गये हैं। परमेश्वर शिव तथा परमात्मा विष्णुमें जो समबुद्धिसे प्रवृत्त होते हैं, वे श्रेष्ठ भक्त माने गये हैं। जो शिवकी प्रसन्नताके लिये अग्निहोत्रमें तत्पर पञ्चाक्षर मन्त्रके जपमें संलग्न तथा शिवके ध्यानमें अनुरक्त रहते हैं, वे उत्तम भागवत हैं। जो जलदानमें तत्पर, अन्नदानमें संलग्न तथा एकादशीव्रतके पालनमें लगे रहनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ भक्त हैं। जो गोदान करते, कन्यादानमें तत्पर रहते और मेरी प्रसन्नताके लिये सत्कर्म करते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। विप्रवर मार्कण्डेय! यहाँपर कुछ ही भगवद्भक्तोंका वर्णन किया है। मैं भी सौ करोड़ वर्षोंमें भी उन सबका पूरा-पूरा वर्णन नहीं कर सकता। अतः विप्रवर! तुम भी सदा उत्तम शीलसे युक्त होकर रहो। समस्त प्राणियोंको आश्रय दो। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखो। सबके प्रति मैत्रीभाव रखते हुए धर्माचरणमें लगे रहो। पुनः महाप्रलय-कालतक सब धर्मोंका पालन करते हुए मेरे स्वरूपके ध्यानमें तत्पर रहकर तुम परम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।

देवताओंके स्वामी दयासिन्धु भगवान् विष्णु अपने भक्त मार्कण्डेयको इस प्रकार वरदान देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। महाभाग मार्कण्डेयजी सदा भगवान्‌के भजनमें लगे रहकर उत्तम धर्मका पालन करने लगे। उन्होंने अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान्‌का पूजन किया। फिर महाक्षेत्र शालग्रामतीर्थमें उत्तम तपस्या की और भगवान्‌के ध्यानद्वारा कर्मबन्धनका नाश करके परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। इसलिये

३८* संक्षिप्त नारदपुराण *

भगवान्‌की आराधना करनेवाला भक्त पुरुष समस्त प्राणियोंका हितकारी होता है। वह मनसे जो-जो वस्तुएँ पाना चाहता है, वह सब निस्संदेह प्राप्त कर लेता है। | सनकजी कहते हैं—विप्रवर नारद! तुमने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार यह सब भगवद्भक्तिका माहात्म्य मैंने तुम्हें बताया है। अब और क्या सुनना चाहते हो?


गङ्गा-यमुना-संगम, प्रयाग, काशी तथा गङ्गा एवं गायत्रीकी महिमा

सूतजी कहते हैं— भगवान्‌की भक्तिका यह माहात्म्य सुनकर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ज्ञान-विज्ञानके पारगामी सनक मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया।

नारदजी बोले— मुने! आप शास्त्रोंके पारदर्शी विद्वान् हैं। मुझपर बड़ी भारी दया करके यह ठीक-ठीक बताइये कि क्षेत्रोंमें उत्तम क्षेत्र तथा तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ कौन है?

सनकजीने कहा— ब्रह्मन्! यह परम गोपनीय प्रसङ्ग है, सुनो। उत्तम क्षेत्रोंका यह वर्णन सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको देनेवाला, श्रेष्ठ, बुरे स्वप्नोंका नाशक, पवित्र, धर्मानुकूल, पापहारी तथा शुभ है। मुनियोंको नित्य-निरन्तर इसका श्रवण करना चाहिये। गङ्गा और यमुनाका जो संगम है, उसीको महर्षिलोग शास्त्रोंमें उत्तम क्षेत्र तथा तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ कहते हैं। ब्रह्मा आदि समस्त देवता, मुनि तथा पुण्यकी इच्छा रखनेवाले सब मनुष्य श्वेत और श्याम जलसे भरे हुए उस संगम-तीर्थका सेवन करते हैं। गङ्गाको परम पवित्र नदी समझना चाहिये; क्योंकि वह भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई है। इसी प्रकार यमुना भी साक्षात् सूर्यकी पुत्री हैं। ब्रह्मन्! इन दोनोंका समागम परम कल्याणकारी है। मुने! नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गा स्मरणमात्रसे समस्त क्लेशोंका नाश करनेवाली, सम्पूर्ण पापोंको दूर करनेवाली तथा सारे उपद्रवोंको मिटा देनेवाली है। महामुने! समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जो-जो पुण्यक्षेत्र हैं, उन सबसे अधिक पुण्यतम क्षेत्र प्रयागको ही जानना चाहिये। जहाँ ब्रह्माजीने यज्ञद्वारा भगवान् लक्ष्मीपतिका यजन किया है तथा सब महर्षियोंने भी वहाँ नाना प्रकारके यज्ञ किये हैं। सब तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो पुण्य प्राप्त होते हैं, वे सब मिलकर गङ्गाजीके एक बूँद जलसे किये हुए अभिषेककी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते। जो गङ्गासे सौ योजन दूर खड़ा होकर भी 'गङ्गा-गङ्गा' का उच्चारण करता है, वह भी सब पापोंसे मुक्त हो जाता है; फिर जो गङ्गामें स्नान करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? भगवान् विष्णुके चरणकमलोंसे प्रकट होकर भगवान् शिवके मस्तकपर विराजमान होनेवाली भगवती गङ्गा मुनियों और देवताओंके द्वारा भी भलीभाँति सेवन करनेयोग्य हैं, फिर साधारण मनुष्योंके लिये तो बात ही क्या है?* श्रेष्ठ मनुष्य अपने ललाटमें जहाँ गङ्गाजीकी बालूका तिलक लगाते हैं, वहीं अर्धचन्द्रके नीचे प्रकाशित होनेवाला तृतीय नेत्र समझना चाहिये। गङ्गामें किया हुआ स्नान महान् पुण्यदायक तथा देवताओंके लिये भी दुर्लभ है; वह भगवान् विष्णुका सारूप्य देनेवाला होता है—इससे बढ़कर उसकी महिमाके विषयमें और क्या कहा जा सकता है? गङ्गामें स्नान करनेवाले पापी भी सब पापोंसे मुक्त हो श्रेष्ठ विमानपर बैठकर परम धाम वैकुण्ठको चले जाते हैं। जिन्होंने गङ्गामें स्नान किया है, वे महात्मा पुरुष पिता और माताके कुलकी बहुत-सी पीढ़ियोंको


* गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शते स्थितः। सोऽपि मुच्येत पापेभ्यः किमु गङ्गाभिषेकवान्॥
विष्णुपादोद्भवा देवी विश्वेश्वरशिरःस्थिता। संसेव्या मुनिभिर्देवैः किं पुनः पामरैर्नरैः॥
(ना० पूर्व० ६। १२-१३)