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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-प्रथम पाद १६१

  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * १६१

इन्द्र और सुधर्मका संवाद, विभिन्न मन्वन्तरोंके इन्द्र और देवताओंका वर्णन तथा भगवत्-भजनका माहात्म्य

श्रीसनकजी कहते हैं—मुने! इसके बाद मैं भगवान् विष्णुकी विभूतिस्वरूप मनु और इन्द्र आदिका वर्णन करूँगा। इस वैष्णवी विभूतिका श्रवण अथवा कीर्तन करनेवाले पुरुषोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।

एक समय वैवस्वत मन्वन्तरके भीतर ही गुरु बृहस्पति और देवताओंसहित इन्द्र सुधर्मके निवास-स्थानपर गये। देवर्षे! बृहस्पतिजीके साथ देवराजको आया देख सुधर्मने आदरपूर्वक उनकी यथायोग्य पूजा की। सुधर्मसे पूजित हो इन्द्रने विनयपूर्वक कहा।

इन्द्र बोले—विद्वन्! यदि आप बीते हुए ब्रह्मकल्पका वृत्तान्त जानते हैं तो बताइये। मैं यही पूछनेके लिये गुरुजीके साथ आया हूँ।

देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर सुधर्म हँस पड़ा और उसने विनयपूर्वक पूर्वकल्पकी सब बातोंका विधिवत् वर्णन किया।

सुधर्मने कहा—इन्द्र! एक सहस्र चतुर्युगीका ब्रह्माजीका एक दिन होता है और उनके एक दिनमें चौदह मनु, चौदह इन्द्र तथा पृथक्-पृथक् अनेक प्रकारके देवता हुआ करते हैं। वासव! सभी इन्द्र और मनु आदि तेज, लक्ष्मी, प्रभाव और बलमें समान ही होते हैं। मैं उन सबके नाम बतलाता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। सबसे पहले स्वायम्भुव मनु हुए। तदनन्तर क्रमशः स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, सातवें वैवस्वत मनु, आठवें सूर्यसावर्णि और नवें दक्षसावर्णि हैं। दसवें मनुका नाम ब्रह्मसावर्णि और ग्यारहवेंका धर्मसावर्णि है। तदनन्तर बारहवें रुद्रसावर्णि तथा तेरहवें रोचमान हुए। चौदहवें मनुका नाम भौत्य बताया गया है। ये चौदह मनु हैं।

देवराज! अब मैं देवताओं और इन्द्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। स्वयम्भू मन्वन्तरमें देवतालोग यामके नामसे विख्यात थे। उनके परम बुद्धिमान् इन्द्रकी शचीपति नामसे प्रसिद्धि थी। स्वारोचिष मन्वन्तरमें पारावत और तुषित नामके देवता थे। उनके स्वामी इन्द्रका नाम विपश्चित था। वे सब प्रकारकी सम्पदाओंसे समृद्ध थे। तीसरे उत्तम नामक मन्वन्तरमें सुधामा, सत्य, शिव तथा प्रतर्दन नामवाले देवता थे। उनके इन्द्र सुशान्ति नामसे प्रसिद्ध थे। चौथे तामस मन्वन्तरमें सुपार, हरि, सत्य और सुधी—ये देवता हुए*। शक्र! उन देवताओंके इन्द्रका नाम उस समय शिबि था। पाँचवें (रैवत) मन्वन्तरमें अमिताभ आदि देवता


* विष्णुपुराणमें भी तामस मन्वन्तरके ये ही देवता बताये गये हैं। वहाँका मूल पाठ इस प्रकार है—
तामसस्यान्तरे देवाः सुपाराः हरयस्तथा। सत्याश्च सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गुणाः॥
शिबिरिन्द्रस्तथा चासीत् ・・・・・। (३।१।१६-१७)

१६२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

थे और पाँचवें देवराजका नाम विभु कहा गया है। छठे (चाक्षुष) मन्वन्तरमें आर्य आदि देवता बताये गये हैं। उन सबके इन्द्रका नाम मनोजव था। इस सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें आदित्य, वसु तथा रुद्र आदि देवता हैं और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न आप ही इन्द्र हैं। आपका विशेष नाम पुरन्दर बताया गया है। आठवें सूर्यसावर्णि मन्वन्तरमें अप्रमेय तथा सुतप आदि होनेवाले देवता बताये जाते हैं। भगवान् विष्णुकी आराधनाके प्रभावसे राजा बलि उनके इन्द्र होंगे। नवें दक्षसावर्णि मन्वन्तरमें पार आदि देवता होंगे और उनके इन्द्रका नाम अद्भुत बताया जाता है। दसवें ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तरमें सुवासन आदि देवता कहे गये हैं। उनके इन्द्रका नाम शान्ति होगा। ग्यारहवें धर्मसावर्णि मन्वन्तरमें विहङ्गम आदि देवता होंगे और उनके इन्द्र वृष नामसे प्रसिद्ध होंगे। बारहवें रुद्रसावर्णि मन्वन्तरमें हरित आदि देवता तथा ऋतुधामा नामवाले इन्द्र होंगे। तेरहवें रोचमान या रौच्य नामक मन्वन्तरमें सुत्रामा आदि देवता होंगे। उनके महापराक्रमी इन्द्रका नाम दिवस्पति कहा जाता है। चौदहवें भौत्य मन्वन्तरमें चाक्षुष आदि देवता होंगे और उनके इन्द्रकी शुचि नामसे प्रसिद्धि होगी। देवराज! इस प्रकार मैंने भूत और भविष्य मनु, इन्द्र तथा देवताओंका यथार्थ वर्णन किया है। ये सब ब्रह्माजीके एक दिनमें अपने अधिकारका उपभोग करते हैं। सम्पूर्ण लोकों तथा सभी स्वर्गोंमें एक ही तरहकी सृष्टि कही गयी है। उस सृष्टिके विधाता बहुत हैं। उनकी संख्या यहाँ कौन जानता है? देवराज! मेरे ब्रह्मलोकमें रहते समय बहुत-से ब्रह्मा आये और चले गये। आज मैं उनकी संख्या बतानेमें असमर्थ हूँ। इस स्वर्गलोकमें आकर भी मेरा जितना समय बीता है, उसको सुनो— 'अबतक चार मनु बीत गये, किंतु मेरी समृद्धिका विस्तार बढ़ता ही गया। प्रभो! अभी मुझे सौ करोड़ युगोंतक यहीं रहना है। तत्पश्चात् मैं कर्मभूमिको जाऊँगा।'

महात्मा सुधर्मके ऐसा कहनेपर देवराज मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और निरन्तर भगवान् विष्णुकी आराधनामें लग गये। यद्यपि देवतालोग स्वर्गका सुख भोगते हैं तथापि वे सब इस भारतवर्षमें जन्म पानेके लिये लालायित रहते हैं। जो भगवान् नारायणकी पूजा करते हैं, उन महात्माओंकी पूजा सदा ब्रह्मा आदि देवता किया करते हैं। जो महात्मा सब प्रकारके संग्रह-परिग्रहका त्याग करके निरन्तर भगवान् नारायणके चिन्तनमें लगे रहते हैं, उन्हें भयङ्कर संसारका बन्धन कैसे प्राप्त हो सकता है? यदि कोई उन महापुरुषोंके सङ्गका लोभ रखते हैं तो वे भी मोक्षके भागी हो जाते हैं। जो मानव प्रतिदिन सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके गरुड़वाहन भगवान् नारायणकी अर्चना करते हैं, वे सम्पूर्ण पापराशियोंसे सर्वथा मुक्त होकर हर्षपूर्ण हृदयसे भगवान् विष्णुके कल्याणमय पदको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य आसक्तिरहित तथा पर-अवर (उत्तम-मध्यम, शुभ-अशुभ)-के ज्ञाता हैं और निरन्तर देवगुरु भगवान् नारायणका चिन्तन करते रहते हैं, उस ध्यानसे उनके अन्तःकरणकी सारी पापराशि नष्ट हो जाती है और वे फिर कभी माताके स्तनोंका दूध नहीं पीते। जो मानव भगवान्की कथा श्रवण करके अपने समस्त दोष-दुर्गुण दूर कर चुके हैं और जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी


मार्कण्डेयपुराणमें तामस मन्वन्तरके देवता सत्य, सुधी, हरि तथा सुरूप बताये गये हैं और इन्द्रका नाम 'शिखी' कहा गया है।

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आराधनामें अनुरक्त है, वे अपने शरीरके सङ्ग अथवा सम्भाषणसे भी संसारको पवित्र करते हैं, अतः सदा श्रीहरिकी ही पूजा करनी चाहिये। ब्रह्मन्! जैसे नीची भूमिमें इधर-उधरका सारा जल (सिमट-सिमटकर) एकत्र हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ भगवत्पूजापरायण शुद्धचित्त महापुरुष रहते हैं, वहीं सम्पूर्ण कल्याणका वास होता है*। भगवान् विष्णु ही सबसे श्रेष्ठ बन्धु हैं। वे ही सर्वोत्तम गति हैं। अतः उन्हींकी निरन्तर पूजा करनी चाहिये, क्योंकि वे ही सबकी चेतनाके कारण हैं। मुनिश्रेष्ठ! तुम स्वर्ग और मोक्षफलके दाता सदानन्दस्वरूप निरामय भगवान् श्रीहरिकी पूजा करो। इससे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी।


चारों युगोंकी स्थितिका संक्षेपसे तथा कलिधर्मका विस्तारसे वर्णन एवं भगवन्नामकी अद्भुत महिमाका प्रतिपादन

नारदजीने कहा—मुने! आप तात्त्विक अर्थोंके ज्ञानमें निपुण हैं। अब मैं युगोंकी स्थितिका परिचय सुनना चाहता हूँ।

श्रीसनकजीने कहा—महाप्राज्ञ! साधुवाद, तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। मुने! तुम सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाले हो। अच्छा, अब मैं समस्त जगत्‌के लिये उपकारी युग-धर्मका वर्णन आरम्भ करता हूँ। किसी समय तो पृथ्वीपर उत्तम धर्मकी वृद्धि होती है और किसी समय वही विनाशको प्राप्त होने लगता है। साधुशिरोमणे! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चार युग माने गये हैं; इनकी आयु बारह हजार दिव्य वर्षोंकी समझनी चाहिये। वे चारों युग उतने ही सौ वर्षोंकी संध्या और संध्यांशसे युक्त होते हैं। इनकी कला-संख्या सदा एक-सी ही जाननी चाहिये। पहले युगको सत्ययुग कहते हैं, दूसरेका नाम त्रेता है, तीसरेका नाम द्वापर है और अन्तिम युगको कलियुग कहते हैं। इसी क्रमसे इनका आगमन होता है। विप्रवर! सत्ययुगमें देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा सर्पोंका भेद नहीं था। उस समय सब-के-सब देवताओंके समान स्वभाववाले थे। सब प्रसन्न और धर्मनिष्ठ थे। कृतयुगमें क्रय-विक्रयका व्यापार और वेदोंका विभाग नहीं था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—सभी अपने-अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहकर सदा भगवान् नारायणकी उपासना करते थे। सभी अपनी योग्यताके अनुसार तपस्या और ध्यानमें लगे रहते थे। उनमें काम, क्रोध आदि दोष नहीं थे। सब लोग शम-दम आदि सद्गुणोंमें तत्पर थे। सबका मन धर्मसाधनमें लगा रहता था। किसीमें ईर्ष्या तथा दूसरोंके दोष देखनेका स्वभाव नहीं था। सभी लोग दम्भ और पाखण्डसे दूर रहते थे। सत्ययुगके सभी द्विज सत्यवादी, चारों आश्रमोंके धर्मका पालन करनेवाले, वेदाध्ययनसम्पन्न तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण थे। चारों आश्रमोंवाले अपने-अपने कर्मोंके द्वारा कामना और फलासक्तिका त्याग करके परम गतिको प्राप्त होते थे। सत्ययुगमें भगवान् नारायणका


* ये मानवा हरिकथाश्रवणास्तदोषाः कृष्णाङ्घ्रिपद्मभजने रतचेतनाश्च।
ते वै पुनन्ति च जगन्ति शरीरसङ्गात् सम्भाषणादपि ततो हरिरेव पूज्यः॥
हरिपूजापरा यत्र महान्तः शुद्धबुद्धयः। तत्रैव सकलं भद्रं यथा निम्ने जलं द्विज॥
(ना० पूर्व० ४०। ५३-५४)

१६४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

श्रीविग्रह अत्यन्त निर्मल एवं शुक्लवर्णका होता है। मुनिश्रेष्ठ! त्रेतामें धर्म एक पादसे हीन हो जाता है। (सत्ययुगकी अपेक्षा एक चौथाई कम लोग धर्मका पालन करते हैं।) भगवान्‌के शरीरका वर्ण लाल हो जाता है। उस समय जनताको कुछ क्लेश भी होने लगता है। त्रेतामें सभी द्विज क्रियायोगमें तत्पर रहते हैं। यज्ञ-कर्ममें उनकी निष्ठा होती है। वे नियमपूर्वक सत्य बोलते, भगवान्‌का ध्यान करते, दान देते और न्याययुक्त प्रतिग्रह भी स्वीकार करते हैं। मुनीश्वर! द्वापरमें धर्मके दो ही पैर रह जाते हैं। भगवान् विष्णुका वर्ण पीला हो जाता है और वेदके चार विभाग हो जाते हैं। द्विजोत्तम! उस समय कोई-कोई असत्य भी बोलने लगते हैं। ब्राह्मण आदि वर्णोंमेंसे कुछ लोगोंमें राग-द्वेष आदि दुर्गुण आ जाते हैं। विप्रवर! कुछ लोग स्वर्ग और अपवर्गके लिये यज्ञ करते हैं, कोई धनादिकी कामनाओंमें आसक्त हो जाते हैं और कुछ लोगोंका हृदय पापसे मलिन हो जाता है। द्विजश्रेष्ठ! द्वापरमें धर्म और अधर्म दोनोंकी स्थिति समान होती है। अधर्मके प्रभावसे उस समयकी प्रजा क्षीण होने लगती है। मुनीश्वर! कितने ही लोग द्वापर आनेपर अल्पायु भी होंगे। ब्रह्मन्! कुछ लोग दूसरोंको पुण्यमें तत्पर देखकर उनसे डाह करने लगेंगे। कलियुग आनेपर धर्मका एक ही पैर शेष रह जाता है। इस तामस युगके प्राप्त होनेपर भगवान् श्रीहरि श्याम रंगके हो जाते हैं। उसमें कोई विरला ही धर्मात्मा यज्ञोंका अनुष्ठान करता है और कोई महान् पुण्यात्मा ही क्रियायोगमें तत्पर रहता है। उस समय धर्मपरायण मनुष्यको देखकर सब लोग ईर्ष्या और निन्दा करते हैं। कलियुगमें व्रत और सदाचार नष्ट हो जाते हैं। ज्ञान और यज्ञ आदिकी भी यही दशा होती है। उस समय अधर्मका प्रचार होनेसे जगत्में उपद्रव होते रहते हैं। सब लोग दूसरोंके दोष बतानेवाले और स्वयं पाखण्डपूर्ण आचारमें तत्पर होते हैं।

नारदजीने कहा— मुने! आपने संक्षेपसे ही युगधर्मोंका वर्णन किया है, कृपया कलिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि आप धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं। मुनिश्रेष्ठ! कलियुगमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंका खान-पान और आचार-व्यवहार कैसा होगा?

श्रीसनकजीने कहा— सब लोकोंका उपकार करनेवाले मुनिश्रेष्ठ! सुनो, मैं कलि-धर्मोंका यथार्थ एवं विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। कलि बड़ा भयङ्कर युग है। उसमें सब प्रकारके पातकोंका सम्मिश्रण होता है अर्थात् पापोंकी बहुलता होनेके कारण एक पापमें दूसरा पाप शामिल हो जाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र धर्मसे मुँह मोड़ लेते हैं। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर सभी द्विज वेदोंसे विमुख हो जाते हैं। सभी किसी-न-किसी बहानेसे धर्ममें लगते हैं। सब दूसरोंके दोष बताया करते हैं। सबका अन्तःकरण व्यर्थ अहङ्कारसे दूषित होता है। पण्डित लोग भी सत्यसे दूर रहते हैं। 'मैं ही सबसे बड़ा हूँ' इस प्रकार सभी परस्पर विवाद करते हैं। सब मनुष्य अधर्ममें आसक्त और वितण्डावादी होते हैं। इन्हीं कारणोंसे कलियुगमें सब लोग स्वल्पायु होंगे। ब्रह्मन्! थोड़ी आयु होनेके कारण मनुष्य शास्त्रोंका अध्ययन नहीं कर सकेंगे और विद्याध्ययनशून्य होंगे। उनके द्वारा बार-बार अधर्मपूर्ण बर्ताव होता है। उस समयकी समस्त पापपरायण प्रजा अवस्था-क्रमके विपरीत मरने लगेगी। ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगोंमें परस्पर संकरता आ जायगी। मूढ़ मनुष्य काम-क्रोधके वशीभूत हो व्यर्थके संतापसे पीड़ित