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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-प्रथम पाद १३९

  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * १३९

और कर्मयोग—दोनोंमें समानरूपसे आवश्यक हैं*। यह चराचर विश्व सनातन भगवान् विष्णुका ही स्वरूप है। ऐसा मनसे निश्चय करके उक्त दोनों योगोंका अभ्यास करे। जो मनीषी पुरुष समस्त प्राणियोंको अपने आत्माके ही समान मानते हैं, वे ही देवाधिदेव चक्रसुदर्शनधारी भगवान् विष्णुके परम भावको जानते हैं। जो असूया (दूसरोंके दोष देखने)-में संलग्न हो तपस्या, पूजा और ध्यानमें प्रवृत्त होता है, उसकी वह तपस्या, पूजा और ध्यान सब व्यर्थ होते हैं। इसलिये शम, दम आदि गुणोंके साधनमें लगकर विधिपूर्वक क्रियायोगमें तत्पर हो मनुष्य अपनी मुक्तिके लिये सर्वस्वरूप भगवान् विष्णुकी पूजा करे। जो सम्पूर्ण लोकोंके हितसाधनमें तत्पर हो मन, वाणी और क्रियाद्वारा देवेश्वर भगवान् विष्णुका भलीभाँति पूजन करता है, जो जगत्के कारणभूत, सर्वान्तर्यामी एवं सर्वपापहारी सर्वव्यापी भगवान् विष्णुकी स्तोत्र आदिके द्वारा स्तुति करता है, वह कर्मयोगी कहा जाता है। उपवास आदि व्रत, पुराणश्रवण आदि सत्कर्म तथा पुष्प आदि सामग्रियोंसे जो भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है, उसे क्रियायोग कहा गया है। इस प्रकार जो भगवान् विष्णुमें भक्ति रखकर क्रियायोगमें मन लगानेवाले हैं, उनके पूर्वजन्मोंके किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। पापोंके नष्ट होनेसे जिसकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है, वह उत्तम ज्ञानकी इच्छा रखता है; क्योंकि ज्ञान मोक्ष देनेवाला है—ऐसा जानना चाहिये। अब मैं तुम्हें ज्ञान-प्राप्तिका उपाय बतलाता हूँ।

बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह शास्त्रार्थविशारद साधुपुरुषोंके सहयोगसे इस चराचर विश्वमें स्थित नित्य और अनित्य वस्तुका भलीभाँति विचार करे। संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं। केवल भगवान् श्रीहरि नित्य माने गये हैं। अतः अनित्य वस्तुओंका परित्याग करके नित्य श्रीहरिका ही आश्रय लेना चाहिये। इहलोक और परलोकके जितने भोग हैं, उनकी ओरसे विरक्त होना चाहिये। जो भोगोंसे विरक्त नहीं होता, वह संसारमें फँस जाता है। जो मानव जगत्के अनित्य पदार्थोंमें आसक्त होता है, उसके संसार-बन्धनका नाश कभी नहीं होता। अतः शम, दम आदि गुणोंसे सम्पन्न हो मुक्तिकी इच्छा रखकर ज्ञान-प्राप्तिके लिये साधन करे। जो शम (दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा और समाधान) आदि गुणोंसे शून्य है, उसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती। जो राग-द्वेषसे रहित, शमादि गुणोंसे सम्पन्न तथा प्रतिदिन भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर है, उसीको 'मुमुक्षु' कहते हैं। इन चार (नित्यानित्यवस्तुविचार, वैराग्य, षट् सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व—) साधनोंसे मनुष्य विशुद्धबुद्धि कहा जाता है। ऐसा पुरुष सम्पूर्ण


* अहिंसा सत्यमक्रोधो ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ। अनीर्ष्या च दया चैव योगयोरुभयोः समाः॥

१४०* संक्षिप्त नारदपुराण *

प्राणियोंके प्रति दयाभाव रखते हुए सदा सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका ध्यान करे। ब्रह्मन् ! क्षर-अक्षर (जड-चेतन) स्वरूप सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके भगवान् नारायण विराजमान हैं। ऐसा जो जानता है, उसका ज्ञान योगज माना गया है। अतः मैं योगका उपाय बतलाता हूँ। जो संसार-बन्धनको दूर करनेवाला है।

पर और अपर-भेदसे आत्मा दो प्रकारका कहा गया है। अथर्ववेदकी श्रुति भी कहती है कि दो ब्रह्म जानने योग्य हैं। पर आत्मा अथवा परब्रह्मको निर्गुण बताया गया है तथा अपर आत्मा या अपरब्रह्म अहंकारयुक्त (जीवात्मा) कहा गया है। इन दोनोंके अभेदका ज्ञान 'ज्ञानयोग' कहलाता है। इस पाञ्चभौतिक शरीरके भीतर हृदयदेशमें जो साक्षीरूपमें स्थित है, उसे साधु पुरुषोंने अपरात्मा कहा है तथा परमात्मा पर (श्रेष्ठ) माने गये हैं। शरीरको क्षेत्र कहते हैं। जो क्षेत्रमें स्थित आत्मा है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। परमात्मा अव्यक्त, शुद्ध एवं सर्वत्र परिपूर्ण कहा गया है। मुनिश्रेष्ठ ! जब जीवात्मा और परमात्माके अभेदका ज्ञान हो जाता है, तब अपरात्माके बन्धनका नाश होता है। परमात्मा एक, शुद्ध, अविनाशी, नित्य एवं जगन्मय हैं। वे मनुष्योंके बुद्धिभेदसे भेदवान्-से दिखायी देते हैं। ब्रह्मन् ! उपनिषदोंद्वारा वर्णित जो एक अद्वितीय सनातन परब्रह्म परमात्मा हैं, उनसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है¹। उन निर्गुण परमात्माका न कोई रूप है, न रंग है, न कर्तव्य कर्म है और न कर्तृत्व या भोक्तृत्व ही है। वे सब कारणोंके भी आदिकारण हैं, सम्पूर्ण तेजोंके प्रकाशक परम तेज हैं। उनसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है। मुक्तिके लिये उन्हीं परमात्माका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। ब्रह्मन् ! शब्दब्रह्ममय जो महावाक्य आदि हैं अर्थात् वेदवर्णित जो 'तत्त्वमसि', 'सोऽहमस्मि' इत्यादि महावाक्य हैं, उनपर विचार करनेसे जीवात्मा और परमात्माका अभेद ज्ञान प्रकाशित होता है, वह मुक्तिका सर्वश्रेष्ठ साधन है। नारदजी ! जो उत्तम ज्ञानसे हीन हैं, उन्हें यह जगत् नाना भेदोंसे युक्त दिखायी देता है, परंतु परम ज्ञानियोंकी दृष्टिमें यह सब परब्रह्मरूप है। परमानन्दस्वरूप, परात्पर, अविनाशी एवं निर्गुण परमात्मा एक ही हैं, किंतु बुद्धिभेदसे वे भिन्न-भिन्न अनेक रूप धारण करनेवाले प्रतीत होते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! जिनके ऊपर मायाका पर्दा पड़ा है, वे मायाके कारण परमात्मामें भेद देखते हैं, अतः मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला पुरुष योगके बलसे मायाको निस्सार समझकर त्याग दे। माया न सद्रूप है, न असद्रूप, न सद्-असद् उभयरूप है, अतः उसे अनिर्वाच्य (किसी रूपमें भी न कहने योग्य) समझना चाहिये। वह केवल भेदबुद्धि प्रदान करनेवाली है। मुनिश्रेष्ठ ! अज्ञान शब्दसे मायाका ही बोध होता है, अतः जो मायाको जीत लेते हैं, उनके अज्ञानका नाश हो जाता है²। ज्ञान शब्दसे सनातन परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया


१. यदा त्वभेदविज्ञानं जीवात्मपरमात्मनोः। भवेत्तदा मुनिश्रेष्ठ पाशच्छेदोऽपरात्मनः ॥
एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः परमात्मा जगन्मयः। नृणां विज्ञानभेदेन भेदवानिव लक्ष्यते ॥
एकमेवाद्वितीयं यत्परं ब्रह्म सनातनम्। गीयमानं च वेदान्तैस्तस्मान्नास्ति परं द्विज ॥
(ना० पूर्व० ३३ । ६०-६२)

२. एक एव परानन्दो निर्गुणः परतः परः। भाति विज्ञानभेदेन बहुरूपधरोऽव्ययः ॥
मायिनो मायया भेदं पश्यन्ति परमात्मनि। तस्मान्मायां त्यजेद्योगान्मुमुक्षुर्द्विजसत्तम ॥
नासद्रूपा न सद्रूपा माया नैवोभयात्मिका। अनिर्वाच्या ततो ज्ञेया भेदबुद्धिप्रदायिनी ॥
मायैवाज्ञानशब्देन बुद्ध्यते मुनिसत्तम। तस्मादज्ञानविच्छेदो भवेद्वै जितमायिनाम् ॥
(ना० पूर्व० ३३ । ६७-७०)