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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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चलते हो?' राजाके बार-बार ऐसे वचन सुनकर पालकी ढोनेवाले कहारोंने जडभरतकी ओर संकेत करके कहा—'यही धीरे-धीरे चलता है।'

राजाने पूछा—अरे! क्या तू थक गया? अभी तो थोड़ी ही दूरतक तूने मेरी पालकी ढोयी है। क्या तुझसे यह परिश्रम सहन नहीं होता? वैसे तो तू बड़ा मोटा-ताजा दिखायी देता है।

ब्राह्मणने कहा—राजन्! न मैं मोटा हूँ और न मैंने आपकी पालकी ही ढोयी है। न तो मैं थका हूँ और न मुझे कोई परिश्रम ही होता है। इस पालकीको ढोनेवाला कोई दूसरा ही है।

राजा बोले—मोटा तो तू प्रत्यक्ष दिखायी देता है और पालकी तेरे ऊपर अब भी मौजूद है और बोझ ढोनेमें देहधारियोंको परिश्रम तो होता ही है।

ब्राह्मणने कहा—राजन्! इस विषयमें मेरी बात सुनो। 'सबसे नीचे पृथ्वी है, पृथ्वीपर दो पैर हैं, दोनों पैरोंपर दो जङ्घे हैं, उन जङ्घोंपर दो ऊरु हैं तथा उनके ऊपर उदर है। फिर उदरके ऊपर छाती, भुजाएँ और कंधे हैं और कंधोंपर यह पालकी रखी गयी है। ऐसी दशामें मेरे ऊपर भार कैसे रहा? पालकीमें भी जिसे तुम्हारा कहा जाता है, वह शरीर रखा हुआ है। राजन्! मैं तुम और अन्य सब जीव पञ्चभूतोंद्वारा ही ढोये जाते हैं तथा यह भूतवर्ग भी गुणोंके प्रवाहमें पड़कर ही बहा जा रहा है। पृथ्वीपते! ये सत्त्व आदि गुण भी कर्मोंके वशीभूत हैं और वह कर्म समस्त जीवोंमें अविद्याद्वारा ही संचित है। आत्मा तो शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण और प्रकृतिसे परे है। वह एक ही सम्पूर्ण जीवोंमें व्याप्त है। उसकी वृद्धि अथवा ह्रास कभी नहीं होता। जब आत्मामें न तो वृद्धि होती है और न ह्रास ही, तब तुमने किस युक्तिसे यह बात कही है कि तू मोटा है। यदि क्रमशः पृथ्वी, पैर, जङ्घा, ऊरु, कटि तथा उदर आदि अङ्गोंपर स्थित हुए कंधेके ऊपर रखी हुई यह शिबिका मेरे लिये भाररूप हो सकती है तो उसी प्रकार तुम्हारे लिये भी तो हो सकती है। राजन्! इस युक्तिसे तो अन्य समस्त जीवोंने भी न केवल पालकी उठा रखी है, बल्कि सम्पूर्ण पर्वत, वृक्ष, गृह और पृथ्वी आदिका भार भी अपने ऊपर ले रखा है। राजन्! जिस द्रव्यसे यह पालकी बनी हुई है, उसीसे यह तुम्हारा, मेरा अथवा अन्य सबका शरीर भी बना है, जिसमें सबने ममता बढ़ा रखी है।

सनन्दनजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे ब्राह्मणदेवता कंधेपर पालकी लिये मौन हो गये। तब राजाने भी तुरंत पृथ्वीपर उतरकर उनके दोनों चरण पकड़ लिये।

राजाने कहा—हे विप्रवर! यह पालकी छोड़कर आप मेरे ऊपर कृपा कीजिये और बताइये, यह छद्मवेश धारण किये हुए आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं? अथवा आपके यहाँ आगमनका क्या कारण है? यह सब आप मुझसे कहिये।

ब्राह्मण बोले—भूपाल! सुनो—मैं कौन हूँ, यह बात बतायी नहीं जा सकती और तुमने जो यहाँ आनेका कारण पूछा, उसके उत्तरमें यह निवेदन है कि कहीं भी आने-जानेका कर्म कर्मफलके उपभोगके लिये ही हुआ करता है। धर्माधर्मजनित सुख-दुःखोंका उपभोग करनेके लिये ही जीव देह आदि धारण करता है। भूपाल! सब जीवोंकी सम्पूर्ण अवस्थाओंके कारण केवल उनके धर्म और अधर्म ही हैं।

राजाने कहा—इसमें संदेह नहीं कि सब कर्मोंके धर्म और अधर्म ही कारण हैं और कर्मफलके उपभोगके लिये एक देहसे दूसरी

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देहमें जाना होता है, किंतु आपने जो यह कहा कि 'मैं कौन हूँ' यह बात बतायी नहीं जा सकती, इसी बातको सुननेकी मुझे इच्छा हो रही है।

ब्राह्मण बोले— राजन्! 'अहं' शब्दका उच्चारण जिह्वा, दन्त, ओठ और तालु ही करते हैं, किंतु ये सब 'अहं' नहीं हैं; क्योंकि ये सब उस शब्दके उच्चारणमात्रमें हेतु हैं। तो क्या इन जिह्वा आदि कारणोंके द्वारा यह वाणी ही स्वयं अपनेको 'अहं' कहती है? नहीं; अतः ऐसी स्थितिमें 'तू मोटा है' ऐसा कहना कदापि उचित नहीं। राजन्! सिर और हाथ-पैर आदि लक्षणोंवाला यह शरीर आत्मासे पृथक् ही है; अतः इस 'अहं' शब्दका प्रयोग मैं कहाँ और किसके लिये करूँ? नृपश्रेष्ठ! यदि मुझसे भिन्न कोई और भी सजातीय आत्मा हो तो भी 'यह मैं हूँ और यह अन्य है'—ऐसा कहना उचित हो सकता था। जब सम्पूर्ण शरीरोंमें एक ही आत्मा विराजमान है, तब 'आप कौन हैं और मैं कौन हूँ' इत्यादि प्रश्नवाक्य व्यर्थ ही हैं। नरेश! 'तुम राजा हो, यह पालकी है और ये सामने पालकी ढोनेवाले खड़े हैं तथा यह जगत् आपके अधिकारमें है'—ऐसा जो कहा जाता है, वह वास्तवमें सत्य नहीं है। वृक्षसे लकड़ी पैदा हुई और उससे यह पालकी बनी, जिसपर तुम बैठते हो। यदि इसे पालकी ही कहा जाय तो इसका 'वृक्ष' नाम अथवा 'लकड़ी' नाम कहाँ चला गया? यह तुम्हारे सेवकगण ऐसा नहीं कहते कि महाराज पेड़पर चढ़े हुए हैं और न कोई तुम्हें लकड़ीपर ही चढ़ा हुआ बतलाता है। सब लोग पालकीमें ही बैठा हुआ बतलाते हैं; किंतु पालकी क्या है—लकड़ियोंका समुदाय। वही अपने लिये एक विशेष नामका आश्रय लेकर स्थित है। नृपश्रेष्ठ! इसमेंसे लकड़ियोंके समूहको अलग कर दो और फिर खोजो—तुम्हारी पालकी कहाँ है? इसी प्रकार छातेकी शलाकाओं-(तिल्लियों-) को पृथक् करके विचार करो, छाता नामकी वस्तु कहाँ चली गयी? यही न्याय तुम्हारे और मेरे ऊपर लागू होता है (अर्थात् मेरे और तुम्हारे शरीर भी पञ्चभूतसे अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं हैं)। पुरुष, स्त्री, गाय, बकरी, घोड़ा, हाथी, पक्षी और वृक्ष आदि लौकिक नाम कर्मजनित विभिन्न शरीरोंके लिये ही रखे गये हैं—ऐसा जानना चाहिये। भूपाल! आत्मा न देवता है, न मनुष्य है, न पशु है और न वृक्ष ही है। ये सब तो शरीरोंकी आकृतियोंके भेद हैं, जो भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार उत्पन्न हुए हैं। राजन्! लोकमें जो राजा, राजाके सिपाही तथा और भी जो-जो ऐसी वस्तुएँ हैं, वे सब काल्पनिक हैं, सत्य नहीं हैं। नरेश! जो वस्तु परिणाम आदिके कारण होनेवाली किसी नयी संज्ञाको कालान्तरमें भी नहीं प्राप्त होती, वही पारमार्थिक वस्तु है। विचार करो, वह क्या है? तुम समस्त प्रजाके लिये राजा हो, अपने पिताके पुत्र हो, शत्रुके लिये शत्रु हो, पत्नीके लिये पति और पुत्रके लिये पिता हो। भूपाल! बताओ, मैं तुम्हें क्या कहूँ? महीपते! तुम क्या हो? यह सिर हो या ग्रीवा अथवा पेट या पैर आदिमेंसे कोई हो तथा ये सिर आदि भी तुम्हारे क्या हैं? पृथ्वीपते! तुम सम्पूर्ण अवयवोंसे पृथक् स्थित होकर भलीभाँति विचार करो कि मैं कौन हूँ। नरेश! आत्म-तत्त्व जब इस प्रकार स्थित है, जब सबसे पृथक् करके ही उसका प्रतिपादन किया जा सकता है, तो मैं उसे 'अहं' इस नामसे कैसे बता सकता हूँ?