संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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विष्णुका यजन किया। वे सदा भगवान्का ही चिन्तन करते और उन्हींमें मन लगाकर नाना सत्कर्मोंमें लगे रहते थे। तदनन्तर पुत्रोंको जन्म देकर विद्वान् राजा भरत विषयोंसे विरक्त हो गये और राज्य त्यागकर पुलस्त्य एवं पुलह मुनिके आश्रमको चले गये। उन महर्षियोंका आश्रम शालग्राम नामक महाक्षेत्रमें था। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले बहुत-से साधक उस तीर्थका सेवन करते थे। मुने! वहीं राजा भरत तपस्यामें संलग्न हो यथाशक्ति पूजनसामग्री जुटाकर उसके द्वारा भक्तिभावसे भगवान् महाविष्णुकी आराधना करने लगे। नारदजी! वे प्रतिदिन प्रातःकाल निर्मल जलमें स्नान करते तथा अविनाशी परब्रह्मकी स्तुति एवं प्रणवसहित वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए भक्तिपूर्वक सूर्यदेवका उपस्थान करते थे। तदनन्तर आश्रमपर लौटते और अपने ही लाये हुए समिधा, कुशा तथा मिट्टी आदि द्रव्योंसे और फल, फूल, तुलसीदल एवं स्वच्छ जलसे एकाग्रतापूर्वक जगदीश्वर भगवान् वासुदेवकी पूजा करते थे। भगवान्की पूजाके समय वे भक्तिके प्रवाहमें डूब जाते थे।
एक दिनकी बात है, महाभाग राजा भरत प्रातःकाल स्नान करके एकाग्रचित्त हो जप करते हुए तीन मुहूर्त (छः घड़ी)-तक शालग्रामीके जलमें खड़े रहे। ब्रह्मन्! इसी समय एक प्यासी हरिणी जल पीनेके लिये अकेली ही वनसे नदीके तटपर आयी। उसका प्रसवकाल निकट था। वह प्रायः जल पी चुकी थी, इतनेमें ही सब प्राणियोंको भय देनेवाली सिंहकी गर्जना उच्चस्वरसे सुनायी पड़ी। फिर तो वह उस सिंहनादसे भयभीत हो नदीके तटकी ओर उछल पड़ी। बहुत ऊँचाईकी ओर उछलनेसे उसका गर्भ नदीमें ही गिर पड़ा और तरङ्गमालाओंमें डूबता-उतराता हुआ वेगसे बहने लगा। राजा भरतने गर्भसे गिरे हुए उस मृगके बच्चेको दयावश उठा लिया। मुनीश्वर! उधर वह हरिणी गर्भ गिरनेके अत्यन्त दुःखसे और बहुत ऊँचे चढ़नेके परिश्रमसे थककर एक स्थानपर गिर पड़ी और वहीं मर गयी। उस हरिणीको मरी हुई देख तपस्वी राजा भरत मृगके बच्चेको लिये हुए अपने आश्रमपर आये और प्रतिदिन उसका पालन-पोषण करने लगे। मुने! उनसे पोषित होकर वह मृगका बच्चा बढ़ने लगा। उस मृगमें राजाका चित्त जैसा आसक्त हो गया था, वैसा भगवान्में भी नहीं हुआ। उन्होंने अपने राज्य और पुत्रोंको छोड़ा, समस्त भाई-बन्धुओंको भी त्याग दिया, परंतु इस हरिनके बच्चेमें ममता पैदा कर ली। उनका चित्त मृगकी ममताके वशीभूत हो गया था; इसलिये उनकी समाधि भङ्ग हो गयी। तदनन्तर कुछ समय बीतनेपर राजा भरत मृत्युको प्राप्त हुए। उस समय जैसे पुत्र पिताको देखता है, उसी प्रकार वह मृगका बच्चा आँसू बहाते हुए उनकी ओर देख रहा था। राजा भी प्राणोंका त्याग करते समय उस मृगकी ही
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ओर देख रहे थे। द्विजश्रेष्ठ! मृगकी भावना करनेके कारण राजा भरत दूसरे जन्ममें मृग हो गये। किंतु पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होनेसे उनके मनमें संसारकी ओरसे वैराग्य हो गया। वे अपनी माँको त्यागकर पुनः शालग्राम-तीर्थमें आये और सूखे घास तथा सूखे पत्ते खाकर शरीरका पोषण करने लगे। ऐसा करनेसे मृगशरीरकी प्राप्ति करानेवाले कर्मका प्रायश्चित्त हो गया; अतः वहीं अपने शरीरका त्याग करके वे जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाले) ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न हुए। सदाचारी योगियोंके श्रेष्ठ एवं शुद्ध कुलमें उनका जन्म हुआ। वे सम्पूर्ण विज्ञानसे सम्पन्न तथा समस्त शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ हुए।
मुनिश्रेष्ठ! उन्होंने आत्माको प्रकृतिसे परे देखा। महामुने! वे आत्मज्ञानसम्पन्न होनेके कारण देवता आदि सम्पूर्ण भूतोंको अपनेसे अभिन्न देखते थे। उपनयनसंस्कार हो जानेपर वे गुरुके पढ़ाये हुए वेद-शास्त्रका अध्ययन नहीं करते थे। किन्हीं वैदिक कर्मोंकी ओर ध्यान नहीं देते और न शास्त्रोंका उपदेश ही ग्रहण करते थे। जब कोई उनसे बहुत पूछ-ताछ करता तो वे जडके समान गँवारोंकी-सी बोलीमें कोई बात कह देते थे। उनका शरीर मैला-कुचैला होनेसे निन्दित प्रतीत होता था। मुने! वे सदा मलिन वस्त्र पहना करते थे। इन सब कारणोंसे वहाँके समस्त नागरिक उनका अपमान किया करते थे। सम्मान योगसम्पत्तिकी अधिक हानि करता है और दूसरे लोगोंसे अपमानित होनेवाला योगी योगमार्गमें शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है—ऐसा विचार करके वे परम बुद्धिमान् ब्राह्मण जन-साधारणमें अपने-आपको जड और उन्मत्त-सा ही प्रकट करते थे, भीगे हुए चने और उड़द, बड़े, साग, जंगली फल और अन्नके दाने आदि जो-जो सामयिक खाद्य वस्तु मिल जाती, उसीको बहुत मानकर खा लेते थे। पिताकी मृत्यु होनेपर भाई-भतीजे और बन्धु-बान्धवोंने उनसे खेतीबारीका काम कराना आरम्भ किया। उन्हींके दिये हुए सड़े-गले अन्नसे उनके शरीरका पोषण होने लगा। उनका एक-एक अङ्ग बैलके समान मोटा था और काम-काजमें वे जडकी भाँति जुते रहते थे। भोजनमात्र ही उनका वेतन था; इसलिये सब लोग उनसे अपना काम निकाल लिया करते थे।
ब्रह्मन्! एक समय सौवीर-राजने शिबिकापर आरूढ हो इक्षुमती नदीके किनारे महर्षि कपिलके श्रेष्ठ आश्रमपर जानेका निश्चय किया था। वे मोक्षधर्मके ज्ञाता महामुनि कपिलसे यह पूछना चाहते थे कि इस दुःखमय संसारमें मनुष्योंके लिये कल्याणकारी साधन क्या है? उस दिन राजाकी बेगारमें बहुत-से दूसरे मनुष्य भी पकड़े गये थे। उन्हींके बीच भरतमुनि भी बेगारमें पकड़कर लाये गये। नारदजी! वे सम्पूर्ण ज्ञानके एकमात्र भाजन थे। उन्हें पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था; अतः वे अपने पापमय प्रारब्धका क्षय करनेके लिये उस शिबिकाको कंधेपर उठाकर ढोने लगे। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जडभरतजी (क्षुद्र जीवोंको बचानेके लिये) चार हाथ आगेकी भूमि देखते हुए मन्दगतिसे चलने लगे; किंतु उनके सिवा दूसरे कहार जल्दी-जल्दी चल रहे थे। राजाने देखा कि पालकी समान गतिसे नहीं चल रही है, तो उन्होंने कहा—'अरे पालकी ढोनेवाले कहारो! यह क्या करते हो? सब लोग एक साथ समान गतिसे चलो।' किंतु इतना कहनेपर भी जब शिबिकाकी गति पुनः वैसी ही विषम दिखायी दी, तब राजाने डाँटकर पूछा—'अरे! यह क्या है? तुमलोग मेरी आज्ञाके विपरीत