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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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हुआ वस्त्र, शङ्ख, श्वेत बैल, ध्वजा, सौभाग्यवती स्त्री, भरा हुआ कलश, रत्न (हीरा, मोती आदि), भृङ्गार (गडुवा), गौ, ब्राह्मण, नगाड़ा, मृदङ्ग, दुन्दुभि, घण्टा तथा वीणा (बाँसुरी) आदि वाद्योंके शब्द, वेदमन्त्र एवं मङ्गल गीत आदिके शब्द—ये सब यात्राके समय यदि देखने या सुननेमें आवें तो यात्रा करनेवाले लोगोंके सब कार्य सिद्ध करते हैं॥७०६-७०९॥

(अपशकुन-परिहार—) यात्राके समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खड़ा होकर इष्टदेवका स्मरण करके फिर चले। दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा (वस्त्र, द्रव्य आदिसे उनका सत्कार) करके चले। यदि तीसरी बार अपशकुन हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये॥७१०॥

(छींकके फल—) यात्राके समय सभी दिशाओंकी छींक निन्दित है। गौकी छींक घातक होती है, किंतु बालक, वृद्ध, रोगी या कफवाले मनुष्यकी छींक निष्फल होती है॥७११॥

परस्त्रियोंका स्पर्श करनेवाला तथा ब्राह्मण और देवताके धनका अपहरण करनेवाला तथा अपने छोड़े हुए हाथी और घोड़ेको बाँध लेनेवाला, शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले; परंतु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्योंपर कदापि हाथ न उठावे॥७१२॥

(गृह-प्रवेश—) नये घरमें प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायणके शुभ मुहूर्तमें करे। पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा और बलि (नैवेद्य) अर्पण करके गृहमें प्रवेश करना चाहिये॥७१३॥

(गृह-प्रवेशमें विहित मास—) माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ—इन चार मासोंमें गृहप्रवेश श्रेष्ठ होता है। तथा अगहन और कार्तिक इन दो मासोंमें मध्यम होता है।

(विहित नक्षत्र—) मृगशिरा, पुष्य, रेवती, शतभिषा, चित्रा, अनुराधा और स्थिर-संज्ञक (तीनों उत्तरा और रोहिणी) नक्षत्रोंमें बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मङ्गलको छोड़कर अन्य वारोंमें रिक्ता (४, ९, १४) तथा अमावास्या छोड़कर अन्य तिथियोंमें दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्द्रबल और ताराबलसहित उपद्रवरहित दिनके पूर्वाह्न भागमें स्थिर राशिके नवमांशयुक्त स्थिर लग्नमें जब लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो, शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्रमें हों, पापग्रह ३, ६, ११ भावोंमें हों और चन्द्रमा लग्न, १२, ८, ६ इनसे भिन्न स्थानोंमें हों, तब गृह-प्रवेश करनेवाले यजमानकी जन्मराशि, जन्मलग्न या इन दोनोंसे उपचय (३, ६, १०, ११ वीं) राशिके गृह-प्रवेश लग्नमें विद्यमान होनेपर सब प्रकारके सुख और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। अन्यथा इससे विपरीत समयमें गृह-प्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है॥७१४-७१९॥

(प्रवेश-विधि—) जिस नूतन गृहमें प्रवेश करना हो, उसको चित्र आदिसे सजाकर तथा पुष्प-तोरण आदिसे अलंकृत करके वेद-ध्वनि, शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियोंके माङ्गलिक गीत तथा वाद्य आदिके शब्दोंके साथ सूर्यको वाम भागमें रखकर जलसे भरे हुए कलशको आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिये॥७२०॥

(वृष्टि-विचार—) वर्षा-प्रवेश (आर्द्रा नक्षत्रमें सूर्यके प्रवेश)-के समय यदि शुक्लपक्ष हो, चन्द्रमा जलचर राशिमें या लग्नसे केन्द्र (१, ४, ७, १०)-में स्थित होकर शुभग्रहसे देखे जाते हों तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय चन्द्रमापर पापग्रहकी दृष्टि हो तो दीर्घकालमें अल्पवृष्टि समझनी चाहिये। (इससे सिद्ध होता है कि यदि चन्द्रमापर पाप और शुभ दोनों ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है।) जिस प्रकार चन्द्रमासे फल कहा गया है, उसी प्रकार उस समय शुक्रसे भी समझना चाहिये। (अर्थात् सूर्यके आर्द्रा-प्रवेशके समय चन्द्रमा और शुक्र

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दोनोंकी स्थिति देखकर तारतम्यसे फल समझना चाहिये॥ ७२१-७२२॥

वर्षाकालमें आर्द्रासे स्वातीतक सूर्यके रहनेपर चन्द्रमा यदि शुक्रसे सप्तम स्थानमें अथवा शनिसे पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थानमें हो, उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि पड़े तो उस समय अवश्य वर्षा होती है॥ ७२३॥

यदि बुध और शुक्र समीपवर्ती (एक राशिमें स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किंतु उन दोनों (बुध और शुक्र)-के बीचमें सूर्य हों तो वृष्टिका अभाव होता है॥ ७२४॥

यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रोंमें शुक्र पूर्व दिशामें उदित हों और स्वातीसे तीन नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा)-में शुक्र पश्चिम दिशामें उदित हों तो निश्चय ही वर्षा होती है। इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिये॥ ७२५॥

यदि सूर्यके समीप (एक राशिके भीतर होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड़ते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं; किंतु उनकी गति वक्र न हुई हो तभी ऐसा होता है॥ ७२६॥

दक्षिण गोल (तुलासे मीनतक)-में शुक्र यदि सूर्यसे वाम भागमें पड़े तो वृष्टिकारक होता है। उदय या अस्तके समय यदि आर्द्रांमें सूर्यका प्रवेश हो तो भी वर्षा होती है॥ ७२७॥

यदि सूर्यका आर्द्रा-प्रवेश सन्ध्याके समय हो तो शस्य (धान)-की वृद्धि होती है। यदि रात्रिमें हो तो मनुष्योंको सब प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त होती है। यदि प्रवेशकालमें चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं शुक्रसे आर्द्रा भेदित हो तो क्रमशः अल्पवृष्टि, धान्य-हानि, अनावृष्टि और धान्य-वृद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है। यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र प्रवेश-लग्नसे केन्द्रमें पड़ते हों तो ईति (खेतीके टिड्डी आदि सब उपद्रव)-का नाश होता है॥ ७२८-७२९॥

यदि सूर्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्रमें प्रवेशके समय मेघोंसे आच्छन्न हों तो आर्द्रासे मूलतक प्रतिदिन वर्षा होती है॥ ७३०॥

यदि रेवतीमें सूर्यके प्रवेश करते समय वर्षा हो जाय तो उससे दस नक्षत्र (रेवतीसे आश्लेषा)-तक वर्षा नहीं होती है। सिंह-प्रवेशमें लग्न यदि मङ्गलसे भिन्न (भेदित) हो, कर्क-प्रवेशमें अभिन्न हो एवं कन्या-प्रवेशमें भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है॥ ७३१½॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य, रेवती परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है। अश्विनीको सर्वधान्योंका नाशक नक्षत्र कहा गया है। वर्षाकाल (चातुर्मास्य)-में पश्चिम उदित हुए शुक्र यदि गुरुसे सप्तम राशिमें निर्बल हों तो आर्द्रासे सात नक्षत्रतक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है। चन्द्रमण्डलमें परिवेष (घेरा) हो और उत्तर दिशामें बिजली दीख पड़े या मेढकोंके शब्द सुनायी पड़ें तो निश्चय ही वर्षा होती है। पश्चिम भागमें लटका हुआ मेघ यदि आकाशके बीचमें होकर दक्षिण दिशामें जाय तो शीघ्र वर्षा होती है। बिलाव अपने नाखूनोंसे धरतीको खोदे, लोहे (तथा ताँबे और कांसी आदि)-में मल जमने लगे अथवा बहुत-से बालक मिलकर सड़कोंपर पुल बाँधें तो ये वर्षाके सूचक चिह्न हैं।

चींटीकी पङ्क्ति छिन्न-भिन्न हो जाय, आकाशमें बहुतेरे जुगनू दीख पड़ें तथा सर्पोंका वृक्षपर चढ़ना और प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब दुर्भिक्ष-सूचक हैं।

उदय या अस्त-समयमें यदि सूर्य या चन्द्रमाका रंग बदला हुआ जान पड़े या उनकी कान्ति मधुके समान दीख पड़े तथा बड़े जोरकी हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होती है॥ ७३२-७३८½॥

(पृथ्वीके आधार कूर्मके अङ्ग-विभाग-)

कूर्मदेवता पूर्वकी ओर मुख करके स्थित हैं, उनके नव अङ्गोंमें इस भारत भूमिके नौ विभाग