संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३६३
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३६३
अपने अधिशत्रु-गृहमें या उसके किसी अंशमें स्थित हों तो ब्रह्मचर्यव्रत (यज्ञोपवीत) ग्रहण करनेवाला द्विज महापातकी होता है। गुरु, शुक्र एवं अपनी शाखाके अधिपति ग्रह यदि अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंशमें हों, अपनी राशि या उसके किसी अंशमें हों अथवा केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९)-में स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत लेनेवाला ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान् तथा वेद-वेदाङ्गोंका पारङ्गत विद्वान् होता है॥ ३६१-३६४॥ यदि गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थानमें हों और मृत्यु (आठवाँ) स्थान शुद्ध हो तो उस समय ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करनेवाला द्विज वेद-शास्त्रमें 'निष्णात' होता है॥ ३६५॥ गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति यदि अपने अधिमित्रगृहमें या उसके उच्च गृहमें अथवा उसके अंशमें स्थित हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धनसे सम्पन्न होता है॥ ३६६॥ शाखाधिपतिका दिन हो, बालकको शाखाधिपतिका बल प्राप्त हो तथा शाखाधिपतिका ही लग्न हो—ये तीन बातें उपनयन-संस्कारमें दुर्लभ हैं॥ ३६७॥ उसके चतुर्थांशमें चन्द्रमा हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाला बालक विद्यामें निपुण होता है; किंतु यदि वह पापग्रहके अंशमें अथवा अपने अंशमें हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा दरिद्र और दुःखी रहता है॥ ३६८॥ जब श्रवणादि नक्षत्रमें विद्यमान चन्द्रमा कर्कके अंश-विशेषमें स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करनेवाला द्विज वेद, शास्त्र तथा धन-धान्य-समृद्धिसे सम्पन्न होता है॥ ३६९॥ शुभ लग्न हो, शुभग्रहका अंश चल रहा हो, मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग्न और मृत्यु-स्थान शुभग्रहोंसे संयुक्त हो अथवा उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टि हो, अभीष्ट स्थानमें स्थित बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा आदि पाँच बलवान् ग्रहोंसे लग्नस्थान संयुक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदिके बलसे पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहोंद्वारा लग्नस्थान देखा जाता हो और वह इक्कीस महादोषोंसे रहित हो तो यज्ञोपवीत लेना शुभ है। शुभग्रहोंसे संयुक्त या दृष्ट सभी राशियाँ शुभ हैं॥ ३७०-३७२॥ वे शुभ राशियाँ शुभ ग्रहके नवांशमें हों तो व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत)-में ग्राह्य हैं, किंतु कर्कराशिका अंश शुभ ग्रहसे युक्त तथा दृष्ट हो तो भी कभी ग्रहण करने योग्य नहीं है॥ ३७३॥ इसलिये वृष और मिथुनके अंश तथा तुला और कन्याके अंश शुभ हैं। इस प्रकार लग्नगत नवांश होनेपर व्रतबन्ध उत्तम बताया गया है॥ ३७४॥ तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थानमें पापग्रह हों, छठा, आठवाँ और बारहवाँ स्थान शुभग्रहसे खाली हो और चन्द्रमा छठे, आठवें, लग्न तथा बारहवें स्थानमें न हों तो उपनयन शुभ होता है॥ ३७५॥ चन्द्रमा अपने उच्च स्थानमें होकर भी यदि व्रती पुरुषके व्रतबन्ध-मुहूर्त-सम्बन्धी लग्नमें स्थित हो तो वह उस बालकको निर्धन और क्षयका रोगी बना देता है॥ ३७६॥ यदि सूर्य केन्द्रस्थानमें प्रकाशित हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाले बालकोंके पिताका नाश हो जाता है। पाँच दोषोंसे रहित लग्न उपनयनमें शुभदायक होता है॥ ३७७॥ वसन्त-ऋतुके सिवा और कभी कृष्णपक्षमें, गलग्रहमें, अनध्यायके दिन, भद्रामें तथा षष्ठीको बालकका उपनयन-संस्कार नहीं होना चाहिये॥ ३७८॥ त्रयोदशीसे लेकर चार, सप्तमीसे लेकर तीन दिन और चतुर्थी ये आठ गलग्रह अशुभ कहे गये हैं॥ ३७९॥
(क्षुरिका-बन्धनकर्म—) अब मैं क्षत्रियोंके लिये क्षुरिका-बन्धन कर्मका वर्णन करूँगा, जो विवाहके पहले सम्पन्न होता है। विवाहके लिये कहे हुए मासोंमें, शुक्लपक्षमें, जबकि बृहस्पति, शुक्र और मङ्गल अस्त न हों, चन्द्रमा और ताराका बल प्राप्त हो, उस समय मौञ्जीबन्धनके लिये बतायी हुई तिथियोंमें, मङ्गलवारको छोड़कर शेष सभी दिनोंमें यह कर्म किया जाता है। कर्ताका लग्नगत नवांश यदि अष्टमोदयसे रहित न हो, अष्टम शुद्ध हो; चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवेंमें
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न होकर लग्नमें स्थित हों; शुभग्रह दूसरे, पाँचवें, नवें, लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानोंमें हों; पापग्रह तीसरे, ग्यारहवें और छठे स्थानमें हों तो देवताओं और पितरोंकी पूजा करके क्षुरिका-बन्धनकर्म करना चाहिये ॥ ३८०-३८३ ॥ पहले देवताओंके समीप क्षुरिका (कटार)-की भलीभाँति पूजा करे। तत्पश्चात् शुभ लक्षणोंसे युक्त उस क्षुरिकाको उत्तम लग्नमें अपनी कटिमें बाँधे ॥ ३८४ ॥ क्षुरिकाकी लम्बाईके आधे (मध्यभाग) पर जो विस्तारमान हो उससे क्षुरिकाके विभाग करे। वे छेदखण्ड (विभाग) क्रमसे ध्वज आदि आय कहलाते हैं। उनकी आठ संज्ञाएँ हैं-ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वा, वृष, गर्दभ, गज और ध्वाङ्क्ष। ध्वज नामक आयमें शत्रु का नाश होता है ॥ ३८५ ॥ धूम्र आयमें घात, सिंह नामक आयमें जय, श्वा (कुत्ता) नामक आयमें रोग, वृष आयमें धनलाभ, गर्दभ आयमें अत्यन्त दुःखकी प्राप्ति, गज आयमें अत्यन्त प्रसन्नता और ध्वाङ्क्ष नामक आयमें धनका नाश होता है। खड्ग और छुरीके मापको अपने अङ्गुलसे गिने ॥ ३८६-३८७ ॥ मापके अङ्गुलोंमेंसे ग्यारहसे अधिक हो तो ग्यारह घटा दे। फिर शेष अङ्गुलोंके क्रमशः फल इस प्रकार हैं ॥ ३८८ ॥ पुत्र-लाभ, शत्रुवध, स्त्रीलाभ, शुभगमन, अर्थहानि, अर्थवृद्धि, प्रीति, सिद्धि, जय और स्तुति ॥ ३८९ ॥
छुरी या तलवारमें यदि ध्वज अथवा वृष आय-विभागके पूर्वभाग* में नष्ट (भङ्ग) हो, तथा सिंह और गज-आयके मध्यभागमें तथा कुक्कुर और काक-आयके अन्तिम भागमें एवं धूम्र और गर्दभ आयके अन्तिम भागमें नष्ट हो जाय तो शुभ नहीं होता है। (अतः ऐसी छुरी या तलवारका परित्याग कर देना चाहिये; यह बात अर्थतः सिद्ध होती है) ॥ ३९० १/२ ॥
(समावर्तन-) उत्तरायणमें जब गुरु और शुक्र दोनों उदित हों, चित्रा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, श्रवण, अनुराधा, रोहिणी-ये नक्षत्र हों तथा रवि, सोम, बुध, गुरु और शुक्रवारमेंसे कोई वार हो तो इन्हीं रवि आदि पाँच ग्रहोंकी राशि, लग्न और नवमांशमें, प्रतिपदा, पर्व, रिक्ता, अमावास्या, तथा सप्तमीसे तीन तिथि-इन सब तिथियोंको छोड़कर अन्य तिथियोंमें गुरुकुलसे अध्ययन समाप्त करके घरको लौटनेवाले जितेन्द्रिय द्विजकुमारका समावर्तन-संस्कार (मुण्डन-हवन आदि) करना चाहिये ॥ ३९१-३९३ १/२ ॥
(विवाहकथन-) विप्रवर! सब आश्रमोंमें यह गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है। उसमें भी जब सुशीला धर्मपत्नी प्राप्त हो तभी सुख होता है। स्त्रीको सुशीलताकी प्राप्ति तभी होती है, जब विवाहकालिक लग्न शुभ हो। इसलिये मैं साक्षात् ब्रह्माजीद्वारा कथित लग्न-शुद्धिको विचार करके कहता हूँ ॥ ३९४-३९५ १/२ ॥
प्रथमतः कन्यादान करनेवालोंको चाहिये कि वे किसी शुभ दिनको अपनी अञ्जलिमें पान, फूल, फल और द्रव्य आदि लेकर ज्योतिषशास्त्रके ज्ञाता समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, प्रसन्नचित्त तथा सुखपूर्वक बैठे हुए विद्वान् ब्राह्मणके समीप जाय और उन्हें देवताके समान मानकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपनी कन्याके विवाह-लग्नके विषयमें पूछे ॥ ३९६-३९७ ॥
(ज्योतिषीको चाहिये कि उस समय लग्न और ग्रह स्पष्ट करके देखे-) यदि प्रश्नलग्नमें पापग्रह हो या लग्नसे सप्तम भावमें मङ्गल हो तो जिसके लिये प्रश्न किया गया है, उस कन्या और वरको ८ वर्षके भीतर ही घातक अरिष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिये। यदि लग्नमें चन्द्रमा और उससे सप्तम भावमें मङ्गल हो तो ८ वर्षके भीतर ही उस कन्याके पतिको घातक कष्ट प्राप्त होगा-ऐसा समझे। यदि लग्नसे पञ्चम भावमें
* छुरी या तलवारकी मुट्ठीकी ओर पूर्व और अग्रकी ओर अन्त समझना चाहिये।