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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३३७

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३३७

एक शेष हो तो शुक्लपक्ष और दो शेष हो तो कृष्णपक्ष समझे। इसमें भी ९ जोड़ या घटाकर ग्रहण करना चाहिये। अर्थात् गुणनफलमें ९ जोड़ या ९ घटाकर भाग देना चाहिये। इसी प्रकार पक्षज्ञान होनेपर गुणनफलमें ही १५ से भाग देकर शेषके अनुसार प्रतिपदा आदि तिथि समझे तथा अहोरात्र जानना हो तो ध्रुवपिण्डको ७ से गुणा करके दोसे भाग देकर एक शेष हो तो दिन और दो शेष हो तो रात्रि समझे। लग्न-नवांश, इष्ट-घड़ी तथा होरा जानना हो तो ध्रुवपिण्डको ५ से गुणा करके अपने-अपने विकल्पसे (अर्थात् लग्न जाननेके लिये १२से, इष्ट घड़ी¹ जाननेके लिये ६० से (अथवा दिन या रात्रिका ज्ञान होनेपर दिनमान या रात्रिमान-घटीसे), नवमांशके लिये ९ से तथा होराके लिये २ से भाग देकर शेषद्वारा सबका ज्ञान करना चाहिये। इस प्रकार जिनके जन्म-समय आदिका ज्ञान न हो उनके लिये इन सब बातोंका विचार करना चाहिये॥ ३४७-३५०॥

(द्रेष्काणका स्वरूप—) हाथमें फरसा लिये हुए काले रंगका पुरुष, जिसकी आँखें लाल हों और जो सब जीवोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो, मेषके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। प्याससे पीडित एक पैरसे चलनेवाला, घोड़ेके समान मुख, लाल वस्त्रधारी और घड़ेके समान आकार—यह मेषके द्वितीय द्रेष्काणका स्वरूप है। कपिलवर्ण, क्रूरदृष्टि, क्रूरस्वभाव, लाल वस्त्रधारी और अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाला—यह मेषके तृतीय द्रेष्काणका स्वरूप है। भूख और प्याससे पीड़ित, कटे-छँटे घुँघराले केश तथा दूधके समान धवल वस्त्र—यह वृषके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। मलिनशरीर, भूखसे पीडित, बकरेके समान मुख और कृषि आदि कार्योंमें कुशल—यह वृषके दूसरे द्रेष्काणका रूप है। हाथीके समान विशालकाय, शरभ²के समान पैर, पिङ्गल वर्ण और व्याकुल चित्त—यह वृषके तीसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। सुईसे सीने-पिरोनेका काम करनेवाली, रूपवती, सुशीला तथा संतानहीना नारी, जिसने हाथको ऊपर उठा रखा है, मिथुनका प्रथम द्रेष्काण है। कवच और धनुष धारण किये हुए उपवनमें क्रीडा करनेकी इच्छासे उपस्थित गरुडसदृश मुखवाला पुरुष मिथुनका दूसरा द्रेष्काण है। नृत्य आदिकी कलामें प्रवीण, वरुणके समान रत्नोंके अनन्त भण्डारसे भरा-पूरा,


१. जैसे—संवत् २०१० चैत्र शुक्ला ५ गुरुवारको अनुमानतः ३० वर्षकी अवस्थावाले किसी पुरुषने अपना अज्ञात जन्म-समय जाननेके लिये प्रश्न किया। उस समयकी लग्न-(वृष) राश्यादि १।५।२९ है और लग्नमें कोई ग्रह नहीं है तो लग्न-राश्यादिकी २१२९ कलाको वृषलग्नके गुणकाङ्क १० से गुणा करनेपर २१२९० यह ध्रुवपिण्ड हुआ। लग्नमें कोई ग्रह नहीं है, अतः दूसरा गुणक नहीं प्राप्त हुआ। अब प्रश्नकर्ताकी गत वर्ष-संख्या जाननेके लिये ध्रुवपिण्डको फिर १० से गुणा करके गुणनफल २१२९०० में १२० का भाग देनेसे शेष २० वर्ष-संख्या हुई; परंतु यह संख्या अनुमानसे कुछ न्यून है, अतः लग्नमें प्रथम द्रेष्काण होनेके कारण आगत शेषमें ९ जोड़नेसे २९ हुआ। यही सम्भावित वर्ष होनेके कारण प्रश्नकर्ताके जन्मसे गत वर्ष हुए। इस संख्याको वर्तमान संवत् २०१० में घटानेपर शेष १९८१ यह प्रश्नकर्ताका जन्म-संवत् हुआ। पुनः मास जाननेके लिये दशगुणित ध्रुवपिण्डमें ९ जोड़ा गया तो २१२९०९ हुआ। इसमें १२ का भाग देनेसे शेष ५ रहा। अतः चैत्रसे पाँचवाँ श्रावण जन्म-मास हुआ। पक्ष जाननेके लिये ध्रुवपिण्ड २१२९० को ८ से गुणा कर गुणनफल १७०३२० में ९ जोड़कर २ का भाग देनेसे १ शेष रहनेके कारण शुक्लपक्ष हुआ। तिथि जाननेके लिये उसी अष्टगुणित एवं नवयुत ध्रुवपिण्ड १७०३२९ में १५ का भाग देनेपर शेष ८ रहा, अतः चतुर्थी तिथि हुई। इष्ट घड़ी जाननेके लिये ध्रुवपिण्ड २१२९० को ५ से गुणाकर गुणनफलमें ९ जोड़कर योगफल १०६४५९ में ६० का भाग देनेपर शेष १९ रहा। वही इष्ट घड़ी हुई। इस प्रकार संवत् १९८१ श्रावण शुक्ला ४ की गतघटी १९ (घड़ी बीतनेपर) प्रश्नकर्ताका जन्म-समय निश्चित हुआ।

२. पुराणोंमें शरभके आठ पैर कहे गये हैं और उसे व्याघ्र-सिंहसे भी अधिक बलिष्ठ एवं भयङ्कर बताया गया है; परंतु यह अब कहीं उपलब्ध नहीं होता। शरभका दूसरा अर्थ ऊँट भी है।

३३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

धनुर्धर वीर पुरुष मिथुनका तीसरा द्रेष्काण है। गणेशजीके समान कण्ठ, शूकरके सदृश मुख, शरभके-से पैर और वनमें रहनेवाला—यह कर्कके प्रथम द्रेष्काणका रूप है। सिरपर सर्प धारण किये, पलाशकी शाखा पकड़कर रोती हुई कर्कशा स्त्री—यह कर्कके दूसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। चिपटा मुख, सर्पसे वेष्टित, स्त्रीकी खोजमें नौकापर बैठकर जलमें यात्रा करनेवाला पुरुष—यह कर्कके तीसरे द्रेष्काणका रूप है॥ ३५१-३५६॥ सेमलके वृक्षके नीचे गीदड़ और गीधको लेकर रोता हुआ कुत्ते-जैसा मनुष्य—यह सिंहके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। धनुष और कृष्ण मृगचर्म धारण किये, सिंह-सदृश पराक्रमी तथा घोड़ेके समान आकृतिवाला मनुष्य—यह सिंहके दूसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। फल और भोज्यपदार्थ रखनेवाला, लंबी दाढ़ीसे सुशोभित, भालू-जैसा मुख और वानरोंके-से चपल स्वभाववाला मनुष्य—सिंहके तृतीय द्रेष्काणका रूप है। फूलसे भरे कलशवाली, विद्याभिलाषिणी, मलिन वस्त्रधारिणी कुमारी कन्या—यह कन्या राशिके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। हाथमें धनुष, आय-व्ययका हिसाब रखनेवाला, श्याम-वर्ण शरीर, लेखनकार्यमें चतुर तथा रोएँसे भरा मनुष्य—यह कन्या राशिके दूसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। गोरे अङ्गोंपर धुले हुए स्वच्छ वस्त्र, ऊँचा कद, हाथमें कलश लेकर देवमन्दिरकी ओर जाती हुई स्त्री—यह कन्या राशिके तीसरे द्रेष्काणका परिचय है॥ ३५७-३५९॥ हाथमें तराजू और बटखरे लिये बाजारमें वस्तुएँ तौलनेवाला तथा बर्तन-भाँड़ोंकी कीमत कूतनेवाला पुरुष तुलाराशिका प्रथम द्रेष्काण है। हाथमें कलश लिये भूख-प्याससे व्याकुल तथा गीधके समान मुखवाला पुरुष, जो स्त्री-पुत्रके साथ विचरता है, तुलाका दूसरा द्रेष्काण है। हाथमें धनुष लिये हरिनका पीछा करनेवाला, किन्नरके समान चेष्टावाला, सुवर्णकवचधारी पुरुष तुलाका तृतीय द्रेष्काण है। एक नारी, जिसके पैर नाना प्रकारके सर्प लिपटे होनेसे श्वेत दिखायी देते हैं, समुद्रसे किनारेकी ओर जा रही है, यही वृश्चिकके प्रथम द्रेष्काणका रूप है। जिसके सब अङ्ग सर्पोंसे ढके हैं और आकृति कछुएके समान है तथा जो स्वामीके लिये सुखकी इच्छा करनेवाली है; ऐसी स्त्री वृश्चिकका दूसरा द्रेष्काण है। मलयगिरिका निवासी सिंह, मुखाकृति कछुए-जैसी है, कुत्ते, शूकर और हरिन आदिको डरा रहा है, वही वृश्चिकका तीसरा द्रेष्काण है॥ ३६०-३६२॥ मनुष्यके समान मुख, घोड़े-जैसा शरीर, हाथमें धनुष लेकर तपस्वी और यज्ञोंकी रक्षा करनेवाला पुरुष धनुराशिका द्रेष्काण है। चम्पापुष्पके समान कान्तिवाली, आसनपर बैठी हुई, समुद्रके रत्नोंको बढ़ानेवाली, मझोले कदकी स्त्री धनुका दूसरा द्रेष्काण है। दाढ़ी-मूँछ बढ़ाये, आसनपर बैठा हुआ, चम्पापुष्पके सदृश कान्तिमान्, दण्ड, पट्ट-वस्त्र और मृगचर्म धारण करनेवाला पुरुष धनुका तीसरा द्रेष्काण है। मगरके समान दाँत, रोएँसे भरा शरीर तथा सूअर-जैसी आकृतिवाला पुरुष मकरका प्रथम द्रेष्काण है। कमलदलके समान नेत्रोंवाली, आभूषण-प्रिया श्यामा स्त्री मकरका दूसरा द्रेष्काण है। हाथमें धनुष, कम्बल, कलश और कवच धारण करनेवाला किन्नरके समान पुरुष मकरका तीसरा द्रेष्काण है॥३६३-३६६॥ गीधके समान मुख, तेल, घी और मधु पीनेकी इच्छावाला, कम्बलधारी पुरुष कुम्भका प्रथम द्रेष्काण है। हाथमें लोहा, शरीरमें आभूषण तथा मस्तकपर भाँड़ (बर्तन) लिये मलिन वस्त्र पहनकर जली गाड़ीपर बैठी हुई स्त्री कुम्भका दूसरा द्रेष्काण है। कानमें बड़े-बड़े रोम, शरीरमें श्याम कान्ति, मस्तकपर किरीट तथा हाथमें फल-पत्र धारण करनेवाला बर्तनका व्यापारी कुम्भका तीसरा द्रेष्काण है। भूषण बनानेके लिये नाना प्रकारके रत्नोंको हाथमें लेकर समुद्रमें नौकापर बैठा हुआ पुरुष मीनका प्रथम द्रेष्काण है। जिसके मुखकी कान्ति चम्पाके