संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३२७
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३२७
करनेके स्वभाववाला), दुर्बल दृष्टिवाला और निर्दय होता है। यदि मेषमें रहकर लग्नमें हो तो धनवान् और नेत्ररोगी होता है और सिंह लग्नमें हो तो रात्र्यन्ध (रतौंधीवाला), तुलालग्नमें हो तो अंधा और निर्धन होता है। कर्क लग्नमें हो तो जातककी आँखमें फूली होती है।
द्वितीय भावमें सूर्य हो तो बालक बहुत धनी, राजदण्ड पानेवाला और मुखका रोगी होता है। तृतीय स्थानमें हो तो पण्डित और पराक्रमी होता है। चतुर्थ स्थानमें सूर्य हो तो सुखहीन और पीड़ायुक्त होता है। सूर्य पञ्चम भावमें हो तो मनुष्य धनहीन और पुत्रहीन होता है। षष्ठ भावमें हो तो बलवान् और शत्रुओंको जीतनेवाला होता है। सप्तम भावमें स्थित हो तो मनुष्य अपनी स्त्रीसे पराजित होता है। अष्टम भावमें हो तो उसके पुत्र थोड़े होते हैं और उसे दिखायी भी कम ही देता है। नवम भावमें हो तो जातक पुत्रवान्, धनवान् और सुखी होता है। दशम भावमें हो तो विद्वान् और पराक्रमी तथा एकादश भावमें हो तो अधिक धनवान् और मानी होता है। यदि द्वादश भावमें सूर्य हो तो उत्पन्न बालक नीच और धनहीन होता है॥ २४५-२४९॥
चन्द्रमा यदि मेष लग्नमें हो तो जातक गूँगा, बहिरा, अंधा और दूसरोंका दास होता है। वृष लग्नमें हो तो वह धनी होता है। द्वितीय भावमें हो तो विद्वान् और धनवान्, तृतीय भावमें हो तो हिंसाके स्वभाववाला, चतुर्थ स्थानमें हो तो उस भावके लिये कहे हुए फलों (सुख, गृहादि)-से सम्पन्न, पञ्चम भावमें हो तो कन्यारूप संतानवाला और आलसी होता है। छठे भावमें हो तो बालक मन्दाग्निका रोगी होता है, उसे अभीष्ट भोग बहुत कम मिलते हैं तथा वह उग्र स्वभावका होता है। सप्तम भावमें हो तो जातक ईर्ष्यावान् और अत्यन्त कामी होता है। अष्टम भावमें हो तो रोगसे पीड़ित, नवम भावमें हो तो मित्र और धनसे युक्त, दशम भावमें हो तो धर्मात्मा, बुद्धिमान् और धनवान् होता है। एकादश भावमें हो तो उत्पन्न शिशु विख्यात, बुद्धिमान् और धनवान् होता है तथा द्वादश भावमें हो तो जातक क्षुद्र और अङ्गहीन होता है॥ २५०-२५२ १/२ ॥
मङ्गल लग्नमें हो तो उत्पन्न शिशु क्षत शरीरवाला होता है। द्वितीय भावमें हो तो वह कदन्न* भोजी तथा नवम भावमें हो तो पापस्वभाव होता है। इनसे भिन्न (३, ४, ५, ६, ७, ८, १०, ११, १२) स्थानोंमें यदि मङ्गल हो तो उसके फल सूर्यके समान ही होते हैं॥ २५३ १/२ ॥
बुध लग्नमें हो तो जातक पण्डित होता है। द्वितीय भावमें हो तो शिशु धनवान्, तृतीय भावमें हो तो दुष्ट स्वभाव, चतुर्थ भावमें हो तो पण्डित, पञ्चम भावमें हो तो राजमन्त्री, षष्ठ भावमें हो तो शत्रुहीन, सप्तममें हो तो धर्मज्ञाता, अष्टम भावमें हो तो विख्यात गुणवाला और शेष (९, १०, ११, १२) भावोंमें हो तो जैसे सूर्यके फल कहे गये हैं, वैसे ही उसके फल भी समझने चाहिये॥ २५४ १/२ ॥
बृहस्पति लग्नमें हो तो जातक विद्वान्, द्वितीय भावमें हो तो प्रियभाषी, तृतीय भावमें हो तो कृपण, चतुर्थमें हो तो सुखी, पञ्चममें हो तो विज्ञ, षष्ठममें हो तो शत्रुरहित, सप्तममें हो तो सम्पत्तियुक्त, अष्टममें हो तो नीच स्वभाववाला, नवममें हो तो तपस्वी, दशममें हो तो धनवान्, एकादशमें हो तो नित्य लाभ करनेवाला और द्वादशमें हो तो दुष्ट हृदयवाला होता है॥ २५५ १/२ ॥ शुक्र लग्नमें हो तो जातक कामी और सुखी, सप्तम भावमें हो तो कामी तथा पञ्चम भावमें हो तो सुखी होता है और अन्य भावों (२, ३, ४, ६, ८, ९, १०, ११, १२)- में हो तो वह उत्पन्न बालकको बृहस्पतिके समान ही फल देता है ॥ २५६ १/२ ॥
शनि लग्नमें हो तो जातक निर्धन, रोगी,
* कोदो, मडुआ आदि निम्न श्रेणीके अन्नको कदन्न (कु+अन्न) कहते हैं।
३२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
कामातुर, मलिन, बाल्यावस्थामें रोगी और आलसी
होता है। किंतु यदि अपनी राशि (मकर-कुम्भ)
या अपने उच्च (तुला)में हो तो जातक भूपति,
ग्रामपति, पण्डित और सुन्दर शरीरवाला होता
है। अन्य (द्वितीय आदि) भावोंमें सूर्यके समान
ही शनिके भी फल होते हैं॥ २५७-२५८॥
(फलमें न्यूनाधिकत्व—) शुभग्रह यदि अपने
उच्चमें हों तो पूर्णरूपसे उपर्युक्त फल प्राप्त होता
है। यदि अपने मूल त्रिकोणमें हो तो तीन चरण,
अपनी राशिमें हो तो आधा, मित्रके गृहमें हो तो
एक चरण तथा शत्रु की राशिमें हो तो उससे भी
कम फल प्राप्त होता है और नीचमें या अस्त हो
तो कुछ भी फल नहीं होता है। (इस प्रकार शुभ
ग्रहके फल कहनेसे सिद्ध होता है कि पापग्रहका
फल इसके विपरीत होता है। अर्थात् पापग्रह
नीचमें या अस्त हो तो पूर्ण फल, शत्रु-राशिमें
तीन चरण, मित्र-राशिमें आधा, अपनी राशिमें
एक चरण, अपने मूल त्रिकोणमें उससे भी अल्प
और अपने उच्चमें हो तो अपना कुछ भी फल
नहीं देता है)॥ २५९ १/२ ॥
(स्वराशिस्थ ग्रहफल—) यदि अपनी राशिमें
एक ग्रह हो तो जातक अपने पिताके सदृश
धनवान् और यशस्वी होता है। दो ग्रह अपनी
राशिमें हों तो बालक अपने कुलमें श्रेष्ठ, तीन ग्रह
हों तो बन्धुओंमें माननीय, चार ग्रह हों तो विशेष
धनवान्, पाँच ग्रह हों तो सुखी, छः ग्रह हों तो
भोगी और यदि सातों ग्रह अपनी राशिमें स्थित
हों तो जातक राजा होता है॥ २६० १/२ ॥
यदि अपने मित्रकी राशिमें एक ग्रह हो तो
जातक दूसरेके धनसे पालित, दो ग्रह हों तो
मित्रोंके द्वारा पोषित और तीन ग्रह हों तो वह
अपने बन्धुओंके द्वारा पालित होता है। यदि चार
ग्रह मित्रराशिमें हों तो बालक अपने बाहुबलसे
जीवननिर्वाह करता है। पाँच ग्रह हों तो बहुत
लोगोंका पालन करनेवाला होता है। छः ग्रह हों
तो सेनापति और सातों ग्रह मित्रराशिमें हों तो
जातक राजा होता है॥ २६१ १/२ ॥
पापग्रह यदि विषम राशि और सूर्यकी होरा
(राश्यर्ध)-में हों तो जातक लोकमें विख्यात,
महान् उद्योगी, अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान्, धनवान्
और बलवान् होता है। तथा शुभग्रह यदि
समराशि और चन्द्रमाकी होरामें हों तो जातक
कान्तिमान्, मृदु (कोमल) शरीरवाला, भाग्यवान्,
भोगी और बुद्धिमान् होता है। यदि पापग्रह
समराशि और सूर्यकी होरामें हों तो पूर्वोक्त फल
मध्यम (आधा) होता है। एवं शुभ यदि विषमराशि
और सूर्यकी होरामें हों तो ऊपर कहे हुए फल
नहीं प्राप्त होते हैं॥ २६२-२६४॥
चन्द्रमा यदि अपने या अपने मित्रके द्रेष्काणमें
हो तो जातक सुन्दर स्वरूपवाला और गुणवान्
होता है। अन्य द्रेष्काणमें हो तो उस द्रेष्काणकी
राशि और द्रेष्काणपतिके सदृश ही फल प्राप्त
होता है। (सारांश यह है कि उस द्रेष्काणका
स्वामी यदि चन्द्रमाका मित्र हो तो तीन चरण
फल मिलता है, सम हो तो दो चरण (आधा)
फल मिलता है तथा शत्रु हो तो एक चरण फल
होता है।) यदि सर्प द्रेष्काण*, शस्त्र द्रेष्काण,
चतुष्पद द्रेष्काण और पक्षी द्रेष्काणमें चन्द्रमा हो
तो जातक क्रमशः उग्र-स्वभाव, हिंसाके
स्वभाववाला, गुरुकी शय्यापर बैठनेवाला और
भ्रमणशील होता है॥ २६५-२६६ १/२ ॥
(लग्ननवमांश राशिफल—) लग्नमें मेषका
नवमांश हो तो जातक चोरस्वभाव, वृष-नवमांश
हो तो भोगी, मिथुन-नवमांश हो तो धनी, कर्क-
नवमांश हो तो बुद्धिमान्, सिंह-नवमांश हो तो
राजा, कन्या-नवमांश हो तो नपुंसक, तुला-
नवमांश हो तो शत्रुको जीतनेवाला, वृश्चिक-
नवमांश हो तो बेगारी करनेवाला, धनुका नवमांश
* द्रेष्काणनिरूपणमें देखिये।