संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३०९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३०९
तो गर्भाधान होनेपर स्त्री गर्भके सहित (साथ ही) या पृथक् मृत्युको प्राप्त होती है। लग्न अथवा चन्द्रमासे चतुर्थ स्थानमें पापग्रह हो, मङ्गल अष्टम भावमें हो अथवा लग्नसे ४, १२ वें स्थानमें मङ्गल और शनि हों तथा चन्द्रमा क्षीण हो तो भी गर्भवती स्त्रीका मरण होता है। यदि लग्नमें मङ्गल और सप्तममें रवि हों तो गर्भवती स्त्रीका शस्त्रद्वारा मरण होता है। गर्भाधानकालमें जिस मासका स्वामी अस्त हो, उस मासमें गर्भका स्राव होता है; इसलिये इस प्रकारके लग्नको गर्भाधानमें त्याग देना चाहिये॥४५-४९॥
आधानकालिक लग्न या चन्द्रमाके साथ अथवा इन दोनोंसे ५, ९, ७, ४, १० वें स्थानमें सब शुभग्रह हों और ३, ६, ११ भावमें सब पापग्रह हों तथा लग्न और चन्द्रमापर सूर्यकी दृष्टि हो तो गर्भ सुखी रहता है॥५०॥ रवि, गुरु चन्द्रमा और लग्न—ये विषम राशि एवं विषम नवमांशमें हों अथवा रवि और गुरु विषम राशिमें स्थित हों तो पुत्रका जन्म समझना चाहिये। उक्त सभी ग्रह यदि सम-राशि और सम-नवमांशमें हों अथवा मङ्गल, चन्द्रमा और शुक्र—ये सम-राशिमें हों तो विज्ञजनोंको कन्याका जन्म समझना चाहिये। अथवा वे सब द्विस्वभाव राशिमें हों और बुधसे देखे जाते हों तो अपने-अपने पक्षके यमल (जुड़वीं संतान)-के जन्मकारक होते हैं। अर्थात् पुरुषग्रह दो पुत्रोंके और स्त्रीग्रह दो कन्याओंके जन्मदायक होते हैं। (यदि दोनों प्रकारके ग्रह हों तो एक पुत्र और एक कन्याका जन्म समझना चाहिये।) लग्नसे विषम (३, ५ आदि) स्थानोंमें स्थित शनि भी पुत्रजन्म-कारक होता है॥५१-५३॥
क्रमशः विषम एवं सम-राशिमें स्थित रवि और चन्द्रमा अथवा बुध और शनि एक-दूसरेको देखते हों, अथवा सम-राशिस्थ सूर्यको विषम-राशिस्थ मङ्गल देखता हो या विषम-सम राशिस्थ लग्न एवं चन्द्रमापर मङ्गलकी दृष्टि हो अथवा चन्द्रमा सम-राशि और लग्न विषम-राशिमें स्थित हो तथा उनपर मङ्गलकी दृष्टि हो अथवा लग्न, चन्द्रमा और शुक्र—ये तीनों पुरुषराशिके नवमांशमें हों तो इन सब योगोंमें नपुंसकका जन्म होता है॥५४ १/३॥
शुक्र और चन्द्रमा सम-राशिमें हों तथा बुध, मङ्गल, लग्न और बृहस्पति विषम-राशिमें स्थित होकर पुरुषग्रहसे देखे जाते हों अथवा लग्न एवं चन्द्रमा सम-राशिमें हों या पूर्वोक्त बुध, मङ्गल, लग्न एवं गुरु सम-राशिमें हों तो ये यमल (जुड़वी) संतानको जन्म देनेवाले होते हैं॥५५ १/३॥
यदि बुध अपने (मिथुन या कन्याके) नवमांशमें स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्नको देखता हो तो गर्भमें तीन संतानोंकी स्थिति समझनी चाहिये। उनमें दो तो बुध-नवमांशके सदृश होंगे और एक लग्नांशके सदृश। यदि बुध और लग्न दोनों तुल्य नवमांशमें हों तो तीनों संतानोंको एक-सा ही समझना चाहिये¹॥५६ १/३॥
यदि धनु-राशिका अन्तिमांश लग्न हो, उसी अंशमें बली ग्रह स्थित हों और बलवान् बुध या शनिसे देखे जाते हों, तो गर्भमें बहुत (तीनसे अधिक) संतानोंकी स्थिति समझनी चाहिये॥५७ १/२॥
(गर्भमासोंके अधिपति—) शुक्र, मङ्गल, बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-लग्नश, सूर्य और चन्द्रमा²—ये गर्भाधानकालसे लेकर प्रसवपर्यन्त १० मासोंके क्रमशः स्वामी हैं। आधान-समयमें जो ग्रह बलवान् या निर्बल होता है, उसके मासमें उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल होता है॥५८ १/२॥ बुध त्रिकोण (५, ९)-में हो
१.अर्थात् या तो तीनों पुत्र हैं या तीनों कन्याएँ ही हैं, ऐसा समझे। अन्यथा बुध पुरुष नवमांशमें हो तो दो पुत्र और एक कन्या, स्त्री नवमांशमें हो तो दो कन्या और एक पुत्र समझे।
२.अन्य जातकग्रन्थोंमें ९, १० मासके स्वामी क्रमसे चन्द्र और सूर्य कहे गये हैं। यहाँ उससे विपरीत है।
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और अन्य ग्रह निर्बल हों तो गर्भस्थ शिशुके दो मुख, चार पैर और चार हाथ होते हैं। चन्द्रमा वृषमें हो और अन्य सब पापग्रह राशि-संधिमें हों तो बालक गूँगा होता है। यदि उक्त ग्रहोंपर शुभ ग्रहोंकी दृष्टि हो तो वह बालक अधिक दिनोंमें बोलता है॥ ५९-६०॥ मङ्गल और शनि यदि बुधकी राशि नवमांशमें हों तो शिशु गर्भमें ही दाँतसे युक्त होता है। चन्द्रमा कर्कराशिमें होकर लग्नमें हो तथा उसपर शनि और मङ्गलकी दृष्टि हो तो गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि लग्नमें हो और उसपर शनि, चन्द्रमा तथा मङ्गलकी दृष्टि हो तो गर्भका बालक पङ्गु होता है। पापग्रह और चन्द्रमा राशिसंधिमें हों और उनपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो गर्भस्थ शिशु जड (मूर्ख) होता है। मकरका अन्तिम अंश लग्नमें हो और उसपर शनि, चन्द्रमा तथा सूर्यकी दृष्टि हो तो गर्भका बच्चा वामन (बौना) होता है। पञ्चम तथा नवम लग्नके द्रेष्काणमें पापग्रह हों तो जातक क्रमशः पैर, मस्तक और हाथसे रहित होता है॥ ६१-६२॥
गर्भाधानके समय यदि सिंह लग्नमें सूर्य और चन्द्रमा हों तथा उनपर शनि और मङ्गलकी दृष्टि हो तो शिशु नेत्रहीन होता है। यदि शुभ और पापग्रह दोनोंकी दृष्टि हो तो आँखमें फूली होती है। यदि लग्नसे बारहवें भावमें चन्द्रमा हो तो बालकका वाम नेत्र और सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र नष्ट होता है। ऊपर जो अशुभ योग कहे गये हैं, उनपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो उन योगोंके फल पूर्ण नहीं होते हैं (ऐसी परिस्थितिमें देवाराधन एवं चिकित्सा आदि यत्नोंसे अशुभ फलका निवारण हो जाता है)॥ ६३ १/२ ॥
यदि आधानलग्नमें शनिका नवमांश हो और शनि सप्तम भावमें हो तो तीन वर्षपर प्रसव होता है। यदि इसी स्थितिमें चन्द्रमा हो (अर्थात् लग्नमें चन्द्रमाका नवमांश हो और चन्द्रमा सप्तम भावमें स्थित हो) तो बारह वर्षपर प्रसव होता है। इन योगोंका विचार जन्मकालमें भी करना चाहिये॥ ६४-६५॥ आधानकालमें जिस द्वादशांशमें चन्द्रमा हो, उससे उतनी ही संख्या आगे राशिमें चन्द्रमाके जानेपर बालकका जन्म होता है। द्वादशांशभुक्त अंशादिको दोसे गुणा करके उसमें ५ से भाग देनेपर लब्धि राश्यादि मानकी सूचक होती है*॥ ६६-६७॥
(जन्मज्ञान—) (शिशुकी जन्म-कुण्डलीमें) यदि चन्द्रमा जन्मलग्नको नहीं देखता हो तो
*इस विषयको स्पष्ट समझनेके लिये एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। मान लीजिये, वैशाखकी पूर्णिमाको बृहस्पतिवारकी रातमें ग्यारह दण्ड शून्य पल (११।०) गर्भाधानका समय है। तत्कालीन चन्द्रमाकी राशि ७, अंश ९, कला ३० और विकला १० है। यहाँ चन्द्रमा वृश्चिक राशिके चौथे द्वादशांशमें हैं। वृश्चिकमें चौथा द्वादशांश कुम्भ राशिका होता है, अतः कुम्भसे चतुर्थ राशि वृषमें दैनिक चन्द्रमाके आनेपर दसवें मास फाल्गुनमें बालकका जन्म होगा; ऐसा फल समझना चाहिये। किंतु कृत्तिकाके तीन चरण, रोहिणीके चारों चरण तथा मृगशिराके दो चरण, इस प्रकार नौ चरणोंकी वृष राशि होती है। उस दशामें किस नक्षत्रके किस चरणमें चन्द्रमाके आनेपर जन्म होगा, यह प्रश्न उठ सकता है। अब इसका समाधान किया जाता है—पूर्वोक्त चन्द्रमाकी राश्यादिमें भुक्त द्वादशांशमान (९।३०।१०) — (७।३०) = (२।०।१०) = (१२०।१०) = १२० कला (स्वल्पान्तरसे) मान लिया गया। ''अर्धाल्पे त्याज्यमर्धाधिके रूपं ग्राह्यम्' इस नियमसे (१०) को छोड़ दिया। यहाँपर एक द्वादशांश-खण्डपर एक राशि प्रमाण होता है—यह स्पष्ट है। इसी आधारपर (१२० कला) सम्बन्धी चरणमान अनुपातसे ला रहे हैं; जब कि एक द्वादशांश खण्डकला-प्रमाण (२। ३०) = (१५० कला)-में एक राशिका कलामान १८०० पाते हैं तो १२० में कितना होगा—इस तरह
$\frac{१८०० \times १२०}{१५०} = १२ \times १२० = १४४०।
एक राशिमें नौ चरण होते हैं और चरणका कलामान २०० कला होता है, अतः चरण जाननेके लिये
\frac{१४४०}{२००} = \frac{७+४०}{२००} = ७\frac{१}{५}।$
यहाँ लब्धि और शेषपर दृष्टिपात करनेसे यह ज्ञात होता है कि वृषराशिके आठवें चरणमें अर्थात् मृगशिरा नक्षत्रके प्रथम चरणमें चन्द्रमाका प्रवेश होनेपर बालकका जन्म होगा।