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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २९९

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २९९

उस स्थितिमें दोनोंके क्रान्तिसाम्य होनेपर वैधृति नामका पात कहलाता है। तथा जब दोनों भिन्न (पृथक्-पृथक्) अयनमें हों और दोनोंका योग ६ राशि हो तो उस स्थितिमें दोनोंके क्रान्तिसाम्य होनेपर व्यतीपात नामक पात होता है।<br><br>जब सूर्य-चन्द्रका अन्तर चक्र (०) या ६ राशि हो, उस समयमें तात्कालिक अयनांशादिसे युक्त सूर्य और चन्द्रमाकी अपनी-अपनी क्रान्तिका साधन करे। यदि शर-संस्कृत चन्द्रमाकी क्रान्ति (स्पष्ट क्रान्ति) तात्कालिक सूर्यकी क्रान्तिसे अधिक हो तथा चन्द्रमा यदि विषम पदमें हो तो पातकालको गत (बीता हुआ) समझना चाहिये। यदि विषमपदस्थ चन्द्रमाकी शर-संस्कृत क्रान्तिसे अल्प हो तो पातकालको भावी (होनेवाला) समझना चाहिये। यदि चन्द्रमा समपदमें हो तो इससे विपरीत (सूर्यकी क्रान्तिसे चन्द्रमाकी स्पष्ट क्रान्ति अधिक हो तो भावी, अल्प हो तो गत) पातकाल समझे। यदि स्पष्ट क्रान्ति बनानेमें चन्द्रमाके शरमें क्रान्ति घटायी जाय तो इस स्थितिमें चन्द्रमा-के विम्ब और स्थानमें पदकी भिन्नता होती है।(स्फुट-क्रान्ति-साम्य-ज्ञान-प्रकार—) सूर्य और चन्द्रमा दोनोंकी 'क्रान्तिज्या' को त्रिज्यासे गुणा करके उसमें परम क्रान्तिज्यासे भाग देकर जो लब्धियाँ हों, उन दोनोंके चाप बनाये। उन दोनों चापोंका जो अन्तर हो उसको सम्पूर्ण या अर्ध (कुछ न्यून) करके गम्य पात हो तो चन्द्रमामें जोड़े; गतपात हो तो घटावे। पुनः उपर्युक्त चापके अन्तर या उसके खण्डको सूर्यकी गतिसे गुणा करके गुणनफलमें चन्द्रगतिसे भाग देकर जो लब्धि (कलादि) हो, उसको चन्द्रमाके समान ही सूर्यमें संस्कार करे (गम्यपात हो तो जोड़े, गतपात हो तो घटावे)। इसी प्रकार (सूर्य फलवत्=उक्त चापान्तरको चन्द्रपातकी गतिसे गुणा करके उसमें चन्द्रगतिसे भाग देकर) लब्धिरूप चन्द्रपातके कलादि फलको चन्द्रपात (राहु)-में विपरीत संस्कार करे (गत-पातमें जोड़े, गम्य पातमें घटावे) तो पातकालासन्र समयके सूर्य, चन्द्रमा और चन्द्रपात होते हैं। फिर इन तीनों (रवि, चन्द्र और चन्द्रपात) के द्वारा उपर्युक्त क्रियाको तबतक बार-बार करता रहे जबतक दोनोंकी क्रान्ति सम न हो जाय* ॥१७२–१७९॥

* यदि सायन सूर्य ५।२६।४०।० सायन चन्द्र ०।२।५।०, पात (राहु) ०।५।२५।०, सूर्यगति ६०।१५, चन्द्रगति ७८३।१५ और राहु-गति ३।११ है तो चन्द्र ०।२।५।० और पात ०।५।२५।० के योग ०।७।३० सपाताचन्द्रकी भुजकला ४५० की ज्या ४४९ हुई। इसको चन्द्रमाके परम शर २७० से गुणा कर गुणनफल १२१२३० में त्रिज्या ३४३८ से भाग देनेपर लब्धि चन्द्रमाकी शरकला ३६ हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। केवल चन्द्रमा ०।२।५।० की भुजज्या १२५ कलाको परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल १७४६२५ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ५० चन्द्रमाकी क्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। अतः चन्द्रमाके शर ३६ क्रान्ति ५० का योग करनेसे ८६ चन्द्रमाकी स्पष्ट क्रान्ति हुई।

तथा राश्यादि सूर्य ५।२६।४०।० को ६ राशिमें घटानेमें भुज ०।३।२०।० की कला २०० की ज्या इतनी ही हुई। इसको परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल २७९४०० में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ८१ सूर्यकी क्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही होनेके कारण यही सूर्यकी क्रान्ति हुई।

सूर्यकी क्रान्तिसे विषम (प्रथम) पदस्थित चन्द्रमाकी क्रान्ति अधिक है, इसलिये यहाँ गतपात निश्चित हुआ तथा सूर्य और चन्द्रमाके भिन्न अयन (चन्द्रमाके उत्तरायण और सूर्यके दक्षिणायन)-में होने एवं दोनोंके राश्यादियोग ६ राशि होनेके कारण इस क्रान्तिसाम्यका नाम व्यतीपात हुआ।

अब, चन्द्र-क्रान्तिज्या ८६ को त्रिज्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २९५६६८ में परमक्रान्तिज्या १३९७ का भाग देनेपर लब्धि २११ चन्द्रमाकी भुजज्या हुई; इसका चाप भी स्वल्पान्तरसे इतना ही हुआ। एवं सूर्यकी क्रान्तिज्या ८१ को त्रिज्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २७८४७८ में परमक्रान्तिज्या १३९७ का भाग देनेपर लब्धि सूर्यकी भुजज्या १९२ हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ।

३०० * संक्षिप्त नारदपुराण *


क्रान्त्योः समत्वे पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ ।<br>हीनेऽर्द्धरात्रिकाद्यातो भावी तात्कालिकेऽधिके ॥ १८० ॥<br>स्थिरीकृतादर्द्धरात्रेन्दोर्द्वयोर्विवरलिप्तिकाः ।<br>षष्टिघ्न्यश्चन्द्रभुक्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥ १८१ ॥<br>इस प्रकार क्रान्ति-साम्य होनेपर पात समझना चाहिये। यदि उपर्युक्त क्रियाद्वारा प्राप्त अंशादिसे युक्त या हीन किया हुआ चन्द्रमा अर्धरात्रिकालिक साधित चन्द्रमासे अल्प (पीछे) हो तो पातकालको 'गत' समझे और यदि अधिक (आगे) हो तो पातकालको भावी समझे।<br>(अर्धरात्रिसे गत, गम्य पातकालका ज्ञान—) उपर्युक्त क्रियाद्वारा स्थिरीकृत (पातकालिक) चन्द्रमा और अर्धरात्रिकालिक चन्द्रमा जो हों—इन दोनोंकी अन्तरकलाको ६० से गुणा करके गुणनफलमें चन्द्रकी गति-कलासे भाग देनेपर जो लब्धि हो, उतनी घटी अर्धरात्रिसे पीछे या आगे (गत पातमेंपीछे, गम्य पातमें आगे) तक पातकालकी घड़ी समझी जाती है* ॥ १८०-१८१ ॥<br>रवीन्दोर्मानयोगाद्धं षष्ट्या संगुण्य भाजयेत् ।<br>तयोर्भुक्त्यन्तरेणाप्तं स्थित्यर्धं नाडिकादि तत् ॥ १८२ ॥<br>पातकालः स्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्द्धवर्जितः ।<br>तस्य सम्भवकालः स्यात्तत्संयुक्तोऽन्त्यसंज्ञितः ॥ १८३ ॥<br>आद्यन्तकालयोर्मध्यः कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः ।<br>प्रज्वलज्ज्वलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥ १८४ ॥<br>इत्येतद्गणिते किञ्चित्प्रोक्तं संक्षेपतो द्विज ।<br>जातकं वच्मि समयाद्राशिसंज्ञापुरःसरम् ॥ १८५ ॥<br>(पातके स्थितिकाल, आरम्भ तथा अन्तकालका साधन—) सूर्य तथा चन्द्रमाके विम्बयोगार्धको ६० से गुणा करके गुणनफलमें सूर्य-चन्द्रकी गत्यन्तरकलासे भाग देकर जो लब्धि हो वह पातकी स्थित्यर्थ घड़ी होती है। इसको पातके स्पष्ट मध्यकालमें घटानेसे पातका आरम्भकाल

सूर्य और चन्द्रमाके चापोंका अन्तर करनेसे (२११-१९२=) १९ कला हुई। इसके आधे (स्वल्पान्तरसे) १० को मध्यरात्रिकालिक चन्द्रमा ०।२।५।० में घटानेसे पातासन्नकालिक चन्द्रमा ०।१।५५।० हुआ। तथा उसी अन्तरार्धकला १० को सूर्यकी गति ६०।१५ से गुणा कर गुणनफल ६०२।३० में चन्द्रगति ७८३।१५ का भाग देनेपर लब्धिफल १ कलाको मध्यरात्रिकालिक सूर्य ५।२६।४० में घटानेसे ५।२६।३९ हुआ। एवं उसी अन्तरार्धकला १० को राहुकी गति ३।११ से गुणा कर गुणनफल ३१।५० में चन्द्रगति ७८३।१५ का भाग देनेपर लब्धि ० हुई। इसका विपरीत संस्कार करनेपर भी मध्यरात्रिकालिक राहुके तुल्य ही तत्कालीन राहु ०।५।२५ हुआ।

अब, पातासन्नकालिक चन्द्र ०।१।५५।०, सूर्य ५।२६।३९।० और राहु ०।५।२५।० रहे। इनके द्वारा पुनः क्रान्ति-साधन किया जाता है। चन्द्रमा ०।१।५५।० की भुजज्या ११५ को परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल १६०६५५ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ४६ चन्द्रक्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। तथा चन्द्र ०।१।५५।० और राहु ०।५।२५।० का योग करनेसे सपाताचन्द्र ०।७।२० की भुजज्या ४४० को चन्द्रके परमशर २७० से गुणा कर गुणनफल ११८४०० में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि (स्वल्पान्तरसे) ३५ चन्द्रशरज्या हुई; इसका चाप बनानेसे इतना ही चन्द्रशर हुआ। चन्द्रशर ३५ को चन्द्रक्रान्ति ४६ में जोड़नेसे ८१ कला हुई, इसका अंश बनानेसे १।२१ चन्द्रमाकी स्पष्टक्रान्ति हुई। एवं तत्कालीन सूर्य ५।२६।३९ की भुजज्या २०१ को परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल २८०७९७ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ८१ सूर्यकी क्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। इसको अंशात्मक बनानेसे १।२१ सूर्यकी क्रान्ति हुई। अतः यहाँ सूर्य और चन्द्रमाकी क्रान्तियोंमें समता हुई।

* क्रान्तिसाम्य (पात) काल-साधन—मध्यकालिक चन्द्रमा ०।२।५।० और स्थिरीकृत क्रान्तिसाम्य-(पात) कालिक चन्द्रमा ०।१।५५।० की अन्तकला १० को ६० से गुणा कर गुणनफल ६०० में चन्द्रगति ७८३।१५ का भाग देनेपर (स्वल्पान्तरसे) लब्धि १ घड़ी हुई। इसको (गतपात होनेके कारण) मध्यरात्रि घड़ी ४५।१५ में घटानेसे शेष ४४।१५ पातका मध्यकाल हुआ।