संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद २३७
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३७
वाचक है। ये दोनों बहुवचनान्त होते हैं¹। अयम्का अर्थ है यह; यह 'इदम्' शब्दका रूप है²। 'सम्राट्' कहते हैं बादशाह या चक्रवर्ती राजाको³। सुराज् शब्दके रूप—सुराट् सुराजौ सुराजः इत्यादि हैं। शेष रूप सम्राज् शब्दकी भाँति जानने चाहिये। इसका अर्थ है—अच्छा राजा। बिभ्रत्का अर्थ है धारण-पोषण करनेवाला⁴। वपुष्मत् (वपुष्मान्) का अर्थ है शरीरधारी⁵॥ ३८॥
प्रत्यङ् पुमान् महान् धीमान् विद्वाञ्षट् पिपठीश्च दोः।
उशनासाविमे प्रोक्ताः पुंस्यज्वलिवरामकाः॥ ३९॥
प्रत्यञ्च-शब्दका अर्थ है प्रतिकूल या पीछे जानेवाला 'भीतरकी ओर' भी अर्थ है⁶। पुमान्का अर्थ है पुरुष, जो पुंस्-शब्दका रूप है⁷। महान् कहते हैं श्रेष्ठको⁸। धीमान्का अर्थ है बुद्धिमान्। (धीमत्-शब्दके रूप वपुष्मत् शब्दकी भाँति जानने चाहिये।) विद्वान्का अर्थ है पण्डित⁹। षष् शब्द छःका वाचक और बहुवचनान्त है। (इसके रूप इस प्रकार हैं—षट् षड् २। षड्भिः। षड्भ्यः २। षण्णाम्। षट्सु षट्सु।) जो पढ़नेकी इच्छा करे, उसे 'पिपठीः¹⁰' कहते हैं। दोःका अर्थ है भुजा¹¹। उशनाका अर्थ है शुक्राचार्य¹²। अदस् शब्दका अर्थ है¹³ 'यह' या 'वह'। ये अजन्त (स्वरान्त) और हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्द कहे गये॥ ३९॥
राधा सर्वा गतिर्गोपी स्त्री श्रीर्धेनुर्वधूः स्वसा।
गौर्नौरुपानद्द्यौर्गोवत् ककुप्संवित्तु वा क्वचित् ॥ ४० ॥
अब स्त्रीलिङ्ग शब्दोंका दिग्दर्शन कराते हैं।
१. इनके रूप इस प्रकार हैं—पञ्च २। पञ्चभिः। पञ्चभ्यः २। पञ्चानाम्। पञ्चसु। अष्टौ २ अष्ट २। अष्टाभिः अष्टभिः। अष्टाभ्यः २ अष्टभ्यः २। अष्टानाम्। अष्टासु अष्टसु। २. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—अयम् इमौ इमे। इमम् इमौ इमान्। अनेन आभ्याम् ३ एभिः। अस्मै एभ्यः अस्मात्। अस्य अनयोः २ एषाम्। अस्मिन् एषु।
३. सम्राज् शब्दके रूप इस प्रकार हैं—सम्राट् सम्राड् सम्राजौ २ सम्राजः २। सम्राजम्। सम्राजा सम्राड्भ्याम् ३ सम्राड्भिः। सम्राजे सम्राड्भ्यः २। सम्राजः २। सम्राजोः २ सम्राजाम्। सम्राजि सम्राट्सु। ४. इसके रूप इस प्रकार हैं—बिभ्रत् बिभ्रतौ २ बिभ्रतः २। बिभ्रतम्। बिभ्रता बिभ्रद्भ्याम् ३ बिभ्रद्भिः। बिभ्रते बिभ्रद्भ्यः २। बिभ्रतः २। बिभ्रतोः २ बिभ्रताम्। बिभ्रति बिभ्रत्सु। ५. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं—वपुष्मान् वपुष्मन्तौ २ वपुष्मन्तः वपुष्मन्तम् वपुष्मतः। वपुष्मता वपुष्मद्भ्याम् ३ वपुष्मद्भिः। वपुष्मते वपुष्मद्भ्यः२। वपुष्मतः २। वपुष्मतोः २ वपुष्मताम्। वपुष्मति वपुष्मत्सु। हे वपुष्मन्। ६. इसके रूप इस प्रकार हैं—प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ २ प्रत्यञ्चः। प्रत्यञ्चम् प्रतीचः। प्रतीचा प्रत्यग्भ्याम् ३ प्रत्यग्भिः। प्रतीचे प्रत्यग्भ्यः २। प्रतीचः २। प्रतीचोः २ प्रतीचाम्। प्रतीचि प्रत्यक्षु। ७. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—पुमान् पुमांसौ २ पुमांसः। पुमांसम् पुंसः। पुंसा पुम्भ्याम् ३ पुम्भिः। पुंसे पुम्भ्यः २। पुंसः २। पुंसोः २ पुंसाम्। पुंसि पुंसु। हे पुमन्! ८. महत्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—महान् महान्तौ २ महान्तः। महान्तम् महतः। महता महद्भ्याम् ३ महद्भिः महते महद्भ्यः २। महतः २। महतोः २ महताम्। महति महत्सु।
९. विद्वस्-शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—विद्वान् विद्वांसौ २ विद्वांसः। विद्वांसम् विदुषः। विदुषा विद्वद्भ्याम् ३ विद्वद्भिः। विदुषे विद्वद्भ्यः २। विदुषः २। विदुषोः २ विदुषाम्। विदुषि विद्वत्सु। हे विद्वन्।
१०. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—पिपठीः पिपठीषौ २ पिपठीषः। पिपठीषम् पिपठीषः। पिपठीषा पिपठीभ्याम् ३ पिपठीभिः। पिपठीषे पिपठीभ्यः २। पिपठीषः २। पिपठीषोः २ पिपठीषाम्। पिपठीषि पिपठीषु पिपठीःषु। ११. दोष् शब्दके रूप इस प्रकार है—दोः दोषौ २ दोषः। दोषम् दोष्णः दोषः। दोष्णा दोषा दोर्भ्याम् ३ दोर्भिः। दोषे दोषे दोर्भ्यः २। दोष्णः २ दोषः २। दोष्णोः २ दोषोः २ दोष्णाम् दोषाम्। दोष्णि दोषि दोषु दोःसु।
१२. उशनस्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—उशना उशनसौ २ उशनसः २। उशनसम्। उशनसा उशनोभ्याम् ३ उशनोभिः। उशनसे उशनोभ्यः २। उशनसः २। उशनसोः २ उशनसाम्। उशनसि उशनस्सु उशनःसु।
१३. इसके रूप इस प्रकार हैं—असौ अमू अमी। अमुम् अमू अमून्। अमुना अमूभ्याम् अमीभिः। अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः। अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः। अमुष्य अमुयोः अमीषाम्। अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु।
२३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
राधाका अर्थ है भगवान् श्रीकृष्णकी आह्लादिनी शक्ति, जो उनकी भी आराध्या होनेसे 'राधा' कहलाती हैं१। सर्वाका अर्थ है सब२ (स्त्री)। 'गतिः' का अर्थ है—गमन, मोक्ष, प्राप्ति या ज्ञान३। 'गोपी' शब्द प्रेम-भक्तिकी आचार्यरूपा गोपियोंका वाचक४ है। स्त्रीका अर्थ है नारी५। 'श्री' शब्द लक्ष्मीका वाचक है६। धेनुका अर्थ दूध देनेवाली गाय है७। वधूका अर्थ है जाया अथवा पुत्रवधू८। स्वसा९ कहते हैं बहिनको। गो-शब्दका रूप स्त्रीलिङ्गमें भी पुँल्लिङ्गके समान होता है। नौ-शब्दका रूप पहले दिया जा चुका है। उपानह्१० शब्द जूतेका वाचक है। द्यौ११ स्वर्गका वाचक है।
ककुभ्१२ शब्द दिशाका वाचक है। संविद्१३-शब्द बुद्धि एवं ज्ञानका वाचक है ॥४०॥
रुग्विडुद्भाः स्त्रियां तपः कुलं सोमपमक्षि च।
ग्रामण्यम्बु खलप्वेवं कर्तृ चातिरि वातिनु ॥४१॥
रुक्१४ नाम है रोगका। विट्१५-शब्द वैश्यका वाचक है। उद्भाः१६का अर्थ है उत्तम प्रकाश या प्रकाशित होनेवाली। ये शब्द स्त्री-लिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं।
अब नपुंसकलिङ्ग शब्दोंका परिचय देते हैं। तपस्१७-शब्द तपस्याका वाचक है। कुल१८-शब्द वंश या समुदायका वाचक है। सोमप१९-शब्दका अर्थ है सोमपान करनेवाला। 'अक्षि'का२० अर्थ है
१. इसके रूप यों हैं—राधा राधे राधाः। राधाम् राधे राधाः। राधया राधाभ्याम् राधाभिः। राधायै राधाभ्याम् राधाभ्यः। राधायाः राधाभ्याम् राधाभ्यः। राधायाः राधयोः राधानाम्। राधायाम् राधयोः राधासु। हे राधे हे राधे हे राधाः। २. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं। चतुर्थीके एकवचनमें—सर्वस्यै। पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें—सर्वस्याः। षष्ठीके बहुवचनमें—सर्वासाम्। सप्तमीके एकवचनमें—सर्वस्याम्। शेष सभी रूप 'राधा' शब्दकी ही भाँति होंगे। ३. गति शब्दके रूप यों समझने चाहिये—गतिः गती गतयः। गतिम् गती गतीः। गत्या गतिभ्याम् ३ गतिभिः। गत्यै गतये गतिभ्यः २। गत्याः २ गतेः २। गत्योः २ गतीनाम्। गत्याम् गतौ गतिषु। हे गते हे गती हे गतयः। ४. गोपी-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—गोपी गोप्यौ २ गोप्यः। गोपीम् गोपीः। गोप्य गोपीभ्याम् ३ गोपीभिः। गोप्यै गोपीभ्यः २। गोप्यः २ गोप्योः २ गोपीनाम्। गोप्याम् गोपीषु। हे गोपि हे गोप्यौ हे गोप्यः। ५. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं—स्त्री स्त्रियौ २ स्त्रियः। स्त्रियम् स्त्रीम् स्त्रियः स्त्रीः। स्त्रिया स्त्रीभ्याम् ३। स्त्रीभिः। स्त्रियै स्त्रीभ्यः २। स्त्रियाः २। स्त्रियोः २ स्त्रीणाम्। स्त्रियाम् स्त्रीषु। हे स्त्रि हे स्त्रियौ हे स्त्रियः। ६. उसके रूप इस प्रकार हैं—श्रीः श्रियौ २ श्रियः २। श्रियम्। श्रिया श्रीभ्याम् ३ श्रीभिः। श्रियै श्रिये श्रीभ्यः २। श्रियाः २। श्रियः २। श्रियोः २ श्रीणाम् श्रियाम्। श्रियाम् श्रियि श्रीषु। हे श्रीः हे श्रियौ हे श्रियः। ७. इसके रूप गति शब्दकी तरह होंगे। यथा—धेनुः धेनू धेनवः। धेन्वै धेनवे इत्यादि। ८. इस शब्दके रूप इस प्रकार है—वधूः वध्वौ वध्वः। शेष रूप गोपी-शब्दकी तरह समझने चाहिये। वहाँ 'ई' के स्थानमें 'य्' होता है, यहाँ 'ऊ' के स्थानमें 'व्' होगा। इतना ही अन्तर है। ९. इसके रूप कर्तृ-शब्दके समान होते हैं। केवल द्वितीयाके बहुवचनमें 'स्वसृः' ऐसा रूप होता है—इतना ही अन्तर है। १०. उसके रूप इस प्रकार हैं—उपानत् उपानद् उपानहौ २ उपानहः २। उपानहम्। उपानहा उपानद्भ्याम् ३ उपानद्भिः। उपानहे उपानद्भ्यः २। उपानहः २। उपानहोः २ उपानहाम्। उपानहि उपानत्सु। ११. दिव्-शब्दके रूप गो-शब्दके समान समझने चाहिये। १२. इसके रूप—ककुप् ककुब् ककुभौ २ ककुभः २। ककुभम्। ककुभा ककुब्भ्याम् इत्यादि है। सप्तमीके बहुवचनमें ककुप्सु रूप होता है। १३. इसके रूप—संवित् संविद् संविदौ संविदः इत्यादि हैं। १४. इसके रूप हैं—रुक् रुग् रुजौ २ रुजः २। रुजम्। रुजा रुग्भ्याम् इत्यादि। १५. इसके रूप हैं—विट् विड् विशौ विशः इत्यादि। १६. इसके रूप है—उद्भाः उद्भासौ उद्भासः इत्यादि। १७. नपुंसकलिङ्गमें प्रथमा और द्वितीया विभक्तिके रूप एकसे ही होते हैं और तृतीयासे लेकर सप्तमीतकके रूप पुँल्लिङ्गके समान होते हैं। तपस्-शब्दके रूप इस प्रकार समझने चाहिये—तपः तपसी तपांसि। ये तीनों रूप प्रथमा और द्वितीया विभक्तिमें प्रयुक्त होते हैं। शेष रूप उशनस्के समान होंगे। १८. रूप ये हैं—कुलम् कुले कुलानि। शेष रामवत्। १९. प्रथमा-द्वितीया विभक्तियोंमें इसके रूप हैं—सोमपम् सोमपे सोमपानि। शेष रामवत्। २०. इसके रूप प्रथम दो विभक्तियोंमें हैं—अक्षि अक्षिणी अक्षीणि। शेष पाँच विभक्तियोंके एकवचनमें क्रमशः इस प्रकार रूप हैं—अक्ष्णा। अक्ष्णे। अक्ष्णः। अक्ष्णः। अक्षिण अक्षणि। शेष रूप हरि-शब्दके समान जानने चाहिये।