सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद २२७

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २२७


पञ्चमी स्याङ्सिभ्याम्भ्यो ह्यपादाने च कारके।
यतोऽपैति समादत्ते अपादाने च यं यतः ॥ ७॥

'ङसि', 'भ्याम्', 'भ्यस्' यह पञ्चमी विभक्ति है। इसका प्रयोग अपादान कारकमें होता है। जहाँसे कोई जाता है, जिससे कोई किसी वस्तुको लेता है तथा जिस स्थानसे कोई वस्तु अलग की जाती या स्वतः अलग होती है, विभाग या अलगावकी उस सीमाको अपादान¹ कारक कहते हैं ॥ ७॥

ङस्सोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसम्बन्धमुख्यके।
ङ्योस्सुपः सप्तमी तु स्यात्सा चाधिकरणे भवेत् ॥ ८॥

'ङस्', 'ओस्', 'आम्'—यह षष्ठी विभक्ति है। जहाँ स्वामी-सेवक आदि सम्बन्धकी² प्रधानता हो, वहाँ (भेदकमें) षष्ठी विभक्तिका प्रयोग होता है। 'ङि', 'ओस्' 'सुप्'—यह सप्तमी विभक्ति है। इसका प्रयोग अधिकरण³ कारकमें होता है ॥ ८॥

आधारे चापि विप्रेन्द्र रक्षार्थानां प्रयोगतः।
ईप्सितं चानीप्सिताद् यत्तदपादानकं स्मृतम् ॥ ९॥

विप्रवर ! आधारमें⁴ भी सप्तमी होती है। भयार्थक⁵ तथा रक्षार्थक⁶ धातुओंका प्रयोग होनेपर भयके कारणकी अपादान संज्ञा होती है। इसी प्रकार वारणार्थक⁷ धातुओंका प्रयोग होनेपर अनीप्सितसे (जो अभीष्ट नहीं है, उससे) रक्षणीय जो अभीष्ट वस्तु है, उसकी अपादान संज्ञा होती है ॥ ९॥

पञ्चमी पर्यपाङ्‌योगे इतरर्तेंऽन्यदिङ्मुखे।
एतैर्योगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः ॥ १०॥

परि, अप, आङ्, इतर, ऋते, अन्य (आरात्) तथा दिग्वाचक शब्द—इन सबके योगमें भी पञ्चमी⁸ विभक्ति होती है। 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञावाले शब्दोंके साथ योग होनेपर द्वितीया विभक्ति होती है ॥ १०॥

लक्षणेत्थंभूतेऽभिरभागे चानुपर्प्रति।
अन्तरेषु सहार्थे च हीने हापश्च कथ्यते ॥ ११॥

लक्षण⁹, इत्थम्भूताख्यान¹⁰, भाग¹¹ तथा वीप्सा¹²—


१. इसके उदाहरण इस प्रकार हैं—'ग्रामादपैति' (गाँवसे दूर जाता है), 'देवदत्तः यज्ञदत्तात् पुस्तकं समादत्ते' (देवदत्त यज्ञदत्तसे पुस्तक लेता है), 'पात्रात् ओदनं गृह्णाति' (बर्तनसे भात लेता है), 'अश्वात् पतति' (घोड़ेसे गिरता है), 'पर्वतात् नदी निस्सरति' (पर्वतसे नदी निकलती है) इत्यादि।
२. 'गृहस्य स्वामी' (घरके स्वामी), 'राज्ञः सेवकः' (राजाका सेवक), 'दशरथस्य पुत्रः' (दशरथके पुत्र), 'सीतायाः पतिः' (सीताके पति) इत्यादि। ३. 'गृहे वसति' (घरमें रहता है)। ४. आधार तीन प्रकारके हैं—औपश्लेषिक, वैषयिक और अभिव्यापक। इनके क्रमशः उदाहरण इस प्रकार है)। ५. 'कटे आस्ते' (चटाईपर बैठता है) 'मोक्षे इच्छा अस्ति' (मोक्षविषयक इच्छा है), 'सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति' (सबमें आत्मा है)। 'चौर्याद्विभेति' (चोरीसे डरता है)। ६. 'पापाद् रक्षति' (पापसे बचाता है)। ७. 'यवेभ्यो गां वारयति' (जौसे गायको हटाता है)। ८. 'परि हरेः संसारः' (श्रीहरिसे संसार अलग है), 'अप हरेः सर्वे दोषाः' (सब दोष भगवान्‌से दूर हैं), 'आ मुक्तेः संसारः' (जबतक मोक्ष न हो, तभीतक संसार है), 'इतरः कृष्णात्' (कृष्णसे भिन्न), 'ऋते भगवतः' (भगवान्‌के बिना), 'अन्यः श्रीरामात्' (श्रीरामसे भिन्न), 'आरात् वनात्' (वनसे दूर या समीप), 'पूर्वो ग्रामात्' (गाँवसे पूर्व) इत्यादि उदाहरण समझने चाहिये। ९. उदाहरण—'वृक्षं प्रति परि अनु वा विद्योतते विद्युत् (वृक्षकी ओर बिजली चमकती है)। यहाँ वृक्षके प्रकाशित होनेसे बिजलीकी चमकका ज्ञान होता है, अतः वृक्ष लक्षण है। किसीके मतमें विद्युत्का विद्योतन ही लक्षण है, इसे व्यक्त करनेवाले प्रति, परि अथवा अनु किसीके भी योगमें द्वितीया ही होगी। १०. 'भक्तो विष्णुं प्रति, परि, अनु वा।' (यह श्रीविष्णुका भक्त है)। यहाँ 'इत्थंभूत' का अर्थ है किसी विशेषणको प्राप्त। भक्तस्वरूप विशेषणको प्राप्त पुरुषके कथनमें प्रयुक्त प्रति आदि अव्यय कर्मप्रवचनीय होकर 'विष्णु' शब्दसे युक्त हो उसमें द्वितीया विभक्ति लाते हैं। ११. लक्ष्मीर्हरिं प्रति, परि, अनु वा। इसका अर्थ हुआ लक्ष्मीजी भगवान् श्रीहरिकी वस्तु हैं, उनपर उन्हींका अधिकार है, वे श्रीहरिका भाग हैं। १२. मूलमें 'वीप्सा' का प्रयोग न होनेपर भी 'लक्षणेत्थंभूत०' (पा० सू० १।४।९०)-के आधारपर उसका

२२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

इन सबकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त हुए प्रति, परि, अनु—इन अव्ययोंकी 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञा होती है। 'भाग' अर्थको छोड़कर शेष जो लक्षण आदि अर्थ हैं, उनकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त होनेवाला 'अभि१' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय' होता है। हीन२ अर्थको प्रकाशित करनेवाला 'अनु' तथा 'हीन' और 'अधिक३' अर्थोंको प्रकट करनेके लिये प्रयुक्त 'उप' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय' होते हैं। अन्तर अर्थात् मध्य४ अर्थ तथा सहार्थ यानी तृतीया५ विभक्तिका अर्थ व्यक्त करनेके लिये प्रयुक्त हुआ 'अनु' शब्द भी 'कर्मप्रवचनीय' है। (इन सबके योगमें द्वितीया विभक्ति होती है) ॥ ११ ॥

द्वितीया च चतुर्थी स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि।
अप्राणिषु विभक्ती द्वे मन्यकर्मण्यनादरे ॥ १२ ॥

गत्यर्थक६ धातुओंके कर्ममें द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ प्रयुक्त होती हैं, यदि गमनकी चेष्टा प्रकट होती हो। (परंतु मार्ग या उसका वाचक शब्द यदि गत्यर्थक धातुका कर्म हो तो उसमें चतुर्थी नहीं होती, केवल द्वितीया होती है७। यह चतुर्थीका निषेध तभी लागू होता है, जब पथिक मार्गपर चल रहा हो। यदि वह गलत रास्तेसे जाकर अच्छा रास्ता पकड़ना चाहता हो तब चतुर्थीका प्रयोग भी हो ही सकता है८) ज्ञानार्थक 'मन्' धातुका कर्म यदि कोई प्राणिभिन्न वस्तु हो और अनादर अर्थ प्रकट करना हो तो उसमें भी द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ होती हैं९ ॥ १२ ॥

नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योग ईरिता।
चतुर्थी चैव तादर्थ्ये तुमर्थाद्भाववाचिनः ॥ १३ ॥

नमः, स्वस्ति, स्वधा, स्वाहा, अलम्, वषट्— इन सब अव्यय शब्दोंके योगमें चतुर्थी विभक्तिके प्रयोगका विधान है१०। तादर्थ्यमें अर्थात् जिस वस्तुके लिये कोई कार्य किया जाता है, उस 'वस्तु'के बोधक शब्दमें चतुर्थी विभक्ति होती है११। 'तुमुन्' के अर्थमें प्रयुक्त अव्ययभिन्न भावार्थक प्रत्ययान्त शब्दमें भी चतुर्थी विभक्तिका ही प्रयोग होना चाहिये१२ ॥ १३ ॥

तृतीया सहयोगे स्यात्कुत्सितेऽङ्गे विशेषणे।
काले भावे सप्तमी स्यादेतैर्योगे च षष्ठ्यपि ॥ १४ ॥
स्वामीश्वराधिपतिभिः साक्षिदायादसूत्कैः।
निर्धारणे द्वे विभक्ती षष्ठी हेतुप्रयोगके ॥ १५॥


ग्रहण किया गया है। उसका अर्थ है व्याप्ति। उदाहरण है—'वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति' (एक-एक पेड़को सींचता है), 'परि सिञ्चति, अनु सिञ्चति' का भी प्रयोग हो सकता है। १.उदाहरण—हरिमभि वर्तते। २. 'अनु हरिं सुराः' इसका अर्थ है—दैत्य भगवान्‌से हीन हैं। ३. 'अधिक' अर्थमें जहाँ 'उप' है, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है। 'हीन' अर्थमें जहाँ 'उप' है, उसके योगमें द्वितीया होती है। यथा—'उप हरिं सुराः'—'देवता भगवान्‌से हीन हैं। ४.उदाहरण—'हृदयमनु हरिः' भगवान् हृदयके भीतर हैं। ५.उदाहरण—नदीमन्ववसिता सेना। नद्या सह सम्बद्धेत्यर्थः (सेना नदीसे सम्बद्ध है)। ६.उदाहरण—'ग्रामं ग्रामाय वा गच्छति' (गाँवको जाता है)
७. यथा—'पन्थानं गच्छति' (राह चलता है)। ८. यथा—'उत्पथेन पथे गच्छति' (अच्छी राह पकड़नेके लिये बुरे रास्तेसे जाता है)। ९. यथा—'न त्वां तृणं मन्ये, तृणाय वा' (मैं तुझे तृणके बराबर भी नहीं समझता)। वार्तिककारके मतमें यहाँ 'प्राणिभिन्न' को हटाकर 'नौका, अन्न, शुक, शृगाल—इन शब्दोंको छोड़कर' इतना बढ़ा देना चाहिये। इससे 'न त्वाम् अन्नं मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें प्राणिभिन्न होनेपर भी चतुर्थी नहीं होगी और 'न त्वां शुने मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें 'प्राणी' होनेपर भी चतुर्थी हो जायगी। १०. क्रमशः उदाहरण इस प्रकार हैं—'हरये नमः। स्वस्ति प्रजाभ्यः। अग्नये स्वाहा। पितृभ्यः स्वधा। अलं मल्लो मल्लाय। वषट् इन्द्राय। ११. यथा—'मुक्तये हरिं भजति (मोक्षके लिये भगवान्‌का भजन करता है)। १२. यागाय याति—यष्टुं यातीत्यर्थः (यज्ञके लिये जाता है)।