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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद १९१

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * १९१

प्रकार उन ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका चिन्तन करना चाहिये। उनके मस्तकपर किरीट, गलेमें हार, भुजाओंमें केयूर और हाथोंमें कड़े आदि आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। शार्ङ्गधनुष, पाञ्चजन्य शङ्ख, कौमोदकी गदा, नन्दक खड्ग, सुदर्शन चक्र, अक्षमाला तथा वरद और अभयकी मुद्रा—ये सब भगवान्‌के करकमलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। उनकी अंगुलियोंमें रत्नमयी मुद्रिकाएँ शोभा दे रही हैं। राजन्! इस प्रकार योगी भगवान्‌के मनोहर स्वरूपमें अपना चित्त लगाकर तबतक उसका चिन्तन करता रहे, जबतक उसी स्वरूपमें उसकी धारणा दृढ़ न हो जाय। चलते-फिरते, उठते-बैठते अथवा अपनी इच्छाके अनुसार दूसरा कोई कार्य करते समय भी जब वह धारणा चित्तसे अलग न हो, तब उसे सिद्ध हुई मानना चाहिये।

इसके दृढ़ होनेपर बुद्धिमान् पुरुष भगवान्‌के ऐसे स्वरूपका चिन्तन करे, जिसमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्गधनुष आदि आयुध न हों। वह स्वरूप परम शान्त तथा अक्षमाला एवं यज्ञोपवीतसे विभूषित हो। जब यह धारणा भी पूर्ववत् स्थिर हो जाय तो भगवान्‌के किरीट, केयूर आदि आभूषणोंसे रहित स्वरूपका चिन्तन करे। तत्पश्चात् विद्वान् साधक अपने चित्तसे भगवान्‌के किसी एक अवयव (चरण या मुखारविन्द)-का ध्यान करे। तदनन्तर अवयवोंका चिन्तन छोड़कर केवल अवयवी भगवान्‌के ध्यानमें तत्पर हो जाय। राजन्! जिसमें भगवान्‌के स्वरूपकी ही प्रतीति होती है, ऐसी जो अन्य वस्तुओंकी इच्छासे रहित ध्येयाकार चित्तकी एक अनवरत धारा है, उसीको 'ध्यान' कहते हैं। वह अपने पूर्व यम-नियम आदि छः अङ्गोंसे निष्पन्न होता है। उस ध्येय पदार्थका ही जो मनके द्वारा सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीन (ध्याता, ध्येय और ध्यानकी त्रिपुटीसे रहित) स्वरूप ग्रहण किया जाता है, उसे ही 'समाधि' कहते हैं¹। राजन्! प्राप्त करनेयोग्य वस्तु है परब्रह्म परमात्मा और उसके समीप पहुँचानेवाला सहायक है पूर्वोक्त समाधिजनित विज्ञान तथा उस परमात्मातक पहुँचनेका पात्र है सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित आत्मा। क्षेत्रज्ञ कर्ता है और ज्ञान करण है; अतः उस ज्ञानरूपी करणके द्वारा वह प्रापक विज्ञान उस क्षेत्रज्ञका मुक्तिरूप कार्य सिद्ध करके कृतकृत्य होकर निवृत्त हो जाता है। उस समय वह भगवद्भावमयी भावनासे पूर्ण हो परमात्मासे अभिन्न हो जाता है। वास्तवमें क्षेत्रज्ञ और परमात्माका भेद तो अज्ञानजनित ही है। भेद उत्पन्न करनेवाले अज्ञानके


१. तद्रूपप्रत्यया चैकसंततिश्चान्यनिःस्पृहा। तद्ध्यानं प्रथमैरङ्गैः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप॥
तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत्। मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते॥
(ना० पूर्व० ४७। ६६-६७)

१९२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

सर्वथा नष्ट हो जानेपर आत्मा और ब्रह्ममें भेद नहीं रह जाता। उस दशामें भेदबुद्धि कौन करेगा। खाण्डिक्यजी! इस प्रकार आपके प्रश्नके अनुसार मैंने संक्षेप और विस्तारसे योगका वर्णन किया। अब मैं आपका दूसरा कौन कार्य करूँ?

खाण्डिक्य बोले—राजन्! आपने योगद्वारा परमात्मभावको प्राप्त करनेके उपायका वर्णन किया। इससे मेरा सभी कार्य सम्पन्न हो गया। आज आपके उपदेशसे मेरे मनकी सारी मलिनता नष्ट हो गयी। मैंने जो 'मेरे' शब्दका प्रयोग किया, यह भी असत्य ही है, अन्यथा ज्ञेय तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष तो यह भी नहीं कह सकते। 'मैं' और 'मेरा' यह बुद्धि तथा अहंता-ममताका व्यवहार भी अविद्या ही है। परमार्थ वस्तु तो अनिर्वचनीय है, क्योंकि वह वाणीका विषय नहीं है*। केशिध्वजजी! आपने जो इस अविनाशी मोक्षदायक योगका वर्णन किया है, इसके द्वारा मेरे कल्याणके लिये आपने सब कुछ कर दिया।

सनन्दनजी कहते हैं—ब्रह्मन्! तदनन्तर राजा खाण्डिक्यने यथोचितरूपसे महाराज केशिध्वजका पूजन किया और वे उनसे सम्मानित होकर पुनः अपनी राजधानीमें लौट आये। खाण्डिक्य भगवान् विष्णुमें चित्त लगाये हुए योगसिद्धिके लिये विशालापुरी (बदरिकाश्रम)-को चले गये। वहाँ यम-नियम आदि गुणोंसे युक्त हो उन्होंने भगवान्‌की अनन्यभावसे उपासना की और अन्तमें वे अत्यन्त निर्मल परब्रह्म परमात्मा भगवान् विष्णुमें लीन हो गये। नारदजी! तुमने आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंकी चिकित्साके लिये जो उपाय पूछा था, वह सब मैंने बताया।

राजा भरतका मृगशरीरमें आसक्तिके कारण मृग होना, फिर ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मण होकर जडवृत्तिसे रहना, जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद

नारदजी बोले— महाभाग! मैंने आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंकी चिकित्साका उपाय सुन लिया तथापि मेरा मन अभी भ्रममें भटक रहा है। वह शीघ्रतापूर्वक स्थिर नहीं हो पाता। ब्रह्मन्! आप दूसरोंको मान देनेवाले हैं। बताइये, यदि दुष्टलोग किसीके मनके विपरीत बर्ताव करें तो मनुष्य उसे कैसे सह सकता है?

सूतजी कहते हैं— नारदजीका यह कथन सुनकर ब्रह्मपुत्र सनन्दनजीको बड़ा हर्ष हुआ। उन्हें राजा भरतके चरित्रका स्मरण हो आया और वे इस प्रकार बोले।

सनन्दनजीने कहा— नारदजी! मैं इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास कहूँगा, जिसे सुनकर तुम्हारे भ्रान्त मनको बड़ी स्थिरता प्राप्त होगी। मुनिश्रेष्ठ! प्राचीन कालमें भरतनामसे प्रसिद्ध एक राजा हुए थे, जो ऋषभदेवजीके पुत्र थे और जिनके नामपर इस देशको 'भारतवर्ष' कहते हैं। राजा भरतने बाप-दादोंके क्रमसे चले आते हुए राज्यको पाकर उसका धर्मपूर्वक पालन किया। जैसे पिता अपने पुत्रको संतुष्ट करता है, उसी प्रकार वे प्रजाको प्रसन्न रखते थे। उन्होंने नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करके सर्वदेवस्वरूप भगवान्


* अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्तथानयोः। परमार्थस्त्वसंलाप्यो वचसां गोचरो न यः॥
(ना० पूर्व० ४७।७५)