संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-तृतीय पाद \
* पूर्वभाग-तृतीय पाद *
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विद्यमान है। रूप तेजका विशेष गुण है, जो तेज आदि तीनों भूतोंमें उपलब्ध है। रस जलका विशेष गुण है, जो जल और पृथ्वी दोनोंमें विद्यमान है तथा गन्ध नामक गुण केवल पृथ्वीमें ही उपलब्ध होता है। इन पाँचों भूतोंके कार्य क्रमशः इस प्रकार हैं—अवकाश, चेष्टा, पाक, संग्रह और धारण। वायुमें न शीत स्पर्श है न उष्ण, जलमें शीतल स्पर्श है, तेजमें उष्ण स्पर्श है, अग्निमें भास्वर शुक्लरूप है और जलमें अभास्वर शुक्ल। पृथ्वीमें शुक्ल आदि अनेक वर्ण हैं। रूप केवल तीन भूतोंमें है। जलमें केवल मधुर-रस है और पृथ्वीमें छः प्रकारका रस है। पृथ्वीमें दो प्रकारकी गन्ध कही गयी है—सुरभि तथा असुरभि। तन्मात्राओंमें उनके भूतोंके ही गुण हैं। करण और पोषण यह भूतसमुदायकी विशेषता है। परमात्मतत्त्व निर्विशेष है। ये पाँचों भूत सब ओर व्याप्त हैं। सम्पूर्ण चराचर जगत् पञ्चभूतमय है। शरीरमें जो इन पाँचों भूतोंका संनिवेश है, उसका निरूपण किया जाता है। देहके भीतर जो हड्डी, मांस, केश, त्वचा, नख और दाँत आदि हैं, वे पृथ्वीके अंश हैं। मूत्र, रक्त, कफ, स्वेद और शुक्र आदिमें जलकी स्थिति है। हृदयमें, नेत्रोंमें और पित्तमें तेजकी स्थिति है; क्योंकि वहाँ उसके उष्णत्व और प्रकाश आदि धर्मोंका दर्शन होता है। शरीरमें प्राण आदि वृत्तियोंके भेदसे वायुकी स्थिति मानी गयी है। सम्पूर्ण नाड़ियों तथा गर्भाशयमें आकाशतत्त्व व्याप्त है। कलासे लेकर पृथ्वीपर्यन्त यह तत्त्वसमुदाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका साधन है। प्रत्येक शरीरमें भी यह नियत है। भोग-भेदसे इसका निश्चय किया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पुरुषमें नियति-कला आदि तत्त्व कर्मवश प्राप्त हुए सम्पूर्ण शरीरोंमें विचरते हैं। यह ‘मायेय पाश’ कहलाता है। जिससे यह सम्पूर्ण जगत् आवृत्त है। पृथ्वीसे लेकर कलापर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्व-समुदाय अशुद्धमार्ग माना गया है।
(अब ‘निरोध-शक्तिज’ पाशका वर्णन है—)
भूमण्डलमें वह स्थावर-जङ्गम रूपसे विद्यमान है। पर्वत और वृक्ष आदिको स्थावर कहते हैं। जङ्गमके तीन भेद हैं—स्वेदज, अण्डज और जरायुज। चराचर भूतोंमें चौरासी लाख योनियाँ हैं। उन सबमें भ्रमण करता हुआ जीव कभी कर्मवश मनुष्य-शरीर प्राप्त कर लेता है, जो सबसे उत्तम और सम्पूर्ण पुरुषार्थोंका साधक है। उसमें भी भारतवर्षमें ब्राह्मण आदि द्विजोंके कुलमें तो महान् पुण्यसे ही जन्म होता है। ऐसा जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। जन्म इस प्रकार होता है। पहले स्त्री-पुरुषका संयोग होता है, फिर रज-वीर्यके योगसे एक विन्दु गर्भाशयमें प्रवेश करता है। यह विन्दु द्वयात्मक होता है—इसमें स्त्री और पुरुष—दोनोंके रज-वीर्यका सम्मिश्रण होता है। उस समय रजकी अधिकता होनेपर कन्याका जन्म होता है और वीर्यकी मात्रा अधिक होनेपर पुत्रकी उत्पत्ति होती है। उसमें मल, कर्म आदि पाशसे बँधा हुआ कोई आत्मा जीवभावको प्राप्त होता है, वह (मल, माया और कर्म त्रिविध पाशसे युक्त होनेके कारण) ‘सकल’ कहा गया है। गर्भमें माताके खाये हुए अन्न-पान आदिसे पोषित होकर उसका शरीर पक्ष-मास आदि कालसे बढ़ता रहता है। उसका शरीर जरायुसे ढका होता है और अनेक प्रकारके दुःख आदिसे उसे पीड़ा पहुँचती रहती है। इस प्रकार गर्भमें स्थित जीव अपने पूर्वजन्मके शुभाशुभ कर्मोंका स्मरण करके बार-बार दुःखमग्न एवं पीड़ित होता रहता है। फिर समयानुसार वह बालक स्वयं पीड़ित होकर माताको भी पीड़ा देता हुआ नीचे मुँह किये योनियन्त्रसे बाहर निकलता है। बाहर आकर वह क्षणभर निश्चेष्ट रहता है। फिर रोना चाहता है। तदनन्तर क्रमशः प्रतिदिन बढ़ता हुआ बाल, पौगण्ड आदि अवस्थाओंको पार करता हुआ युवावस्थामें जा पहुँचता है। इस लोकमें देहधारियोंके शरीरका इसी क्रमसे प्रादुर्भाव होता है। जो सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाले
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- संक्षिप्त नारदपुराण *
दुर्लभ मानव-जीवनको पाकर अपने आत्माका उद्धार नहीं करता, उससे बढ़कर पापी यहाँ कौन है? आहार, निद्रा, भय और मैथुन—यह सम्पूर्ण पशु आदि जीवोंके लिये सामान्य कहा गया है। जो मूर्ख इन्हीं चार बातोंमें फँसा हुआ है, वह आत्महत्यारा है। अपने बन्धनका उच्छेद करना यह मनुष्योंका विशेष धर्म है।
बन्धनाशका उपाय
पाशबन्धनका विच्छेद दीक्षासे ही होता है, अतः बन्धनका विच्छेद करनेके लिये मन्त्रदीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। दीक्षा एवं ज्ञान-शक्तिसे अपने बन्धनका नाश करके शुद्ध आत्मा नामसे स्थित हुआ पुरुष निर्वाणपद (मोक्ष)-को प्राप्त होता है। जो अपनी शक्तिस्वरूपा दृष्टिसे भगवान् शिवका ध्यान एवं दर्शन करता है और शिवमन्त्रोंसे उनकी आराधनामें तत्पर रहता है, वह अपना और दूसरोंका हितकारी है। शिवरूपी सूर्यकी शक्तिरूपी किरणसे समर्थ हुई चैतन्यदृष्टिके द्वारा पुरुष आवरणको अपनेमें लीन करके शक्ति आदिके साथ शिवका साक्षात्कार करता है। अन्तःकरणकी जो बोध नामक वृत्ति है, वह निगड (बेड़ी) आदिकी भाँति पाशरूप होनेके कारण महेश्वरको प्रकाशित करनेमें समर्थ नहीं होती। दीक्षा ही पाशका उच्छेद करनेमें सर्वोत्तम हेतु है, अतः शास्त्रोक्त विधिसे मन्त्रदीक्षाका आचरण करना चाहिये। दीक्षा लेकर अपने वर्णके अनुरूप सदाचारमें तत्पर रहकर नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये। अपने वर्ण तथा आश्रम-सम्बन्धी आचारोंका मनसे भी लङ्घन न करे। जो मानव जिस आश्रममें दीक्षित होकर दीक्षा ले, वह उसीमें रहे और उसीके धर्मोंका निरन्तर पालन करे। इस प्रकार किये हुए कर्म भी बन्धनकारक नहीं होते। मन्त्रानुष्ठानजनित एक ही कर्म फलदायक होता है। दीक्षित पुरुष जिन-जिन लोकोंके भोगोंकी इच्छा करता है, मन्त्राराधनकी सामर्थ्यसे वह उन सबका उपभोग करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य दीक्षा ग्रहण करके नित्य और नैमित्तिक कर्मोंका पालन नहीं करता, उसे कुछ कालतक पिशाचयोनिमें रहना पड़ता है। अतः दीक्षित पुरुष नित्य-नैमित्तिक आदि कर्म अवश्य करे। नित्य-नैमित्तिक आचारका पालन करनेवाले मनुष्यको उसकी दीक्षामें त्रुटि न आनेके कारण तत्काल मोक्ष प्राप्त होता है। दीक्षाके द्वारा गुरुके स्वरूपमें स्थित होकर भगवान् शिव सबपर अनुग्रह करते हैं। जो लोक-परलोकके स्वार्थमें आसक्त होकर कृत्रिम गुरुभक्तिका प्रदर्शन करता है, वह सब कुछ करनेपर भी विफलताको ही प्राप्त होता है और उसे पग-पगपर प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुभक्तिमें तत्पर है, उसे प्रायश्चित्त नहीं प्राप्त होता और पग-पगपर सिद्धि लाभ होता है। यदि शिष्य गुरुभक्तिसे सम्पन्न और सर्वस्व समर्पण करनेवाला हो तो उसके प्रति मिथ्या मन्त्रका प्रयोग करनेवाला गुरु प्रायश्चित्तका भागी होता है*। (पूर्व० ६३ अध्याय)
* इस 'तृतीय पाद' में अधिकांश सकाम अनुष्ठानोंका प्रसङ्ग है। इसमें देवताओंके तथा भगवान्के विभिन्न स्वरूपोंके ध्यान-पूजनका निरूपण है तथा आराधनाकी सुन्दर-सुन्दर विधियाँ बतलायी गयी हैं। उन विधियोंके अनुसार श्रद्धा-विश्वासपूर्वक अनुष्ठान करनेसे उल्लिखित फल अवश्य मिलता है। जैसे विविध तापोंकी निवृत्ति तथा इष्ट पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये अन्यान्य आधिभौतिक साधन हैं, वैसे ही ये आधिदैविक साधन भी हैं एवं ये भौतिक साधनोंकी अपेक्षा अधिक निर्दोष तथा सहज हैं और प्रतिबन्धकका नाश करके नवीन प्रारब्धके निर्माणमें हेतु होनेके कारण ये उनकी अपेक्षा अधिक लाभप्रद हैं ही। और स्वयं भगवान्का तो सकाम आराधन करनेपर (यदि वे उचित समझें तो कामनाकी पूर्ति करके अथवा पूर्ति न करके भी) अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा अन्तमें अपनी प्राप्ति करा देते हैं, इस दृष्टिसे इस प्रसङ्गकी निश्चय ही बड़ी उपादेयता है।
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मन्त्रके सम्बन्धमें अनेक ज्ञातव्य बातें, मन्त्रके विविध दोष तथा उत्तम आचार्य एवं शिष्यके लक्षण
| सनत्कुमारजी कहते हैं—अब मैं जीवोंके पाश-समुदायका उच्छेद करनेके लिये अभीष्ट सिद्धि प्रदान करनेवाली दीक्षा-विधिका वर्णन करूँगा, जो मन्त्रोंको शक्ति प्रदान करनेवाली है। दीक्षा दिव्यभावको देती है और पापोंका क्षय करती है। इसीलिये सम्पूर्ण आगमोंके विद्वानोंने उसे दीक्षा कहा है। मननका अर्थ है सर्वज्ञता और त्राणका अर्थ है संसारी जीवपर अनुग्रह करना। इस मनन और त्राणधर्मसे युक्त होनेके कारण मन्त्रका मन्त्र नाम सार्थक होता है। | ## मन्त्रोंके लिंगभेद<br>मन्त्र तीन प्रकारके होते हैं—स्त्री, पुरुष और नपुंसक। स्त्री-मन्त्र वे हैं जिनके अन्तमें दो 'ठ' अर्थात् 'स्वाहा' लगे हों। जिनके अन्तमें 'हुम्' और 'फट्' हैं वे पुरुष-मन्त्र कहे गये हैं। जिनके अन्तमें 'नमः' लगा होता है, वे मन्त्र नपुंसक हैं। इस प्रकार मन्त्रोंकी जातियाँ बतायी गयी हैं। सभी मन्त्रोंके देवता पुरुष हैं और सभी विद्याओंकी स्त्री देवता मानी गयी है। वे त्रिविध मन्त्र छः कर्मोंमें* प्रयुक्त होते हैं। जिसमें प्रणवान्त रेफ |
तथापि अल्पायु मनुष्यके लिये यह विचारणीय है कि अपने जीवनको क्या सांसारिक भोगपदार्थोंकी प्राप्तिके प्रयत्न और उनके उपभोगमें लगाना ही इष्ट है? मनुष्य-जीवन क्षणभंगुर है और वह है केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही। संसारके भोग तो प्रत्येक योनिमें ही प्रारब्धानुसार प्राप्त होते हैं और उनका उपभोग भी जीव करता ही है। मनुष्य-जीवन भी यदि उन्हीं क्षणभंगुर, नाशवान्, दुःखयोनि और जीवको जन्म-मरणके चक्रमें डालनेवाले भोगपदार्थोंके लिये सकाम उपासनामें ही लगा दिया जाय तो यह बुद्धिमानीका कार्य नहीं है। जो कृपामय भगवान् परम दुर्लभ मोक्षको या स्वयं अपने-आपको देनेके लिये प्रस्तुत हैं, उनसे दुःखपरिणामी और अनित्य भोग माँगना भगवान्के तत्त्वको और भक्तिके महत्त्वको न समझना ही है। जो पुरुष किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे भगवान्को भजता है, उसका ध्येय वह वस्तु है, भगवान् नहीं है। वह वस्तु साध्य है और भगवान् तथा उनकी भक्ति साधन है। यदि किसी मङ्गलकारी कारणवश ही उसके अभीष्टकी प्राप्तिमें देर होगी तो वह भगवान्की भक्तिको छोड़ दे सकता है। अतएव सकाम भावसे की हुई उपासना एक प्रकारसे काम्य वस्तुकी ही उपासना है, भगवान्की नहीं। इस बातको भलीभाँति समझ लेना चाहिये और अपनी रुचिके अनुसार भगवान्की उपासना इस प्रसङ्गमें आयी हुई पद्धतिके अनुकूल अवश्य करनी चाहिये, पर वह करनी चाहिये—निष्काम प्रेमभावसे केवल भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही। इसीमें मनुष्य-जन्मकी सार्थकता है।
इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि सकाम अनुष्ठानका फल प्रतिबन्धककी प्रबलता और सरलताके अनुसार विलम्बसे या शीघ्र होता है। एक आदमीको किसी अमुक वस्तुकी या स्थितिकी आवश्यकता है। वह उसके लिये सकाम उपासना करता है। यदि उस वस्तु या स्थितिकी प्राप्तिमें बाधक पूर्वजन्मका कर्म बहुत अधिक प्रबल होता है तो एक ही अनुष्ठानसे अभीष्ट फल नहीं मिलता। बार-बार अनुष्ठान करने पड़ते हैं। आजकलके सकामी पुरुषमें इतना धैर्य नहीं हो सकता और फलतः वह देवतामें ही अविश्वास कर बैठता है तथा उसकी अवज्ञा करने लगता है, इससे लाभके बदले उसकी उलटी हानि हो जाती है। फिर सकाम साधना वही सफल होती है जिसमें विधिका पूरा-पूरा साङ्गोपाङ्ग पालन हुआ हो तथा कर्म, देवता और फलमें पूर्ण श्रद्धा हो। विधि और श्रद्धाके अभावमें भी फल नहीं होता और आजके युगके मनुष्योंमें अधिकांश ऐसे हैं जो मनमाना फल तो तुरंत चाहते हैं, पर श्रद्धा और विधिकी आवश्यकता नहीं समझते। अतः उनको भी उक्त फल नहीं मिलता। इन सब दृष्टियोंसे भी सकामभावमें देवतामें, देवाराधनमें अश्रद्धासक्त होनेकी सम्भावना रहती है, फिर यदि कहीं कुछ फल मिलता भी है तो वह अनित्य, क्षणभंगुर और दुःख देनेवाला ही होता है। अतएव बुद्धिमान् पुरुषको सकाम भावका सर्वथा त्याग ही करना चाहिये। —सम्पादक
*शान्ति, वश्य, स्तम्भन, द्वेष, उच्चाटन और मारण—ये छः कर्म हैं। (मन्त्रमहोदधि)
४३० * संक्षिप्त नारदपुराण *
(रां) और स्वाहाका प्रयोग हो, वे मन्त्र आग्नेय (अग्निसम्बन्धी) कहे गये हैं। मुने! जो मन्त्र भृगुबीज (सं) और पीयूष-बीज (वं)-से युक्त हैं, वे सौम्य (सोमसम्बन्धी) कहे गये हैं। इस प्रकार मनीषी पुरुषोंको सभी मन्त्र अग्नीषोमात्मक जानने चाहिये। जब श्वास पिङ्गला नाड़ीमें स्थित हो अर्थात् दाहिनी साँस चलती हो तो आग्नेय मन्त्र जाग्रत् होते हैं और जब श्वास इडा नाड़ीमें स्थित हो अर्थात् बायीं साँस चलती हो तो सोम-सम्बन्धी मन्त्र जागरूक होते हैं। जब इडा और पिङ्गला दोनों नाड़ियोंमें साँस चलती हो अर्थात् बायाँ और दाहिना दोनों स्वर समानभावसे चलते हों तो सभी मन्त्र जाग्रत् होते हैं। यदि मन्त्रके सोते समय उसका जप किया जाय तो वह अनर्थरूप फल देनेवाला है। प्रत्येक मन्त्रका उच्चारण करते समय उनका श्वास रोककर उच्चारण न करे। अनुलोमक्रममें बिन्दु (अनुस्वार)-युक्त और विलोमक्रममें विसर्गसंयुक्त मन्त्रोंका उच्चारण करे। यदि जपा हुआ मन्त्र देवताको जाग्रत् कर सका तो वह शीघ्र सिद्धि देनेवाला होता है और उस मालासे जपा हुआ दुष्ट मन्त्र भी सिद्ध होता है। क्रूर कर्ममें आग्नेय मन्त्रका उपयोग होता है और सोमसम्बन्धी मन्त्र सौम्य फल देनेवाले होते हैं। शान्त, ज्ञान और अत्यन्त रौद्र—ये मन्त्रोंकी तीन जातियाँ हैं। शान्तिजातिसमन्वित शान्त मन्त्र भी 'हुं फट्' यह पल्लव जोड़नेसे रौद्र भाव धारण कर लेता है।
मन्त्रोंके दोष
छिन्नता आदि दोषोंसे युक्त मन्त्र साधककी रक्षा नहीं कर पाते। छिन्न, रुद्ध, शक्तिहीन, पराङ्मुख, कर्णहीन, नेत्रहीन, कीलित, स्तम्भित, दग्ध, त्रस्त, भीत, मलिन, तिरस्कृत, भेदित, सुषुप्त, मदोन्मत्त, मूर्च्छित, हतवीर्य, भ्रान्त, प्रध्वस्त, बालक, कुमार, युवा, प्रौढ़, वृद्ध, निस्त्रिंशक, निर्बीज, सिद्धिहीन, मन्द, कूट, निरंशक, सत्त्वहीन, केकर, बीजहीन, धूमित, आलिङ्गित, मोहित, क्षुधार्त्त, अतिदीप्त, अङ्गहीन, अतिक्रुद्ध, अतिक्रूर, व्रीडित (लज्जित), प्रशान्तमानस, स्थानभ्रष्ट, विकल, अतिवृद्ध, अतिनिःस्नेह तथा पीड़ित—ये (४९) मन्त्रके दोष बताये गये हैं। अब मैं इनके लक्षण बतलाता हूँ। जिस मन्त्रके आदि, मध्य और अन्तमें संयुक्त, वियुक्त या स्वरसहित तीन-चार अथवा पाँच बार अग्निबीज (रं)-का प्रयोग हो, वह मन्त्र 'छिन्न' कहलाता है। जिसके आदि, मध्य और अन्तमें दो बार भूमिबीज (लं)-का उच्चारण होता हो उस मन्त्रको 'रुद्ध' जानना चाहिये। वह बड़े क्लेशसे सिद्धिदायक होता है। प्रणव और कवच (हुं) ये तीन बार जिस मन्त्रमें आये हों वह लक्ष्मीयुक्त होता है। ऐसी लक्ष्मीसे हीन जो मन्त्र है उसे 'शक्तिहीन' जानना चाहिये। वह दीर्घकालके बाद फल देता है। जहाँ आदिमें कामबीज, (क्लीं), मध्यमें मायाबीज (ह्रीं) और अन्तमें अंकुश बीज (क्रों) हो, वह मन्त्र 'पराङ्मुख' जानना चाहिये। वह साधकोंको चिरकालमें सिद्धि देनेवाला होता है। यदि आदि, मध्य और अन्तमें सकार देखा जाय, तो वह मन्त्र 'बधिर' (कर्णहीन) कहा गया है। वह बहुत कष्ट उठानेपर थोड़ा फल देनेवाला है। यदि पञ्चाक्षर-मन्त्र हो, किंतु उसमें रेफ, मकार और अनुस्वार न हो तो उसे 'नेत्रहीन' जानना चाहिये। वह क्लेश उठानेपर भी सिद्धिदायक नहीं होता। आदि, मध्य और अन्तमें हंस (सं), प्रासाद तथा वाग्बीज (ऐं) हो अथवा हंस और चन्द्रबिन्दु या सकार, फकार अथवा हुं हो तथा जिसमें मा, प्रा और नमामि पद न हो वह मन्त्र 'कीलित' माना गया है। इसी प्रकार मध्यमें और अन्तमें भी वे दोनों पद न हों तथा जिसमें फट् और लकार न हों, वह मन्त्र 'स्तम्भित' माना गया है, जो सिद्धिमें रुकावट डालनेवाला है। जिस मन्त्रके अन्तमें अग्नि (रं) बीज वायु (य) बीजके साथ हो तथा जो सात अक्षरोंसे