संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५७९
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७९
द्विजोत्तम ! उक्त तिथिको ही 'अखण्ड' नामक व्रत कहा गया है। उसमें भगवान् जनार्दनकी सुवर्णमयी मूर्ति बनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे उसकी पूजा करके भगवान्के आगे बारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। प्रत्येक मासकी द्वादशीको ऐसा करके स्वयं रातमें भोजन करे और जितेन्द्रिय भावसे रहे। तत्पश्चात् वर्ष पूरा होनेपर उस स्वर्ण-मूर्तिका विधिपूर्वक पूजन करके दूध देनेवाली गायके साथ उसका आचार्यको दान करे। तदनन्तर बारह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको खाँड और खीर भोजन कराकर उन्हें बारह सुवर्णखण्डकी दक्षिणा दे नमस्कार करे। इस प्रकार व्रत पूरा करके जो भगवान् जनार्दनको प्रसन्न करता है, वह सुवर्णमय विमानसे श्रीविष्णुके परम धाममें जाता है।
पौष मासके कृष्णपक्षकी द्वादशीको 'रूप-व्रत' बताया गया है। ब्रह्मन् ! व्रती पुरुषको चाहिये कि वह दशमीको विधिपूर्वक स्नान करके सफेद या किसी एक रंगवाली गायके गोबरको धरतीपर गिरनेसे पहले आकाशमेंसे ही ले ले। उस गोबरसे एक सौ आठ पिण्ड बनाकर उन्हें ताँबे या मिट्टीके पात्रमें रखकर धूपमें सुखा ले। फिर एकादशीको उपवास करके भगवान् विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाका विधिपूर्वक पूजन और रात्रिमें जागरण करे। सुन्दर मङ्गलमय गीतवाद्य, स्तोत्र-पाठ और जप आदिके द्वारा जागरणका कार्य सफल बनावे। तत्पश्चात् प्रातः-काल जलसे भरे हुए कलशपर तिलसे भरा पात्र रखकर उसके ऊपर उस स्वर्णमयी प्रतिमाको रखे और विभिन्न उपचारोंसे उसकी पूजा करे। इसके बाद दो काष्ठोंके रगड़ने आदिके द्वारा नूतन अग्नि उत्पन्न करके उसकी पूजा करे और विद्वान् पुरुष उस प्रज्वलित अग्निमें तिल और घीसहित एक-एक गोमय-पिण्डका विष्णुसम्बन्धी द्वादशाक्षर*-मन्त्रसे होम करे। तत्पश्चात् पूर्णाहुति करके प्रेमपूर्ण हृदयसे प्रसन्नतापूर्वक एक सौ आठ ब्राह्मणोंको खीर भोजन करावे। फिर कलशसहित वह प्रतिमा आचार्यको अर्पित करे। तदनन्तर दूसरे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। पुरुष हो या स्त्री, इस व्रतका आदरपूर्वक पालन करके वह रूप और सौभाग्य प्राप्त कर लेती है।
माघ शुक्ला द्वादशीको शालग्रामशिलाकी विधिपूर्वक भक्तिभावसे पूजा करके उसके मुख्यभागमें सुवर्ण रखे। फिर उसे चाँदीके पात्रमें रखकर दो श्वेत वस्त्रोंसे ढक दे। तत्पश्चात् वेदवेत्ता ब्राह्मणको उसका दान दे। दान देनेके पश्चात् उस ब्राह्मणको खाँड़ और घीके साथ हितकर खीरका भोजन करावे, यह करके स्वयं एक समय भोजनका व्रत करते हुए भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा रहे। ऐसा करनेवाला पुरुष यहाँ मनोवाञ्छित भोग भोगनेके पश्चात् विष्णुधाम प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मन् ! फाल्गुन मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको श्रीहरिकी सुवर्णमयी प्रतिमाका गन्ध-पुष्प आदिसे पूजन करके उसे वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान कर दे। फिर बारह ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। उसके बाद स्वयं भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। त्रिस्पृशा, उन्मीलनी, पक्षवर्धिनी, वञ्जुली, जया, विजया, जयन्ती तथा अपराजिता—ये आठ प्रकारकी द्वादशी तिथियाँ सब पापोंका नाश करनेवाली हैं। इनमें सदा उपवासपूर्वक व्रत रहना चाहिये।
श्रीनारदजीने पूछा— ब्रह्मन् ! इन सब द्वादशियोंका लक्षण कैसा है? और उनका फल कैसा होता है, वह सब मुझे बताइये। इसके सिवा अन्य पुण्यदायक तिथियोंका भी परिचय दीजिये।
सूतजी कहते हैं— महर्षियो ! देवर्षि नारदने द्विजश्रेष्ठ सनातनजीसे जब इस प्रकार प्रश्न किया
* ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
५८० * संक्षिप्त नारदपुराण *
तो सनातन मुनिने अपने भाई महाभागवत नारदजीकी प्रशंसा करके कहा।
सनातनजी बोले— भैया ! तुम तो साधु पुरुषोंके संशयका निवारण करनेवाले हो। तुमने यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है। मैं तुम्हें महाद्वादशियोंके पृथक्-पृथक् लक्षण और फल बतलाता हूँ। जिस दिन एकादशी सूर्योदयसे पहले—अरुणोदयकालमें ही निवृत्त हो गयी हो, (दिनभर द्वादशी हो और रातके अन्तिम भागमें त्रयोदशी आ गयी हो) उस दिन ‘त्रिस्पृशा’ नामवाली द्वादशी होती है। उसका महान् फल होता है। नारद ! जो मनुष्य उसमें उपवास करके भगवान् गोविन्दका पूजन करता है, वह निश्चय ही एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जब अरुणोदयकालमें एकादशी तिथि दशमीसे विद्ध हो (और एकादशी पूरे दिन रहकर दूसरे दिन भी कुछ कालतक विद्यमान हो) तो उस प्रथम दिनकी एकादशीको छोड़कर दूसरे दिन महाद्वादशीको उपवास करे (उसे ‘उन्मीलनी’ द्वादशी कहते हैं)। उस उन्मीलनी व्रतमें उत्तम पूजाकी विधिसे भगवान् वासुदेवका यजन करके मनुष्य एक सहस्र राजसूय-यज्ञका फल पाता है। जब सूर्योदयकालमें दशमी एकादशीका स्पर्श करती हो (और द्वादशीकी वृद्धि हुई हो) तो उस एकादशीको त्यागकर ‘वञ्जुली’ नामवाली उस महाद्वादशीको ही सदा उपवास करना चाहिये। उसमें सबको सदा अभयदान करनेवाले परम पुरुष संकर्षणदेवका गन्ध आदि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करे। यह महाद्वादशी सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाली, सब पापोंको हर लेनेवाली तथा समस्त सम्पदाओंको देनेवाली कही गयी है। विप्रवर ! जब पूर्णिमा अथवा अमावास्या नामकी तिथियाँ बढ़ जाती हैं, तो उस पक्षकी द्वादशीका नाम ‘पक्षवर्धिनी’ होता है, जो महान् फल देनेवाली है। उसमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले तथा पुत्र और पौत्रोंको बढ़ानेवाले जगदीश्वर भगवान् प्रद्युम्नका पूजन करना चाहिये। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी तिथि मघा नक्षत्रसे युक्त हो तो उसका नाम ‘जया’ होता है। वह सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाली है। उसमें समस्त कामनाओंके दाता और मनुष्योंको सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् अनिरुद्धकी आराधना करनी चाहिये। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी तिथि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो वह ‘विजया’ नामसे प्रसिद्ध होती है। उसमें सदा समस्त भोगोंके आश्रय तथा सम्पूर्ण सौख्य प्रदान करनेवाले भगवान् गदाधरकी पूजा करनी चाहिये। विप्रवर ! ‘विजया’ में उपवास करके मनुष्य सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाता है। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी रोहिणी नक्षत्रसे युक्त होती है, तब वह महापुण्यमयी ‘जयन्ती’ नामसे प्रसिद्ध होती है। उसमें मनुष्योंको सिद्धि देनेवाले भगवान् वामनकी अर्चना करनी चाहिये। यह तिथि उपवास करनेपर सम्पूर्ण व्रतोंका फल देती है, समस्त दानोंका फल प्रस्तुत करती है और भोग तथा मोक्ष देनेवाली होती है। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी तिथि पुष्य नक्षत्रसे युक्त हो तो उसे ‘अपराजिता’ कहा गया है। वह सम्पूर्ण ज्ञान देनेवाली है। उसमें संसार-बन्धनका नाश करनेवाले, ज्ञानके समुद्र तथा रोग-शोकसे रहित भगवान् नारायणकी आराधना करनी चाहिये। उस तिथिको उपवास करके ब्राह्मणभोजन करानेवाला मनुष्य उस व्रतके पुण्यसे ही संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
जब आषाढ़ शुक्ला द्वादशीको अनुराधा नक्षत्र हो, तब दो व्रत करने चाहिये। यहाँ एक ही देवता है, इसलिये दो व्रत करनेमें दोष नहीं है। जब भाद्रपद शुक्ला द्वादशीको श्रवण नक्षत्रका योग हो और कार्तिक शुक्ला द्वादशीको रेवती