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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५५३

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५५३
आदिसे विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। यह व्रत धन, पुत्र और धर्मविषयक शुभकारक बुद्धि प्रदान करता है। आषाढ़ शुक्ला तृतीयाको सपत्नीक ब्राह्मणमें लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी भावना करके वस्त्र, आभूषण, भोजन और धेनुदानके द्वारा उनकी पूजा करे; फिर प्रिय वचनोंसे उन्हें अधिक संतुष्ट करे। इस प्रकार सौभाग्यकी इच्छासे प्रेमपूर्वक इस व्रतका पालन करके नारी धन-धान्यसे सम्पन्न हो देवदेव श्रीहरिके प्रसादसे विष्णुलोक प्राप्त कर लेती है। श्रावण शुक्ला तृतीयाको 'स्वर्णगौरीव्रत' का आचरण करना चाहिये। उस दिन स्त्रीको चाहिये कि वह षोडश उपचारोंसे भवानीकी पूजा करे।<br><br>भाद्रपद शुक्ला तृतीयाको सौभाग्यवती स्त्री विधिपूर्वक पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा भक्ति-भावसे पूजा करती हुई 'हरितालिकाव्रत'का पालन करे। सोने, चाँदी, ताँबे, बाँस अथवा मिट्टीके पात्रमें दक्षिणासहित पकवान रखकर फल और वस्त्रके साथ ब्राह्मणको दान करे। इस प्रकार व्रतका पालन करनेवाली नारी मनोरम भोगोंका उपभोग करके इस व्रतके प्रभावसे गौरीदेवीकी सहचरी होती है। आश्विन शुक्ला तृतीयाको 'बृहद् गौरीव्रत'-का आचरण करे। नारद! इससे सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि होती है।<br><br>कार्तिक शुक्ला तृतीयाको 'विष्णु-गौरीव्रत'काआचरण करे। उसमें भाँति-भाँतिके उपचारोंसे जगद्वन्द्या लक्ष्मीकी पूजा करके सुवासिनी स्त्रीका मङ्गल-द्रव्योंसे पूजन करनेके पश्चात् उसे भोजन करावे और प्रणाम करके विदा करे। मार्गशीर्ष शुक्ला तृतीयाको मङ्गलमय 'हरगौरीव्रत' करके पूर्वोक्तविधिसे जगदम्बाका पूजन करे। इस व्रतके प्रभावसे स्त्री मनोरम भोगोंका उपभोग करके देवीलोकमें जाती और गौरीके साथ आनन्दका अनुभव करती है। पौष शुक्ला तृतीयाको 'ब्रह्मगौरीव्रत'का आचरण करे। द्विजश्रेष्ठ! इसमें भी पूर्वोक्त विधिसे पूजन करके नारी ब्रह्मगौरीके प्रसादसे उनके लोकमें जाकर आनन्द भोगती है। माघ शुक्ला तृतीयाको व्रत रखकर पूर्वोक्त विधिसे सौभाग्यसुन्दरीकी पूजा करनी चाहिये और उनके लिये नारियलके साथ अर्घ्य देना चाहिये। इससे प्रसन्न होकर व्रतसे संतुष्ट हुई देवी अपना लोक प्रदान करती है। फाल्गुनके शुक्ल पक्षमें कुलसौख्यदा-तृतीयाका व्रत होता है, उसमें गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा पूजित होनेपर देवी सबके लिये मङ्गलदायिनी होती हैं। मुने! सम्पूर्ण तृतीयाव्रतोंमें देवीपूजा, ब्राह्मणपूजा, दान, होम और विसर्जन-यह साधारण विधि है। इस प्रकार तुम्हें तृतीयाके व्रत बताये गये हैं, जो भक्तिपूर्वक पालित होनेपर मनकी अभीष्ट वस्तुएँ देते हैं।

बारह महीनोंके चतुर्थी-व्रतोंकी विधि और उनका माहात्म्य

सनातनजी कहते हैं— ब्रह्मन्! सुनो, अब मैं तुम्हें चतुर्थीके व्रत बतलाता हूँ, जिनका पालन करके स्त्री और पुरुष मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं। चैत्रमासकी चतुर्थीको वासुदेवस्वरूप गणेशजीकी भलीभाँति पूजा करके ब्राह्मणको सुवर्ण दक्षिणा देनेसे मनुष्य सम्पूर्ण देवताओंका वन्दनीय हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। वैशाखकी चतुर्थीको संकर्षण गणेशकी पूजा करके विधिज्ञ पुरुष गृहस्थ ब्राह्मणोंको शङ्ख दान करे तो वहसंकर्षणलोकमें जाकर अनेक कल्पोंतक आनन्दका अनुभव करता है। ज्येष्ठ मासकी चतुर्थीको प्रद्युम्नरूपी गणेशका पूजन करके ब्राह्मणसमूहको फल-मूलका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है। आषाढ़की चतुर्थीको अनिरुद्धस्वरूप गणेशकी पूजा करके संन्यासियोंको तूँबीका पात्र दान करनेसे मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाता है। ज्येष्ठकी चतुर्थीको एक दूसरा परम उत्तम व्रत होता है, जिसे 'सतीव्रत' कहते हैं। इस व्रतका पालन करके स्त्री गणेशमाता

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पार्वतीके लोकमें जाकर उन्हींके समान आनन्दकी भागिनी होती है। इसी प्रकार आषाढ़की चतुर्थीको एक दूसरा कल्याणकारी व्रत होता है, क्योंकि वह तिथि रथन्तर कल्पका प्रथम दिन है। उस दिन मनुष्य श्रद्धापूत हृदयसे विधिपूर्वक गणेशजीकी पूजा करके देवताओंके लिये दुर्लभ फल भी प्राप्त कर लेता है। मुने! श्रावणकी चतुर्थीको चन्द्रोदय होनेपर विधिज्ञोंमें श्रेष्ठ विद्वान् गणेशजीको अर्घ्य प्रदान करे। उस समय गणेशजीके स्वरूपका ध्यान करना चाहिये। ध्यानके पश्चात् आवाहन आदि सम्पूर्ण उपचारोंसे उनका पूजन करे। फिर लड्डूका नैवेद्य अर्पण करे, जो गणेशजीके लिये प्रीतिदायक है। इस प्रकार व्रत पूरा करके स्वयं भी प्रसादस्वरूप लड्डू खाय तथा रातमें गणेशजीका पूजन करके भूमिपर ही सुखपूर्वक सोये। इस व्रतके प्रभावसे वह लोकमें मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और परलोकमें भी गणेशजीका पद पाता है। तीनों लोकोंमें इसके समान दूसरा कोई व्रत नहीं है।

तदनन्तर भाद्रपद कृष्णा चतुर्थीको बहुलागणेशका गन्ध, पुष्प, माला और घास आदिके द्वारा यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् परिक्रमा करके सामर्थ्य हो तो दान करे। दानकी शक्ति न हो तो इस बहुला गौको नमस्कार करके विसर्जन करे। इस प्रकार पाँच, दस या सोलह वर्षोंतक इस व्रतका पालन करके उद्यापन करे। उस समय दूध देनेवाली गौका दान करना चाहिये। इस व्रतके प्रभावसे मनुष्य मनोरम भोगोंका उपभोग करके देवताओंद्वारा सत्कृत हो गोलोकधाममें जाता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीको सिद्धिविनायक-व्रतका पालन करे। इसमें आवाहन आदि समस्त उपचारोंद्वारा गणेशजीका पूजन करना चाहिये। पहले एकाग्रचित्त होकर सिद्धिविनायकका ध्यान करे। उनके एक दाँत है। कान सूपके समान जान पड़ता है। उनका मुँह हाथीके मुखके समान है। वे चार भुजाओंसे सुशोभित हैं। उन्होंने हाथोंमें पाश और अंकुश धारण कर रखे हैं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान देदीप्यमान है। उनके इक्कीस नाम लेकर उन्हें भक्तिपूर्वक इक्कीस पत्ते समर्पित करे। अब तुम उन नामोंको श्रवण करो। ‘सुमुखाय नमः’ कहकर शमीपत्र, ‘गणाधीशाय नमः’ से भँगरेयाका पत्ता, ‘उमापुत्राय नमः’ से बिल्वपत्र, ‘गजमुखाय नमः’ से दूर्वादल, ‘लम्बोदराय नमः’ से बेरका पत्ता, ‘हरसूनवे नमः’ से धतूरका पत्ता, ‘शूर्पकर्णाय नमः’ से तुलसीदल, ‘वक्रतुण्डाय नमः’ से सेमका पत्ता, ‘गुहाग्रजाय नमः’ से अपामार्गका पत्ता, ‘एकदन्ताय नमः’ से बनभंटा या भटकटैयाका पत्ता, ‘हेरम्बाय नमः’ से सिंदूर (सिंदूरचर्व अथवा सिंदूर-वृक्षका पत्ता), ‘चतुर्होत्रे नमः’ से तेजपात और ‘सर्वेश्वराय नमः’ से अगस्त्यका पत्ता चढ़ावे*। यह सब


* यहाँ इक्कीस नामोंसे इक्कीस पत्ते अर्पण करनेकी बात लिखकर तेरह नामोंका ही उल्लेख किया गया है। संग्रह ग्रन्थोंमें उपर्युक्त नामोंके अतिरिक्त आठ नाम और आठ प्रकारके पत्तोंका निर्देश इस प्रकार किया गया