संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उत्तरभाग
- उत्तरभाग *
६४९
किया था। उसीका यह अनुपम अध्यवसाय (सामर्थ्य) है कि वे सत्यसे विचलित न हो सके। लोकमें नारीको समस्त विघ्नोंकी रानी कहा जाता है। तुम्हारे विघ्न डालनेपर भी राजा रुक्माङ्गदने मन, वाणी और क्रियाद्वारा एकादशीको अन्न न खानेका निश्चय करके पुत्रको मारनेका विचार कर लिया और स्नेहको दूरसे ही त्यागकर तलवार उठा ली। इस कसौटीपर कसकर भगवान् मधुसूदनने देख लिया कि 'ये प्रिय पुत्रका वध कर डालेंगे, किंतु एकादशीको भोजन नहीं करेंगे।' पुत्र, पत्नी तथा राजा तीनोंका विलक्षण भाव देखकर भगवान् बहुत संतुष्ट हुए। तदनन्तर वे सब भगवान्में मिल गये। देवि! सुभगे! यदि सब प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक कर्म करनेपर भी फलकी सिद्धि नहीं हो सकी तो अब इसमें तुम्हारा क्या दोष है? इसलिये शुभे! सब देवता तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आये हैं। सद्भावपूर्वक प्रयत्न करनेवाले पुरुषका कार्य यदि नहीं सिद्ध होता तो भी उसको वेतनमात्र तो दे ही देना चाहिये। नहीं तो उसे संतोष नहीं होगा।'
देवताओंके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण विश्वको मोहनेवाली मोहिनी आनन्दशून्य, पतिहीन एवं अत्यन्त दुःखित होकर बोली—'देवेश्वरो! मेरे इस जीवनको धिक्कार है, जो मैंने यमलोकके मार्गको मनुष्योंसे भर नहीं दिया, एकादशीके महत्त्वका लोप नहीं किया और राजाको एकादशीके दिन भोजन नहीं करा दिया। वह वीर भूपाल रुक्माङ्गद प्रसन्नतापूर्वक भगवान् श्रीहरिमें मिल गये। जिनके कल्याणमय गुणोंका कोई माप नहीं है, जो स्वभावतः निर्मल तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले संतोंके आश्रय हैं। सर्वव्यापी, हंसस्वरूप, पवित्र पद, परम व्योमरूप, ओङ्कारमय, सबके कारण, अविनाशी, निराकार, निराभास, प्रपञ्चसे परे तथा निरञ्जन (निर्दोष) हैं, जो आकाशस्वरूप तथा ध्येय और ध्यानसे रहित हैं, जिन्हें सत् और असत् कहा गया है, जो न दूर हैं, न निकट हैं, मन जिनको ग्रहण नहीं कर सकता, जो परमधाम-स्वरूप, परम पुरुष एवं जगन्मय हैं, जो सनातन तेजःस्वरूप हैं, उन्हीं भगवान् विष्णुमें राजा रुक्माङ्गद लीन हो गये। देवताओ! जो भृत्य स्वामीके कार्यकी सिद्धि नहीं करते और वेतन भोगते रहते हैं, वे इस पृथ्वीपर घोड़े होते हैं। आपकी यह मोहिनी तो पति और पुत्रका नाश करनेवाली है। इसके द्वारा कार्यकी सिद्धि भी नहीं हुई है, फिर यह आप स्वर्गवासियोंसे वर कैसे ग्रहण करे ?'
देवताओंने कहा—मोहिनी! तुम्हारे हृदयमें जो अभिलाषा हो उसे कहो, हम अवश्य उसकी पूर्ति करेंगे।
महीपते! जब देवता लोग इस तरहकी बातें कह रहे थे, उसी समय राजा रुक्माङ्गदके पुरोहित जो अग्निके समान तेजस्वी थे, वहाँ आये। वे मुनि पहले जलमें बैठकर योगकी साधनामें तत्पर थे। बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर पुनः जलसे निकले थे। जलसे निकलनेपर उन्होंने मोहिनीकी सारी करतूतें सुनीं। इससे क्रोधमें भरकर वे मुनिश्रेष्ठ देवसमुदायके पास आये और मोहिनीको वर देनेवाले सम्पूर्ण देवताओंसे इस प्रकार बोले—'इस मोहिनीको धिक्कार है, देवसमूहको भी धिक्कार है और इस पापकर्मको धिक्कार है। आप लोग धिक्कारके पात्र इसलिये हैं कि आप मोहिनीको मनोवाञ्छित वर देनेवाले हैं। इसपर हत्याका पाप सवार है। इसमें नारीजनोचित साधु बर्ताव नहीं रह गया है। यह स्त्री नहीं, राक्षसी है। देवताओ! यदि यह जलती हुई आगमें कूद पड़े तो भी इस लोकमें इसकी शुद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि इसने इस पृथ्वीको राजासे शून्य कर दिया। देवगण! इस खोटी बुद्धिवाली पापिनीके लिये तो नरकोंमें भी रहनेका अधिकार नहीं है। फिर स्वर्गमें इसकी स्थिति कैसे हो सकती है ? यह राजाके निकट नहीं जा सकती है। लोकापवादसे यह इतनी दूषित हो चुकी है
६५० * संक्षिप्त नारदपुराण *
कि लोकमें कहीं भी इसका रहना सम्भव नहीं है। देवताओ! जो सदा पापमें ही डूबी रही है और अपने दुष्कर्मोंके कारण जिसकी सर्वत्र निन्दा होती है, उस पापिनीके जीवनको धिक्कार है। यह वैष्णवधर्मका लोप करनेवाली तथा भारी पापराशिसे दबी हुई है। देवेश्वरो! यह तो स्पर्श करने योग्य भी नहीं है, इसे आप लोग वर कैसे दे रहे हैं? जो लोग न्यायपरायण तथा धर्ममार्गपर चलनेवाले हैं, उन्हींको वर देनेके लिये आपको सदा तत्पर रहना चाहिये। देवता लोग कभी पापीकी रक्षा नहीं करते; उन्हें धर्मका आधार माना गया है और धर्मका प्रतिपादन वेदमें किया गया है। वेदोंने पतिकी सेवाको ही स्त्रियोंका धर्म बताया है। पति जो कुछ भी कहे, उसे निःशङ्क होकर करना चाहिये। इसीको सेवाकर्म जानना चाहिये। केवल शारीरिक सेवाका ही नाम शुश्रूषा नहीं है। देवगण! इसने अपनी आज्ञा स्थापित करनेकी इच्छासे पतिकी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है, इसलिये मोहिनी सम्पूर्ण स्त्रियोंमें पापिनी है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। इसकी शपथोंसे बँधे हुए राजा रुक्माङ्गदने सत्यकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी अनुनय-विनयभरी बातें कहीं, किंतु इसने उनकी ओरसे अनिच्छा प्रकट कर दी, अतः राजा इसके ऊपर पाप डालकर स्वयं मोक्षको प्राप्त हुए हैं। इसलिये इसपर हजारों हत्याका पाप सवार है। इसका शरीर ही पापमय है। जो सब प्रकारके उत्तम दान देनेवाले, ब्राह्मणभक्त, भगवान् विष्णुके आराधक, प्रजाको प्रसन्न रखनेवाले तथा एकादशी-व्रतके सेवी थे, परायी स्त्रियोंके प्रति जिनके मनमें आसक्ति नहीं थी, जो विषयोंकी ओरसे विरक्त हो चले थे, परोपकारके लिये सारा भोग त्याग चुके थे और सदा यज्ञानुष्ठानमें लगे रहते थे, इस पृथ्वीपर जो सदा दुष्टोंका दमन करनेमें तत्पर रहते थे और सात प्रकारके भयंकर व्यसनोंने कभी जिनपर आक्रमण नहीं किया, उन्हीं महाराज रुक्माङ्गदको इस जगत्से हटाकर दुराचारिणी मोहिनी वर पानेके योग्य कैसे हो सकती है ? सुरश्रेष्ठगण! जो इस मोहिनीके पक्षमें होगा, वह देवता हो या दानव, मैं उसको भी क्षणभरमें भस्म कर दूँगा। जो मोहिनीकी रक्षाका प्रयत्न करेगा, उसको वही पाप लगेगा, जो मोहिनीमें स्थित है।'
राजन्! ऐसा कहकर उन द्विजेन्द्रने हाथमें तीव्र जल लिया और ब्रह्मपुत्री मोहिनीकी ओर क्रोधपूर्वक देखकर उसके मस्तकपर वह जल डाल दिया। उस जलसे अग्निके समान लपट उठ रही थी। महीपते! उस जलके छोड़ते ही मोहिनीका शरीर स्वर्गवासियोंके देखते-देखते तत्काल प्रज्वलित हो उठा, मानो तिनकोंकी राशिमें आगकी लपटें उठ रही हों। 'प्रभो! अपना कोप रोकिये, रोकिये।' यह देवताओंकी वाणी जबतक आकाशमें गूँजी, तबतक तो ब्राह्मणके वचनसे प्रकट हुई अग्निने उस रमणीको जलाकर राख कर दिया!
मोहिनीकी दुर्दशा, ब्रह्माजीका राजपुरोहितके समीप जाकर उनको प्रसन्न करना, मोहिनीकी याचना
वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! मोहिनी मोहमय शरीर त्यागकर देवताओंके लोकमें गयी। वहाँ देवदूत (वायुदेव)-ने उसे डाँटा—'पापिनी! तेरा स्वभाव पापमय है। तेरी बुद्धि अत्यन्त खोटी है। तू सदा एकादशी-व्रतके लोपमें संलग्न रही है, अतः स्वर्गमें तेरा रहना असम्भव है।' इस प्रकार कठोर वचन कहकर वायुदेवने उसे डंडेसे पीटा और यातनामय नरकमें भेज दिया। राजन्!