संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उत्तरभाग
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'काम्पिल्य देशमें निवास करनेवाली देवि! ब्रह्मा, विष्णु और शिव तुम्हारे चरणारविन्दोंमें मस्तक झुकाते हैं। जगदम्ब! तुम्हें नमस्कार है। विघ्नराज! ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र और विष्णु आदि आपकी वन्दना करते हैं। गणपते! आप ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीके अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। उमादेवी अपने कोमल करारविन्दोंसे जिनके ललाटमें तिलक लगाती हैं, जो कानोंमें कुण्डल तथा गलेमें कमलपुष्पोंकी माला धारण करते हैं उन कुमार कार्तिकेयको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदिके लिये भी जिनका दर्शन करना अत्यन्त कठिन है उन भगवान् शिवकी स्तुति कौन कर सकता है? तथापि प्रभो! आपके दर्शनसे मेरे द्वारा स्वतः स्तुति होने लगी है, ठीक उसी तरह जैसे मेघोंकी घटासे स्वतः वर्षा होने लगती है। अम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवको नमस्कार है। संहारकारी शर्व एवं कल्याणकारी शम्भुको नमस्कार है। ताण्डवनृत्य करनेवाले सभापति रुद्रदेवको नमस्कार है। जिनके पैरोंकी धमकसे सम्पूर्ण लोक विदीर्ण होने लगते हैं, मस्तकके आघातसे ब्रह्माण्डकी दीवार फट जाती है और भुजाओंके आघातसे समस्त दिगन्त विभ्रान्त हो उठता है उन भगवान् भूतनाथको नमस्कार है। ताण्डवके समय जिनके युगलचरणोंमें नूपुरकी छम-छम ध्वनि होती रहती है, जिनके कटिभागमें चर्ममय वस्त्र सुशोभित होता है और जो नागराजकी मेखला धारण करते हैं उन भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। जो कालके भी काल हैं, सोमस्वरूप, भोगशक्तिसम्पन्न तथा हाथमें शूल धारण करनेवाले हैं उन जगत्पति शिवको नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्के पालक, समस्त देवताओंके नेता तथा पर्वतों और क्षेत्रोंके अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। लोककल्याणकारी आप भगवान् शङ्करको नमस्कार है। मङ्गलस्वरूप शिवको नमस्कार है। आत्माके अधिपति! आपको नमस्कार है। समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाले ! आपको नमस्कार है। आप आठ अङ्गोंसे युक्त और अत्यन्त मनोरम स्वरूपवाले हैं, क्लेशमें पड़े हुए भक्तोंको अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाले हैं; आप (दक्ष) यज्ञके नाशक और परम संतुष्ट हैं; आप पाँचों भूतोंके स्वामी, कालके नियन्ता, आत्माके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण दिशाओंके पालक हैं; आपको बारम्बार नमस्कार है। जो सम्पूर्ण विश्वके कर्ता, जगत्का भरण-पोषण करनेवाले तथा संसारका संहार करनेवाले हैं; अग्नि जिनका नेत्र और विश्व जिनका स्वरूप है; उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। ईशान ! तत्पुरुष ! वामदेव ! सद्योजात ! आपको नमस्कार है। भस्म ही जिनका आभूषण है, जो भक्तोंका भय भङ्ग करनेवाले हैं, जो भव (जगत्की उत्पत्तिके कारण), भर्ग (तेजस्वरूप), रुद्र (दुःख-निवारण करनेवाले) तथा मीढ़वान् (भक्तोंकी आशालताको सींचनेवाले) हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके कपोल, ललाट, भौंहें तथा शरीर सभी परम सुन्दर हैं; जो सोमस्वरूप हैं; उन भगवान् शिवको नमस्कार है। भगवन्! सांसारिक क्लेशके कारण होनेवाले महान् भयका सदाके लिये आप उच्छेद करनेवाले हैं। भक्तोंपर कृपाकी वर्षा करनेवाले ! आपको नमस्कार है। जो आनन्दके समुद्र तथा ताण्डवलास्यके द्वारा परम सुन्दर प्रतीत होते हैं उन सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तथा देवसभाके अधीश्वर अद्भुत देवता महादेवको मैं नमस्कार करता हूँ। यक्षराज कुबेर जिन्हें अपना इष्टदेव मानते हैं उन अविनाशी परम प्रभु महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो एक बार भी प्रणाम करनेवाले भक्तको संसाररूपी महासागरसे तार देते हैं उन चराचर जगत्के स्वामी भगवान् ईशानको मैं प्रणाम करता हूँ। जो जगत्के धारण-
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पोषण करनेवाले और ईश्वर हैं; समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं; देवताओंके नेता, विजेता तथा स्वयं कभी पराजित न होनेवाले हैं उन भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो मुझे और इन तीनों लोकोंको रचकर सबका धारण-पोषण करते हैं उन कालके भी नियन्ता आप भगवान् गङ्गाधरकी मैं वन्दना करता हूँ। जिनसे यजुर्वेदके साथ ऋग्वेद और सामवेद भी प्रकट हुए हैं उन सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वस्वरूप, विद्वान् एवं ईश्वर शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे देखते रहते हैं तथा जिनके भयसे भूत, वर्तमान और भविष्य जगत्के जीव पापकर्मोंका त्याग करते हैं, उन सर्वोत्तम द्रष्टा आप भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो देवताओंके नियन्ता और समस्त पापोंको हर लेनेवाले हर हैं उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न शान्त संन्यासी अपने हृदयकमलमें जिन कल्याणमय परमात्माकी उपासना करते हैं, उन ईशान देवको मैं प्रणाम करता हूँ।
'ईश! मैं अज्ञानी, अत्यन्त क्षीण, अशिक्षित, असहाय, अनाथ, दीन, विपत्तिग्रस्त तथा दरिद्र हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुर्मुख, दुष्कर्मी, दुष्ट तथा दुर्दशाग्रस्त हूँ; मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जिसको सिद्धिके लिये वरण करूँ। शम्भो! राग, द्वेष तथा मदकी लपटोंसे प्रज्वलित संसाररूपी अग्निके द्वारा हम दग्ध हो रहे हैं; दयालो! आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके अनेक नाम हैं और बहुतोंने आपका स्तवन किया है। हर! मैं परायी स्त्री, पराये घर, पराये वस्त्र, पराये अन्न तथा पराये आश्रयमें आसक्त हूँ; आप मेरी रक्षा करें। मुझे विश्वका भरण-पोषण करनेवाली धन-सम्पत्तिके साथ उत्तम विद्या दीजिये। देवेश! अनिष्ट तो मुझे सहस्रों मिलते हैं, किंतु इष्ट वस्तुका सदा वियोग ही बना रहता है; आप मेरे मानसिक रोगका नाश कीजिये। भगवन्! आप महान् हैं। देवेश! आप ही हमारे रक्षक हैं, दूसरा कोई मेरी रक्षा करनेवाला नहीं है। आप ब्रह्माजीके भी अधिपति हैं, अतः मुझे स्वीकार करके मेरी रक्षा कीजिये। उमापते! आप ही मेरे माता-पिता, पितामह, आयु, बुद्धि, लक्ष्मी, भ्राता तथा सखा हैं। देवेश! आप ही सब कर्मके कर्ता हैं, अतः मैंने जो भी दुष्कर्म किया है, वह सब आप क्षमा करें। प्रभुतामें आपकी समता करनेवाला कोई नहीं है और लघुतामें मैं भी अपना सानी नहीं रखता। अतः देव! महादेव! मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। आपके मुखपर सुन्दर मुसकान सुशोभित है। गोरे अङ्गोंमें लगी हुई विभूति उनकी गौरताको और बढ़ा देती है। आपका श्रीविग्रह बालसूर्यके समान तेजस्वी तथा सौम्य है। आपका मुख सदा प्रसन्न रहता है तथा आप शान्तस्वरूप हैं। मैं मन और वाणीके द्वारा आपके गुणोंका गान करता हूँ। ताण्डवनृत्य करते और मेरी ओर देखते हुए आप भगवान् उमाकान्तको हम सैकड़ों वर्षोंतक निहारते रहें, यही हमारा अभीष्ट वर है। महाभाग! भगवन्! हम आपके प्रसादसे नीरोग, विद्वान् और बहुश्रुत होकर सैकड़ों वर्षोंतक जीवित रहें। ईशान! स्त्री तथा भाई-बन्धुओंके साथ आपके ताण्डवरूपी अमृतका यथेष्ट पान करते हुए सैकड़ों वर्षोंतक आनन्दका अनुभव करते रहें। देवदेव! महादेव! हम इच्छानुसार आपके चरणारविन्दोंके मधुर मकरन्दका पान करते हुए सौ वर्षोंतक आमोदमें मग्न रहें।
'महादेव! हम प्रत्येक जन्ममें कीट, नाग, पिशाच अथवा जो कोई भी क्यों न हों, सैकड़ों वर्षोंतक आपके दास बने रहें। ईश! देव! महादेव! हम सभामें अपने कानोंद्वारा आपके नृत्य, वाद्य तथा कण्ठकी मधुर ध्वनिका सैकड़ों वर्षोंतक श्रवण करते रहें। जो स्मरणमात्रसे संसार-बन्धनका