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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवकी पारख

( ५० )

अनुरागसागर

अन्तर पापी ऊपर दाय। सो जिव यमके हाथ विकाया॥
लंब दांत अरु वदन भयावन । पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥

छन्द

कहे सतगुरु सुनहु धर्मनि, भेद भल तुम पाइया ॥
सतगुरु विना नहि भेद पावे, भली विधितो हिंदर साइया
भैंटिया तुम मोहिको, कछु नाहिं तोहिं दुराइहौं ॥
जो बृझिहो तुम मोहिसो, सकल भेद बताइहौं ॥३५॥

स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवनकी पारख

सो०-तीजी खानि सुभाव अचल खानि जेहि कहत
नरदेही तिन पाव, ताकर लक्षण अब बताइहौं ॥३७॥
अचल खानिको कहो सँदेसा । देह धरे जस होवैं भेसा ॥
छनिक बुद्धि होवे जिव केरी । पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥
झाड़ा फेटा सिर पर पागा । राज द्वार सेवा भल लागा ॥
घोड़ा पर होवे असवारा । तीन खरग औ कमर कटारा ॥
इत उत चित सैन जो मरई । पर नारी करि सैन बुलवाई ॥
रससों बात कहैं मुख जानी । काम बान लागे उर आनी ॥
पर घर ताकइ चोरी जायी । पकर बांधि राजा पहँलायी ॥
हांसी करे सकल पुनि जगहूँ । लाज शर्म उपज नहिं तबहूँ ॥
छिन इक मन महाँ पूजा करई । छिन इक मन सेवा चित धरई ॥
छिन इक मन महाँ बिसरे देवा । छिन इक मन महाँ की जै सेवा ॥
छिन इक ज्ञानी पोथी बांचा । छिन इक माँहि सवन घर नाचा ॥
छिन इक मनमें सूर कहोई । छिन इकमें कादर हो सोई ॥
छिन इक मनमें साहु कहाई । छिन इक मनमें चारि लगाई ॥
छिन इक मनमें करे जु धर्मा । छिन इक मनमें करे अकर्मा ॥