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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुष की रचना

( १४ )

अनुरागसागर

सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुषकी रचना

सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये । कारण करण नहीं निरमाये ॥
समपुट कमल रह गुप्त सनेहा । पुहुपमाहि रह पुरुष विदेहा ॥
इच्छा कीन्ह अंश उपजाये । हंसन देखि हरष बहुपाये ॥
प्रथमहि पुरुषशब्द परकाशा । दीपलोकरचिकीन्ह निवासा ॥
चारि कर सिंहासन कीन्हा । तापर पुहुप दीपकर चीन्हा ॥
पुरुष कला धरि बैठे जहिया । प्रगटी अगर वासना तहिया ॥
सहस अठासी दीपरचिराखा । पुरुष इच्छातैं सबअभिलाखा ॥
सवै द्वीप रह अगर समायी । अगर वासना बहुत सुहायी ॥

सोलह सुतका प्रगट होना

दूजे शब्द भयेजुपुरुषप्रकाशा । निकसे कूर्मचरण गहि आशा ॥
तीजे शब्दभयेजुपुरुष उच्चार । ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥
टेकी चरण सम्मुख है रहेऊ । आज्ञा पुरुषद्वीपतिन्ह दण्ड ॥
चौथे शब्द भये पुनि जबही । विवेकनाम सुत उपजे तबही ॥
आप पुरुष किये द्वीपनिवासा । पंचम शब्दसो तेज परकासा ॥
पांचवे शब्द जब पुरुष उच्चार । काल निरंजन भो औतारा ॥
तेज अंगते काल है आवा । ताते जीवन कह संतावा ॥
जीवरा अंश पुरुषका आही । आदिअन्त कोउ जानत नाही ॥
छठे शब्द पुरुष मुख भाषा । प्रगटे सहजनाम अभिलाषा ॥
सनयै शब्द भयो संतोषा । दीन्हो द्वीप पुरुष परितोषा ॥
अठयै शब्द पुरुष उच्चार । सुरति सुभाष द्वीप बैठारा ॥
नवमै शब्द आनन्द अपारा । दशयै शब्द क्षमा अनुसारा ॥
ग्यारहै शब्द नाम निष्कामा । बारहै शब्द जलरंगी नामा ॥
तेरहै शब्द अर्चित सुत जाने । चौदहै शब्द सुत प्रेम बखाने ॥
पन्द्रहै शब्द सुत दीन दयाला । सोलहै शब्दभे धीर्यरसाला ॥