कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर गर्भसे मुक्त करना
बोधसागर
( २५ )
कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥
गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥
बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥
बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥
गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥
जगजीवन वचन
बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥
दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥
दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥
मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥
सतगुरु वचन
गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥
बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥
जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥
जगजीवन वचन
अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥
मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥
नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥
सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥
बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥
सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥
नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥
घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥
पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥