कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
विभीषणचरित्र
( ३२ )
ज्ञानसागर
बहु विधि इंद्र करे सतकर्मा । पुरै न घंट जानसको मरमा ॥
तब नारद अस कीन्ह विचारा । धरौ धीर कहौ वचन उचारा ॥
ऋषि जमदग्नि इच्छा खावा । तिहिं प्रभाव अनंग जनावा ॥
ऋषि रत करें कै छाड़ैं ठावा । बजै घंट अस मता सुनावा ॥
सुनतहि ऋषितबकीन्ह पयाना । बज्यो घंट पूरण यज्ञ जाना ॥
साखी-ऋषि मन में तब बूझ्यो, जान करौ अब व्याहु ॥
ऋतमान जब आये, राजा कश्यप ठांहु ॥
चौपाई
देव नृपति कन्या इक मोही । मांगौ आजु जाव नृप तोही ॥
तब कन्या नृप दीन्ह बुलाई । कीन्हो व्याह ऋषी तेहि ठाई ॥
लै कन्या ऋषि घरहि सिधाये । भृगुकुलहरि औधानहि आये ॥
जो धर्मदास संशय कछु तोही । कहौ बुझाय चरित्र अब वोही ॥
भय क्षत्री महि व्याकुल भयऊ । मारन तासु जन्म हरि लयऊ ॥
निछत्र कीन्ह बहु जीव संहारा । बैर हेतु भृगुकुल औतारा ॥
सहसबाहु ऋषिगन जो मारी । पिता बैर सो प्रथम सम्हारी ॥
क्षत्री मारि निक्षत्री कीन्हा । भृगु रूप विष्णु को चीन्हा ॥
साखी-यहि विधि क्षत्री निकंदऊ, परसराम बली वीर ॥
आगे भाव बतावऊँ, सुनौ संत मत धीर ॥
श्रवण चरित्र
चौपाई
अवध नगर दशरथ बड़ राऊ । पुरुषारथ जिन कहौ प्रभाऊ ॥
तिनहि नारि बहु सबहि पियारी । रात दिवस जौ कर हित भारी ॥
एक समय आखेटहिं गये राऊ । पशु भोरे कियौ ऋषिकहँ घाऊ ॥
पानी तट ऋषि हरि हरि कीन्हा । नृप पछितानो जब मुनि चीन्हा ॥
ताके पितहि श्रवणकी बाता । तुव सुत दशरथ कीन्हौ घाता ॥