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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान

( ८८ )

गरुडबोध

कहत सुनत नर तीर्थहिं जायी । भरमतभरमतगलफांसलगायी॥
कहत सुनत सब सुनै पुराना । कहत सुनत सब देत है दाना ॥
कहत सुनत सब खेती करई । कहत सुनत नर माया धरई ॥
कहत सुनत जो जुगली करई । होय चंडाल नरक महाँ परई ॥
कहत सुनत नर रूप खुदावे । कहत सुनत उद्यम मन लावे ॥
कहत सुनत स्वाद मन धरई । कहत सुनत नर गढहे परई ॥
कहत सुनत नर माया जोरी । सौ सहस्र औ लक्ष करोरी ॥
कहत सुनत गुरु शिष्यजोकरई । आप अजान भरम में परई ॥
कहत सुनत भक्ति जो ठानी । कहत सुनत पायन पर आनी॥
कहत सुनत सागर तलाब बनावै । कहत सुनत पाप पुण्य कमावै॥

साखी-कहन सुनत सब गये हैं, कहत सुनत सब जाय ।

कहत सुनत करनी करे, तब प्रभु परसे आय ॥

महादेव वचन-चौपाई

क्रोधवंत महादेव तब भयऊ । हमहू को उठाय तुम धरऊ ॥
महादेव बोले बात विचारी । हमको जान्यो किरतम भिकारी॥
हमको मनुष्य देह करि जाना । भूली बात करे बखाना ॥
महादेव अस युक्ति बतायी । कहो तो सकलो देऊँ दिखायी ॥
कहो अकाशको बन्द बताऊँ । सात द्वीप नौ खंड दिखाऊँ ॥
अचरज एक बात उन भाखी । कहो तो आनि दिखाओं साखी॥
कहो तो गरुडही मारि कै डारों । कहो तो योग जीतहिं मारों ॥
कहो तो काल रूप हम धोरें । कहो तो पलमहँ मारि सँघोरें॥
कहो तो याही देउं भुलायी । बढ़ुरि न हमसों हो बौरायी ॥
यह सो बकवाद विचारा । हमसों बाजी करै अपारा ॥
यह तो आदि अंतसे आये । तेहिते ब्रह्म विष्णु कहाये ॥
हमहीं सिरजें पाले मारें । दानव देवी मारि उखारें ॥