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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ग्रन्थकी समाप्ति कबीरका वचन धर्मदास प्रति

( १३२ )

हनुमानबोध

अक्षर सो निःअक्षर है न्यारा । ओम ओंकार ताहि आधार ॥
तीनों गुणका जो विस्तारा । रंकार है सबके पारा ॥
ताके दरे निःअक्षर धारा । सोई भेद निज आहि हमारा ॥
ये सब हैं समरथ आधार । समरथ शक्तिको वार न पारा ॥
ताकी आशा करे जो कोई । उतरे पार भौसागर सोई ॥

हनुमत कहे साहिब सुनो, तुम हौ दीन दयाल ॥
तुम समान रघुपति नहीं, काटयो यमको जाल ॥

कबीर वचन-चौपाई

कहे कवीर सुनो धर्मदासा । वही ज्ञान मैं तुम्हें प्रकाशा ॥
हनुमत अंश पुरुष का होई । तब हम उनको मिलिया सोई ॥
हनुमत बोधि चले हम जबहीं । चतुर्भुजके ढिग पहुँचे तबहीं ॥
उनसे कीना ज्ञान विचारा । वह हंसनका है सरदारा ॥
चतुर्भुजको हम दियो गुरु आई । ताहि बनायो दर्भगा राई ॥
जो कोइ तुम्हारा वीरा पावे । सो हंसा सतलोक सिधावे ॥
इतनी कहिके हम काशी आये । चलत चलत कछुवार नहीं लाये ॥
काशी विद्या गुरु बहुतोई । पण्डित ज्ञानी बहुते होई ॥
धर्मदास तुम वंश हमारा । तुम्हरे काज हम यहां पगुधारा ॥
तुम्हरे हाथ पान जो पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥

साखी-कहे कवीर धर्मदास सों, हनुमत बोध्यो जाय ।
पान परावना देइके, तुमको मिलिया आय ॥
धर्मदास वन्दन करे, धनधन हो सत्यकवीर ।
हनुमतको दर्शन दियो, धन है हनुमत बीर ॥
छन्द-धन्य साहिब धन्य हौ तुम दर्शन दीनो ।
कीजे दया अब दासपै जाऊँ चरण लागु धाइके ॥