कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अद्याका महेशको वरदान देना
अनुरागसागर
( ४३ )
अद्याका महेशकी बरदान देना
पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम शिव कहो हृदयकी वाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहि देख माता फुरमावे ॥
दोउ पुत्रन कहैं मात हदावा । माँग महेश जो मनभावा ॥
महेशवचन
जोरि पानि शिवकहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता मागों वर एही ॥
हे जननी यह कीजै दया । कबहु न विनशै मेरी काया ॥
अद्यावचन
कह अछंगी अस नहीं होई । दूसरा अमर भयो नहिंकोई ॥
करहु योग तप पवन सनेहा । रहै चार युग तुम्हरी देहा ॥
जौलौं पृथ्वी अकाश सनेही । कबहु न विनशै तुम्हरी देही ॥
धर्मदासवचन
धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानि मोहि कहो समुझाई ॥
यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उथायी ॥
अद्या शाप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥
कबीर वचन
विष्णु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥
दोनो जने हरष मन कीन्हा । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥
धर्मदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न भिन्न कर प्रगट बखानों ॥
शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्मा विष्णुके पास जाकर
अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना
ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विष्णुके पास ॥
ब्रह्मावचन विष्णुप्रति
जाय विष्णुसे बिन्ती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥
तुम पर माता भई दयाला । शाप विवश तुम भये बिहाला ॥
( ४४ )
अनुरागसागर
निज करनी बल पायेहो भाई । किहि विधि दोष लगाऊँ माई ॥
अब अस जतन करोहो भ्राता । चले परिवारे वचन रहै माता ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करिहौं सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सेवै तुम्हारो परिवारा ॥
छन्द
जगमाहि एस दिढाई हौं फलपुन्य आशा जोयहो ॥
यज्ञ धर्म रु करे पूजा द्विज बिना नहिं होय हो ॥
जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुण्य प्रभावहो ॥
सो जीवमोकहै अधिकप्यारेराखिहौं निज ठाँवहो ॥ ३१
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सो ०-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु असमापेऊ ॥
मेटेउ चितकर दंड, सखा मोर सब सुखीभी ॥ ३२ ॥
कालप्रपंच
देखहु धर्मनि काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥
आशा दै जीवन बिलपावै । जन्म जन्म पुनि ताहि सतावै ॥
बलि हरिचंद बेतु बइरोचन । कुंती सुत औरौ महिसोचन ॥
ये सब त्यागी दानि नरेशा । इन कहैं ले राखे केहि देशा ॥
जस गंजत इन सबकी कीन्ह। सो जग जानेकाल अधीना ॥
जानत है जग होय न शुद्धी । कालअमरबलसबकी हरबुद्धी ॥
मन तरंगमें जीव भुलाना । निजघर उलटिनचीन्ह अजाना ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समुझाई ॥
तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निश्चय तुम्हरे पदचित दीन्ह ॥