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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कबीर साहबका जिन्दा रूपसे मथुरामें धर्मदास साहबको प्रथमवार मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष,
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन,
धनी, धर्मदास, चूरामणि नाम, मुदर्शन नाम,
कुलपति नाम, प्रमोध, गुरुबालापीर, केवल नाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम,
पाक नाम, प्रगट नाम, धीरज नाम,
उग्रनाम, दया नामकी दया,
वंशव्यालीसकी दया

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श्री बोधसागर

अथ प्रथमस्तरंगः

धर्मदासबोध-ज्ञानप्रकाश

सत्य सुकृत सतगुरु सतनामा । सत्यपुरुष सन्तन सुखधामा ॥
सत्यपुरुष सतलोक निवासी । दुखनाशक अविचलसुखरासी ॥
अमी अमान सो सत्य कहाये । अभै विद्यमान कहि गाये ॥
अविगति अलख अनाम सरूपा । अगह अडोल अबोल अत्रुपा ॥
अजर अजावन सो निःस्वादी । निःकामी निरमोह अनादी ॥
निःकोधी निरवैर निशङ्का । गुणातीत निर्द्वन्द निकलङ्का ॥

(१०)

ज्ञान प्रकाश

धर्मराय सिर अञ्जन 'सोई । आपुहि तात मातु नहिं कोई ॥
नहीं तीनि पाँच तनुधारै । रहै अमान नरकसों न्यारे ॥
ताके निशि दिन शिर नाऊँ । गुप्त प्रकट वाको गुण गाऊँ ॥
उनके ढिगसो हम चलि आये । जिव निस्तारन हमहिं पठाये ॥
सत्यपुरुष सत्यगुरु सो आहीं । गुरुगम सत्यगुरु नाम समाहीं ॥
सत्यगुरु ध्यान जाहि पहुँ होई । सो हँसा नहिं जाहिं विगोई ॥
सत्यगुरु शब्द गहे सो हँसा । मेटै जन्म मरण भौ संसा ॥

छंद-सत्यनाम सतगुरु ध्यान सतपद वासी हंस हो ॥

सत्यलोक अशोक निर्मोह पहुँचे गहे अविचल कंत हो ॥

जीव लहै सुमिरण सत्यबीरा अङ्क अविचल जोग है ॥

सत्यनाम सुमिरण काल डरपै मुछित यम न्यारा रहै ॥

सारखी-कहाँ सँदेश सत्य पुरुषको, समझत रङ्ग नरेश ॥

कहैं कबीर सो अमर हो, जो गह मम उपदेश ॥

सोरठा-चीन्हहु किर्तिम आदि, सत्य असत्य विचारहु ॥

छाँडि देहु बकवादि, खोजहु अविचल पुरुष कह ॥

चौपाई

यहि जग देखों अनकठ रीती । तजहीं साँच झूठ सो प्रीती ॥

जो धोखा तेहि साँचके मानैं । सत्य सार तेहि नहिं पहिचानैं ॥

आदि ब्रह्मकहैं खोजहि नाहीं । कृतिम कला जो सेवहि ताहीं ॥

निज स्वामीके मत ना गहहीं । जरा मरण घर संकट सहहीं ॥

जो रक्षक तेहि गहे न कोई । जो भक्षक तेहि धावहि लोई ॥

कर्म भर्म वसि तीर्थ नहाहीं । पुण्य पाप वसि आवहिं जाहीं ॥

दयाहीन नर पढ़हि पुराना । पढ़िगुणिके अरथावहि ज्ञाना ॥

अन्धा अगुवा तिहुँपुर माहीं । बहु अन्धा तेहि पाछे जाहीं ॥

अगुवा सहित कूप महाँहीं । कासो कहूँ कोई बूझै नाहीं ॥

बोधसागर

(११)

छन्द-गुरुज्ञान हीन मलीन पण्डित शब्द शास्त्र पढ़ै घनो ॥
अगम निगम विरञ्चि प्रमोघैँ सकल जग यहि सखा बनो ॥
जो काल जीवनको सतावै तासु भक्ति हृदावहीं ॥
विष्णु आदिक शिवसनकादि अजसुर कालके गुण गावहीं ॥
साखी-बिन बूझै करुआइ अस, लगिहै वचन हमार ॥
जब बूझै तब मीठि हो, कहैं कबीर पुकार ॥
सोरठा-जस नीम जग माहिँ, नासि व्याधि करु दूरि प्रथम ॥
तेहि दुख चम्पै नाहिँ, जो चारै सुरि अमर ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

अहो साधु तुम को धौँ अहहू । अनकट बात बहुत तुम कहहू ॥
ताते तब नहिँ बोल बढायो । जाते हरि सेवा चित लायो ॥
विष्णु इष्ट देवन्ह के देवा । तुम्ह तेहि कहहु करहि यम सेवा ॥
विष्णु ते अधिक और कोइ नाहीं । जमरा विष्णु कै चेरा आहीं ॥

सतगुरु वचन

अहो धर्मनि जो ऐसन कहहू । तो हम कहै सो चित महाँ धरहू ॥
विष्णु कथा तोहिँ कही सुनाओं । अगम अगोचर ज्ञान चिन्हाओं ॥
तुम्ह भाषो यह वचन सँजोई । विष्णु ते अधिक ओर नहि कोई ॥
हमरी शब्द कहैं देखहु साहू । अपनी हृदया जनि कदराहू ॥
आपुहि विष्णु धनी जो रहेऊ । तो किमि योनि जठरदुख सहेऊ ॥
जो यम होत विष्णु के दासा । तो नहिं करते विष्णु गरासा ॥
सेवक हाथ न स्वामिहि चालै । जो विगरे तौ होइ तेहि कालै ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिक । मुनि मुनीश नारद शेषादिक ॥
सब कहैं यम धरि करहि अहारा । लूटहि सबहि काल बरियारा ॥
तीन लोक जेते कोई आहे । काल निरञ्जन सब कहैं डाहे ॥
तुम खोजहु अब सो घर भाई । जेहि घर यम सो बाचहु जाई ॥
अहो साधु के सूत सयाना । एती कहेऊ सब सुनेहु पुराना ॥
पठि पुराण नहिं समझेहु भेता । बिनु जाने भर्महु आचेता ॥

(१२)

ज्ञानप्रकाश

ब्रह्मा गये असंख सिराई । विष्णु कोटि यमरा धरि खाई ॥
चाँद औ सूर्य तारागण लोई । कहै कबीर फिर रहे न कोई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

अहो साधु अचरज तब बाता । कहे न बने तुमहिं विरुयाता ॥
गीता भागवत पुस्तक बहुताना । निसिदिन सुनो जपों भगवाना ॥
विप्र भेष औ छव दर्शन कै । महिमा सबै कहैं त्रिभुवन कै ॥
सबै विष्णुकै भक्ति हृदुवैं । त्रय देव सब श्रेष्ठ बतावैं ॥
तुम खण्डहु हरि और न कोई । अहो साधु यह अचरज होई ॥

सतगुरु वचन

छन्द-सुनु सन्त सुबुद्ध सयान सुनि ज्ञान हृदय बिचारहु ॥
गहि शब्द परख करि दिये मम बानि निरुआरहु ॥
सो कहत वेद बहु विविध पुराण त्रिगुण तेरा पार धनी ॥
यह मायाजाल है जगत फन्दा त्रिविधि काल कला बनी ॥

साखी-त्रिगुण ध्यान ते रहित नहीं, सुनहु सन्त चित लाय ॥
अस्थिर घर तब पावई, चौथे पदहिं समाय ॥

सोरठा-चौथा पद निरबान, पुण्य भाग ते पाइये ।
कहैं कबीर प्रमान, सत्य शब्द बिनु नहि तरे ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे साहब हमसे भल कहहु । तिहुँ पुर प्रलय कहाँ तब रहहु ॥
तीन देव सब परलय तर आई । तुम कौने विधि बाँचहु भाई ॥

सतगुरु वचन

अहो सन्त हम तहाँ रहाहीं । यम प्रवेश जहँ सपनेहुँ नाहीं ॥
जाके डर कम्पत यमराई । अहो सन्त हम ताको गुण गार्ई ॥
तीनि लोक यह परलय होई । चौथा लोक सुख सदा समोई ॥
तीन देवके पिता निरञ्जन । ते यम दारुण वंशके अञ्जन ॥

बोधसागर

(१३)

सवा लाख जिव नित सो खाहीं । सुर नर सुनि कोइ छँडिे नाहीं ॥
सत्यपुरुष सत्य लोक निवासी । सकल जीवके पीव अविनासी ॥
तिन्ह पुनि षोडश सुत निर्माया । षोडशमें एक काल सुभाया ॥
पुनि तेहिमहँ एक काल कहाया । ज्योति स्वरूप निरञ्जन राया ॥
जाकहँ नाहि सोइ यम जाना । धूर्तमता तिन लोकमहँ आना ॥
एक अण्ड दीन्हा तिन लोका । निरंकार है निष्काम अशोका ॥
निरंकार तीन सुत उपराजू । आपु गुप्त पुत्रन दिय राजू ॥
तीनहुँ तीन लोक ठगि राखा । आपन आपन महिमा भाखा ॥
अरुझिरहा जिव तिरगुन फाँसा । भूलि परा निज घर तब नासा ॥
जीवन्ह काल बहुत सन्तावै । बार बार यम जीव नचावै ॥
सत्य पुरुष तब मोहि पठाये । जिवसुक्ता वन हमहिँ चलि आये ॥

धर्मदास बचन

हे साहब कछु पूछौं तोही । जो पूछहुँ सो भाषहु मोही ॥
निरङ्कार निरंजन राई । धूर्तमता तिन्ह काकिय भाई ॥
जाते इन उहाँ रहै न पाई । सो चरित्र मोहिँ वरणि सुनाई ॥

सतगुरु बचन

अहो सन्त जो पूछहु मोहीं । समुझहु चरित्र बुझावों तोहीं ॥
सत्य पुरुष सुत षोडश कीन्हा । अष्टगीन एक कन्या रचिलीन्हा ॥
सो कन्या इन्ह कीन्ह गरासा । ताते भौ यहि लोक निकासा ॥
पुरुष दरश इन्ह बहुरि न पावा । तीन लोक महँ आनि रहावा ॥
एक अण्ड सत्यपुरुष तेहि दीन्हा । अशंख अण्ड लोक महँ कीन्हा ॥
पुरुष रूप का बरणौ भाई । मोसो वरणत वरणि न जाई ॥
तेहि साहब का हौ शठिहारा । जीव सुकाजको करों पुकारा ॥
जो समुझे सुनि हेला मोरी । काटौं ताकी कर्मकी डोरी ॥

धर्मदासका विरह

यहि कहि गुप्त भये प्रभु राई । धर्मदास महि खसेसुझाई ॥